भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४४ सूर्य सिद्धान्त

वारों के नामों तथा वर्षपतियों और मासपतियों के सम्बन्ध का यह नियम जान लेने पर अब ५१वें और ५२वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझी जा सकती है । इष्टकाल तक जो अहर्गण ( सावन दिन ) आया हो उसको सात से भाग देने पर जो शेष बचे उतने ही दिन सप्ताह के बीत चुके हैं । सृष्टि का आरम्भ रविवार से हुआ इसलिए रविवार सप्ताह का पहला दिन है और शनिवार पिछला दिन अर्थात् सातवाँ दिन । इसलिए यदि शेष ५ बचे तो समझना चाहिए कि वृहस्पति का दिन है जिसकी मध्य रात्रि को वह अहर्गण पूरा होता है क्योंकि वृहस्पति सप्ताह का पाँचवाँ दिन है । जैसे पिछले उदाहरण में अहर्गण की जो संख्या ७,१४,४०,४१,३१,६०३ आयी है उसको सात से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए जिस दिन का अहर्गण निकाला गया है वह सप्ताह का पहला दिन रविवार है । परन्तु यह अहर्गण बसंत-पंचमी से पहले की अर्द्धरात्रि तक का है इसलिए बसंत-पंचमी को सोमवार होगा । मासपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३० से भाग देना चाहिए जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से सावन मासों की संख्या हुई । इन सावन मासों को दो से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो, क्योंकि मासपतियों का क्रम वार के अनुसार तीसरे दिन बदलता है और सात मास बीतने पर फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे, सप्ताह के उसी दिन का स्वामी उस मास का स्वामी होता है जो चल रहा है । जैसे ऊपर के अहर्गण को ३० से भाग देने पर २३, ८१,३४,७१,०५३ सावन मास और १३ सावन दिन होते हैं । इन सावन मासों की संख्या को २ से गुणा करके १ जोड़ने पर ४७,६२,६६,४२,१०७ होता है । इसको ७ से भाग देने पर शेष ३ बचता है । इसलिए चलते सावन मास का पहला दिन मंगलवार था । इसलिए इस मास का स्वामी मंगल है । वर्षपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३६० से अथवा ऊपर निकाले हुए सावन मासों को १२ से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उतने ही सावन वर्ष बीते हैं । इनको तीन से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो क्योंकि वर्षपतियों का क्रम वार के अनुसार चौथे दिन बदलता है और सात वर्ष के बाद फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे (सप्ताह के) उसी दिन का स्वामी चलते सावन वर्ष का स्वामी होता है क्योंकि सप्ताह का आरम्भ रविवार से होता है । जैसे ऊपर के उदाहरण में अहर्गण को ३६० से भाग देने पर अथवा सावन मासों को १२ से भाग देने पर गत सावन वर्षों की संख्या १,६८,४४,५५,६२१ हुई ।