भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३८ सूर्य सिद्धान्त चित्र ६ ऊ अ ई कोण की ज्या कहलायेगी । जो लोग केवल आजकल की प्रथा से परिचित हैं उन्हें भ्रम हो सकता है; इसलिए उन्हें यह भेद अच्छी तरह समझ लेना चाहिये । त्रिज्या का मान ३४३८ इसलिए लिया गया कि जब परिधि कलाओं में विभाजित की जाती है तब त्रिज्या का मान ३४३७ ३/८ कला आजकल की सूक्ष्म गणना से ठहरता है जिसका निकटतम पूर्णाङ्क ३४३८ है। आजकल के एक रेडियन* (radian) में जितनी कलाएं होती हैं उतनी ही पूर्ण कलाओं के समान त्रिज्या का परिमाण माना गया है । स्फुट परिधि—भूतल का वह वृत्त जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों से समान अन्तर पर दोनों के बीचों बीच होता हुआ भू पृष्ठ को दो समान भागों में बाँटता है विषुवत् रेखा कहलाता है; विषुवत् रेखा के उत्तर वाले आधे भूगोल को उत्तर गोल और दक्षिण वाले को दक्षिण गोल कहते हैं । इस रेखा से आकाशीय ध्रुव (आकाश का वह विन्दु जो पृथ्वी के उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के ठीक ऊपर होता है, उत्तरी ध्रुव तारा उत्तरी ध्रुव से प्रायः १° दूर है) क्षितिज पर दिखाई देते हैं । यहाँ पर अक्षांश शून्य और लम्बांश ९०° होता है। इसलिए विषुवत् रेखा को निरक्षवृत्त भी कहते हैं। चित्र १० में व वा वि विषुवत् रेखा है । यदि किसी स्थान 'स' से निरक्षवृत्त के समानान्तर स सा सि वृत्त (Parallel of latitude) भूतल पर खींचा जाय तो इसके परिमाण को 'स' स्थान की स्फुट परिधि कहते हैं । विषुवत् रेखा से

  • १ रेडियन = ५७°•२९५८ = ३४३७•७४८ कला