सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार २७ चन्द्रोच्च का भगणकाल जानने की रीति प्रतिदिन गोल यंत्र के द्वारा चंद्रमा का बेध करके स्पष्ट गति निकालनी चाहिये । जिस दिन गति सबसे कम हो उस दिन मध्यम और स्पष्ट चन्द्रमा के स्थानों में अंतर नहीं होता । यही चंद्रमा के उच्च का स्थान है। इसी प्रकार प्रतिदिन वेध करते-करते जब चन्द्रमा की गति फिर परम अल्प हो तब उसी स्थान को उच्च समझना चाहिये । यह स्थान पहले स्थान से कुछ आगे रहता है। कितना आगे हो जाता है यह जानकर अनुपात के द्वारा यह गणित कर लेना चाहिये कि उच्च की दैनिक गति कितनी होती है तथा एक भगण काल कितने दिन में पूरा होता है । चन्द्रपात का भगण काल जानने की रीति-प्रति दिन चन्द्रमा का बेध करते हुए यह देखना चाहिये कि किस दिन चन्द्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाता है। जिस समय विक्षेप शून्य हो उस समय चन्द्रमापात स्थान पर होता है । इसी प्रकार जब दूसरे चक्कर में चंद्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाय तब समझना चाहिये कि वह अपने पात पर पहुँच गया । दूसरी बार पात का स्थान पहले स्थान से कुछ पश्चिम होता है, इसीलिए यह कहा जाता है कि पात की गति विलोम होती है अर्थात् पश्चिम की ओर होती है। फिर अनुपात के द्वारा जानना चाहिये कि जब इतने दिन में पात इतना चलता है तो एक दिन में कितना चलेगा । यही पात की दैनिक गति समझनी चाहिये । इसी प्रकार यह भी जानना चाहिये कि एक कल्प में कितने भगण होते हैं । मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्चों के सम्बन्ध में- जब सूर्य, शनि, गुरु या मंगल से आगे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से कुछ आगे रहते हैं और जब सूर्य पीछे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से पीछे रहते हैं; इसलिए विद्वानों ने यह कल्पना की कि इन तीनों के शीघ्रोच्च सूर्य के साथ ही रहते हैं और ग्रहों को अपनी ओर अर्थात् सूर्य की ओर आकर्षित करते हैं; इसलिए इनके शीघ्रोच्चों के भगण सूर्य के समान होते हैं । भानामष्टाक्षिखस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दवः । भोदया भगणैः स्वैः स्वैरूनाः स्वस्वोदया युगे ॥३४॥ अनुवाद-१ महायुग में नक्षत्रों के १,५८,२२,३७,८२८ भगण होते हैं। किसी ग्रह के महायुगीय भगण को नक्षत्र के महायुगीय भगण में से घटा देने से जो बचता है उतने ही बार एक महायुग में वह ग्रह पूर्व क्षितिज में उदय होता है ।।३४।। विज्ञान भाष्य-१२वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में नाक्षत्र-अहोरात्र की परिभाषा दी गयी है। एक नाक्षत्र-अहोरात्र में तारे पश्चिम की ओर चलते हुए एक