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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

३६ सूर्य सिद्धान्त वही (वर्तमान) सत्ययुग के अन्त तक सौर वर्षों में संख्या हुई जो १,६५,३७,२०,००० है ॥४५-४७॥ विज्ञान भाष्य—पिछले २२वें और २३वें श्लोकों में जो कुछ कहा गया है यही यहाँ फिर दुहराया गया है। इन श्लोकों के विज्ञान-भाष्य में कल्प के आरम्भ से वर्तमान महायुग के सत्ययुग के अन्त तक के सौर वर्षों की संख्या जानने की रीति बतलायी गयी है जो १,६७,०७,८४,००० होती है। इसमें से सृष्टि के रचने के १,७०,६४,००० सौर वर्ष घटा दिये जाँय तो शेष १,६५,३७,२०,००० होता है। इतने ही सौर वर्ष सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अन्त तक बीते हैं। अत ऊर्ध्वममी .युक्तै। गतकालाब्दसङ्ख्यया । मासीकृता युता मासैःमधु शुक्लादिभिर्गतैः ॥४८॥ पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः । लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥४६॥ द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः । लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामर्धरात्रिकः ॥५०॥ अनुवाद—(४८) ऊपर बतलाये गये (सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक के) सौर वर्षों में सत्ययुग के उपरान्त जितने सौर वर्ष बीते हों उनको जोड़ लो । योगफल इष्टकाल तक के सौर वर्षों की संख्या होगी । इसके मास बना लो अर्थात् १२ से गुणा कर दो । मासों की संख्या में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इष्टकाल तक जितने मास बीते हों उनको भी जोड़ दो । (४६) इस संख्या को दो स्थानों पर रखो, एक को महायुग के अधिमासों की संख्या से गुणा कर महायुग के सौर मासों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के अधिमासों की संख्या होगी । इस लब्धि को दूसरे स्थान में रखे हुए मासों में जोड़ दो । योगफल सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के चांद्र-मासों की संख्या है। इसको ३० से गुणा कर (चान्द्र) दिन अर्थात् तिथियाँ बना लो और इष्टकाल तक वर्तमान मास की जितनी तिथियाँ बीती हों उनको जोड़ लो तो सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक जितनी तिथियाँ बीती हैं वह मालूम हो जायँगी । (५०) इन तिथियों की संख्या को भी दो स्थानों पर रखो । एक को महायुगीय क्षय-तिथियों की संख्या से गुण दो और गुणनफल को महायुगीय तिथियों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक की क्षय-तिथियों की संख्या हुई । इसको दूसरे स्थान में रखी हुई तिथियों की संख्या में से घटा दो, जो शेष हो उससे एक कम लङ्का की अर्द्ध-रात्रि तक सावन-दिनों की संख्या हुई ॥४८-५०॥

मध्यमाधिकार ३७ विज्ञान भाष्य-जब यह जानना होता है कि किसी इष्ट समय ग्रहों के स्थान क्या हैं तब सबसे पहिले यह जानना चाहिये कि सृष्टि के आदि से उस इष्ट समय तक कितने सावन दिन बीते । जब सावन दिनों की संख्या मालूम हो गयी तब त्रैराशिक के द्वारा ग्रहों का स्थान जान लेना सुगम होता है। क्योंकि सृष्टि के आदि में सब ग्रह एक साथ थे और एक महायुग में वह कितने भगण करते हैं तथा कितने सावन दिन होते हैं, यह भी बतला दिया गया है; इसलिए जब महायुगीय सावन दिनों में अमुक भगण होते हैं तब इष्टकाल तक के सावन दिनों में कितने भगण होंगे, यह जान लेने से ही ग्रह का स्थान निकल आता है। इष्टकाल तक के सावन दिनों की संख्या जिसे अहर्गण कहते हैं जानने की रीति ऊपर के तीन श्लोकों में बतलायी गई है। उदाहरण—१६७६ विक्रमीय की वसंत पंचमी (माघ सुदी ५) तक सृष्टि से कितने दिन बीते ? सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक = १,६५,३७,२०,००० सौर वर्ष त्रेता ,, ,, = १२,६६,००० सौर वर्ष द्वापर ,, ,, = ८,६४,००० ,, १६७६ वि० की चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = ५,०२३* ,, इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० के चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = १,६५,५८,८५,०२३ वर्ष = २३,४७,०६,२०,२७६ सौरमास* चै० शु० १ से माघ शु० १ के आरंभ तक = १० चांद्रमास इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ के मा० शु० १ तक = २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मास जब एक महायुग में ५,१८,४०,००० सौर मास होते हैं तब १५,६३,३३६ अधिमास होते हैं; इसलिए २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मासों में अधिमासों की संख्या हुई $\frac{२३,४७,०६,२०,२८६\times१५,६३,३३६}{५,१८,४०,०००} = ७२,१३,८४,७२६ अधिमास$ इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० की माघ शु० १ तक हुए २४,१९,२०,०५,०१२ चांद्रमास = ७,२५,७६,०१,५०,३६० तिथियाँ ∵ माघ सुदी ५ तक हुईं ७,२५,७६,०१,५०,३६५ तिथियाँ

