भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 838 में से

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५० सूर्य सिद्धान्त पर धाता का अंत और ईश्वर नामक सम्वत्सर का आरम्भ होगा । यह पहले बतलाया गया है कि स्पष्ट मेष संक्रान्ति मध्यम मेष संक्रान्ति से २.९७०७ सावन दिन पहले ही होती है; इसलिए स्पष्ट मेष संक्रान्ति से ३६.०७६६१ सावन दिन पर अथवा ३६ दिन ४६ घड़ी ८ पल ४० विपल पर ईश्वर का प्रवेश होगा । विस्तरेणैतदुदितं संक्षेपाद्व्यावहारिकम् । मध्यमानयनं कार्यं ग्रहाणामिष्टतो युगात् ॥५६॥ अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः । विना तु पातमान्दोच्चान्मेषादौ तुल्यतामिताः ॥५७॥ मकरादौ शशाङ्कोच्चं तत्पातस्तु तुलादिगः । निरंशत्वं गताश्चान्येनोक्तास्ते मन्द चारिणः ॥५८॥ अनुवाद—(५६) ग्रहों के मध्यम स्थान जानने की रीति अब तक विस्तार के साथ कही गयी है; परन्तु व्यवहार के लिए इष्ट युग से ही यह काम संक्षेप में करना चाहिये । (५७) इस सत्ययुग के अंत में पातों और मन्दोच्चों को छोड़कर सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे अर्थात् सातों ग्रह मेष के आरम्भ स्थान पर पहुँचे हुए थे । (५) चन्द्रमा का उच्च मकर राशि के आदि में तथा उसका पात (राहु) तुला के आदि में थे । अन्य ग्रहों के पात और मन्दोच्च मन्दगति के कारण किसी पूरे अंश पर नहीं थे; इसलिए इनके बारे में कुछ नहीं कहा जाता है । (५६—५८)॥ विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के ४५-५० श्लोकों में ग्रहों के मध्यम स्थान निकालने की जो रीति बतलायी गयी है वह गणित विस्तार के कारण व्यवहारोपयोगी नहीं है जैसा कि दिये हुए उदाहरणों से स्पष्ट है । इसलिए सृष्टि के आदि से सत्य- युग के अंत तक के वर्षों का अहर्गण निकालने की कोई आवश्यकता नहीं है । वर्तमान युग का आरम्भ जबसे हुआ है तभी से इष्टकाल तक का अहर्गण ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६-५० श्लोकों के अनुसार जानकर ग्रहों के मध्यम स्थान जान लेने चाहिये । जिस समय सूर्यांश पुरुष ने मय को सूर्य सिद्धान्त का उपदेश दिया है वह इसी अध्याय के दूसरे श्लोक के अनुसार सत्ययुग के अंत का समय है, इसलिए ५७वें श्लोक में त्रेता के आदि से अहर्गण बनाने का संकेत है और यह भी दिखलाया गया है कि इस समय सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष राशि के आदि में समान थे । इस नियम के अनुसार कलियुग में कलियुग के आदि से ही अहर्गण निकालने की रीति सुविधाजनक है जो आजकल प्रचलित भी है । जैसे त्रेता के आदि में सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे वैसे ही कलियुग के आदि में भी मेष राशि के आदि में

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