सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ३१ खचतुस्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः । भवन्ति भोदया भानुभगणैरूनिताः कहाः ॥३६॥ अनुवाद—( ३७) एक महायुग में १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन; १,६०,३०,००,०८० चान्द्र दिन अर्थात् तिथियाँ; (३८) १५,६३,३३६ अधिमास; २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ तथा (३६) ५,१८,४०,०४० सौर मास होते हैं । नक्षत्र के उदय में से सूर्य के भगण की संख्या घटाने से भूमिसामन दिन होते हैं ॥३७-३६॥ विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में जो संख्याएँ दी गयी हैं वह इनसे पहले के तीन श्लोकों के उदाहरण हैं । ऊपर जो महायुगीय अंक दिये गये हैं वह सब सिद्धान्तों में एक से नहीं हैं । थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है । एक महायुग में सावन दिनों की संख्या भिन्न- भिन्न सिद्धान्तों में जैसी मिलती है वह नीचे की सारिणी से सहज ही जानी जा सकती है :— प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,८२८ पंचसिद्धान्ति के सूर्य सिद्धान्तके मत से १,५७,७६,१७,८०० आर्यभटीय के मत से १,५७,७६,१७,५०० ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि के मत से १,५७,७६,१६,४५० महासिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,५४२ अधिमासोनरात्र्यक्षंचान्द्रसावनवासराः । एते सहस्रगुणिताः कल्पे स्युर्भगणादयः ॥४०॥ अनुवाद—अधिमासों, अवम तिथियों, नाक्षत्र, चान्द्र और सावन दिनों तथा ग्रहों के भगणों की जो संख्याएँ (बतलायी गयी) हैं उनका एक हजार गुना कर देने से कल्प की संख्याएँ निकल आती हैं ॥ ४० ॥ विज्ञान भाष्य—१००० महायुगों का एक कल्प होता है इसलिए महायुगीय भगण इत्यादि की संख्याओं को १००० से गुणा कर देने पर कल्प की संख्याएँ जानी जा सकती हैं । प्राग्गतेःसूर्य मन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः । कौजस्य वेदखयमा बुधस्याष्टर्तुवह्नयः ॥४१॥ खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणासवः । गोऽनयश्शनिमंदस्य पातानामथ वामतः ॥४२॥