भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३६ सूर्य सिद्धान्त वही (वर्तमान) सत्ययुग के अन्त तक सौर वर्षों में संख्या हुई जो १,६५,३७,२०,००० है ॥४५-४७॥ विज्ञान भाष्य—पिछले २२वें और २३वें श्लोकों में जो कुछ कहा गया है यही यहाँ फिर दुहराया गया है। इन श्लोकों के विज्ञान-भाष्य में कल्प के आरम्भ से वर्तमान महायुग के सत्ययुग के अन्त तक के सौर वर्षों की संख्या जानने की रीति बतलायी गयी है जो १,६७,०७,८४,००० होती है। इसमें से सृष्टि के रचने के १,७०,६४,००० सौर वर्ष घटा दिये जाँय तो शेष १,६५,३७,२०,००० होता है। इतने ही सौर वर्ष सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अन्त तक बीते हैं। अत ऊर्ध्वममी .युक्तै। गतकालाब्दसङ्ख्यया । मासीकृता युता मासैःमधु शुक्लादिभिर्गतैः ॥४८॥ पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः । लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥४६॥ द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः । लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामर्धरात्रिकः ॥५०॥ अनुवाद—(४८) ऊपर बतलाये गये (सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक के) सौर वर्षों में सत्ययुग के उपरान्त जितने सौर वर्ष बीते हों उनको जोड़ लो । योगफल इष्टकाल तक के सौर वर्षों की संख्या होगी । इसके मास बना लो अर्थात् १२ से गुणा कर दो । मासों की संख्या में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इष्टकाल तक जितने मास बीते हों उनको भी जोड़ दो । (४६) इस संख्या को दो स्थानों पर रखो, एक को महायुग के अधिमासों की संख्या से गुणा कर महायुग के सौर मासों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के अधिमासों की संख्या होगी । इस लब्धि को दूसरे स्थान में रखे हुए मासों में जोड़ दो । योगफल सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के चांद्र-मासों की संख्या है। इसको ३० से गुणा कर (चान्द्र) दिन अर्थात् तिथियाँ बना लो और इष्टकाल तक वर्तमान मास की जितनी तिथियाँ बीती हों उनको जोड़ लो तो सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक जितनी तिथियाँ बीती हैं वह मालूम हो जायँगी । (५०) इन तिथियों की संख्या को भी दो स्थानों पर रखो । एक को महायुगीय क्षय-तिथियों की संख्या से गुण दो और गुणनफल को महायुगीय तिथियों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक की क्षय-तिथियों की संख्या हुई । इसको दूसरे स्थान में रखी हुई तिथियों की संख्या में से घटा दो, जो शेष हो उससे एक कम लङ्का की अर्द्ध-रात्रि तक सावन-दिनों की संख्या हुई ॥४८-५०॥