सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ सूर्य सिद्धान्त दिवसे यो वारः स मेघाधिपः । धनुः संक्रान्ति दिवसे यो वारः स पश्चिमधान्याधिपः* ॥ सावन वर्ष तथा सावन मास का व्यवहार आजकल कहीं नहीं है । इसलिए वर्षाधिप और मासाधिप निकालने का जो नियम सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है वह किस काम आता है यह मैं नहीं जानता । यदि कोई सज्जन जानते हों तो कृपया सूचित करें । तेरहवें श्लोक से, जैसा कि मैंने उसकी टिप्पणी में लिखा है, यह ध्वनि निकलती है कि यथार्थ वर्ष सौर वर्ष ही है । फिर सावन वर्ष और सावन मास के अनुसार वर्षपति और मासपति निकालने की क्या आवश्यकता है ? यथा स्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः । विभाजितो मध्यगतो भगणादिग्रहो भवेत् ॥५३॥ एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः । विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः ॥५४॥ अनुवाद—(५३) जितने अहर्गण आवें उनसे किसी ग्रह के महायुगीय भगण को गुणा कर दो और गुणनफल को महायुगीय सावन दिनों से भाग दे दो। जो लब्धि आवेगी उतने ही भगण उस ग्रह के (सृष्टि के आदि से) मध्यम गति के अनुसार पूरे हुए हैं । जो शेष बचे उसको १२ से गुणा करके फिर (महायुगीय सावन दिनों से) भाग देने से उस राशि की संख्या आवेगी जितनी राशियां वह ग्रह वर्तमान भगण में पूरा कर चुका है । अब जो शेष बचे उसको ३० से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर उन अंशों की संख्या निकल आवेगी जितने अंश वह ग्रह वर्त्तमान राशि में पूरा कर चुका है इत्यादि । (५४) इसी प्रकार पहले कहे हुए पूर्व की ओर चलने वाले शीघ्रों और मन्दोच्चों के स्थान भी जाने जा सकते हैं। पातों की गति उलटी (पच्छिम की ओर) होती है, इसलिए पातों की जो राशि अंश कला विकला आवें उनको पूरे चक्र में से अर्थात् १२ राशि में से घटा देने पर, जो शेष बचे वही पातों के स्थान हैं ॥ ५३-५४ ।। विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में वह रीति बतलायी गयी है जिससे किसी इष्ट समय में ग्रहों के मध्यम स्थान जाने जाते हैं । इसका संक्षेप में अर्थ यह है कि जब एक महायुग में (महायुगीय सावन दिनों में) ग्रह ऊपर कहे हुए भगण करता है तब इष्ट समय तक के सावन दिनों में कितने भगण करेगा । इसलिए त्रैराशिक की रीति से इस नियम को यों प्रकट कर सकते हैं :— महायुगीय सावन दिन : इष्ट अहर्गण :: महायुगीय भगणः इच्छित भगण
- वेंकटेश्वर प्रेस की १६६० वि० की छपी मकरंद सारिणी पृष्ठ ४७६