भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३० सूर्य सिद्धान्त

१२ चान्द्रमासों का वर्ष सौर वर्ष से १०.८६१७० मध्यम सावन दिन छोटा होता है; इसलिए कोई तैंतीस महीने में यह अन्तर एक चान्द्रमास के समान हो जाता है। जिस सौर वर्ष में यह अंतर १ चांदमास के समान हो जाता है उस सौर वर्ष में १३ चांदमास होते हैं । तब एक चान्द्रमास अधिमास या मलमास के नाम से छोड़ दिया जाता है। यदि ऐसा न किया जाय तो चांद मास के अनुसार मनाये जानेवाले त्योहार, पर्व इत्यादि भिन्न-भिन्न ऋतुओं में मुसलमानी त्यौहारों की तरह पड़ने लगें । ऊपर के श्लोक में यह बतलाया गया है कि एक महायुग में जितने सौरमास होते हैं उनसे चांदमासों की संख्या जितनी अधिक हो उतने ही चांदमास अधिमास के नाम से छोड़ दिये जायँगे । इसलिए एक महायुग में अधिमासों की संख्या । = महायुगीय चांदमास—महायुगीय सौरमास = (५,३४,३३,३३६ — ४३,२०,०००) X १२ = १५,६३,३३६ सावनाहानि चान्द्रेभ्यो द्युभ्यः प्रोज्झ्य तिथिक्षयाः । उदयादुदयं भानोर्भूमिसावनवासराः ॥ ३६ ॥ अनुवाद—एक महायुग में जितनी चान्द्र तिथियाँ होती हैं उस संख्या में से महायुग के सावन दिनों की संख्या घटाने से उन तिथियों की संख्या निकल आती है जो क्षय होती है अर्थात् जिनकी गणना नहीं की जाती । सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय के बीच के समय को भूमिसावन दिन कहते हैं ॥३६॥ विज्ञान भाष्य—एक चांदमास में ३० तिथियाँ होती हैं इसलिए यदि महायुगीय चांदमासों की संख्या को ३० से गुणा कर दिया जाय तो एक महायुग में कितनी तिथियां होती हैं यह मालूम हो जाय । यह पहले ही बतलाया गया है कि एक महायुग में कितने सावन दिन होते हैं और एक सावन दिन में एक ही तिथि की गणना होती है, इसलिए सावन दिनों की संख्या से तिथियों की संख्या जितनी अधिक होती हैं उतनी तिथियों की गणना नहीं की जाती; इसलिए यह क्षय या अवम तिथियाँ कहलाती हैं । इस श्लोक के उत्तरार्द्ध की व्याख्या कई बार की जा चुकी है। यहाँ केवल यह अधिक बतलाया गया है कि सावन दिन को भूमिसावन दिन भी कहते हैं । वसुद्वयष्टशरिद्र्वङ्कसप्ताद्रितिथयो युगे । चान्द्राः खाष्टखव्योमवाग्निखर्तुनिशाकराः ॥३७॥ षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः । तिथिक्षया यमार्थश्विद्व्यष्टव्योमशराश्विनः ॥३८॥