  • १६७६ वि० में जिस समय मेष-संक्रान्ति लगेगी उस समय पूरे होंगे । इसलिए इन्हें मध्यम सौर वर्ष या मास कहना चाहिये ।

३८ सूर्य सिद्धान्त परन्तु एक महायुग में ५३४३३३३६ चान्द्रमास तथा २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ होती हैं, इसलिए २४,१६,२०,०५,०१२ चान्द्र*मासों में क्षय तिथियों की संख्या = (२४,१६,२०,०५,०१२ × २,५०,८२,२५२) / ५३४३३३३६ = ११,३५,६०,१८,७६१ ∵. माघ सुदी ५, तक सृष्टि के आदि से सावन दिनों की संख्या = ७,१४,४०,४१,३१,६०४ माघ सुदी ५ के पहले की अर्द्धरात्रि तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०३ किसी समय तक के सावन दिनों की संख्या जानने का यह नियम बहुत कष्टप्रद है और तनिक सी भी भूल हो जाने से घंटों का परिश्रम व्यर्थ जाता है। इसलिए व्यवहार में इतने बड़े समय की गणना नहीं की जाती वरन् करण ग्रन्थ और सारणियाँ बनी हुई हैं जिनके द्वारा यह गणना सहज ही हो जाती है। आगे चलकर इस पुस्तक में भी सत्ययुग के अन्त से अहर्गण बनाने का उपदेश दिया गया है। यदि स्वतन्त्र गणना सुगम रीति से करना हो तो नीचे लिखी रीति काम दे सकती है :— यह बतलाया जा चुका है कि एक महायुग में ४३,२०,००० सौर वर्ष तथा, १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन होते हैं। इसलिए एक सौर वर्ष में १,५७,७६,१७,८२८ / ४३,२०,००० सावन-दिन अर्थात् ३६५.२५८७५६४८१५ सावन-दिन होते हैं। जिस समय तक के अहर्गण की संख्या जाननी हो वह जिस सम्वत् में हो उसकी मेष संक्रान्ति के दिन का अहर्गण निकाल लो। ऐसा करने के लिए एक वर्ष के सावन दिनों की संख्या को सृष्टि के आदि से इष्ट सम्वत् तक के सौर वर्षों से गुणा कर दो। उपर्युक्त उदाहरण में १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन सृष्टि के आदि से १,६५,५८,८५,०२३ सौर वर्ष बीते हैं; इसलिए इस सम्वत् के मध्यम मेष-संक्रान्ति के समय तक ३६५.२५८७५६४८१५ × १,६५,५८,८५,०२३ सावन दिन अर्थात् ७,१४,४०,४१,३१,३२१. ७७००२६०७४५ सावन दिन बीते। परन्तु स्पष्ट मेष- संक्रान्ति मध्यम संक्रान्ति से २.१७०६६४४ सावन दिन पहले ही हो जाती है। इसलिए यदि मध्यम मेष संक्रान्ति तक के अहर्गण में से २.१७०६६४४ सावन दिन घटा दिये जांय तो स्पष्ट मेष-संक्रान्ति के समय तक ७,१४,४०,४१,३१,३१६.५६६३- *पुस्तक में चन्द्र मासों की जगह तिथियां कही गयी हैं जिससे गणना शुद्ध होती है; परन्तु गुणा भाग अधिक करना होता है इसलिए चान्द्र मास लिये गये हैं। इससे सम्भव है कि एक दिन की भूल पड़े, जो वार निकालने से शुद्ध हो सकती है।

मध्यमाधिकार ३६ ३१६७४५ सावन दिन बीते। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सृष्टि के आदि से इतने मध्यम सावन दिन बीतने पर १८७६ वि० की मेष संक्रान्ति लंका में हुई। इसलिए जिस दिन मेष संक्रान्ति थी उस दिन की आधी रात तक के अहर्गण हुए ७,१४,४०,४१,३१,३२० । अब देखना चाहिये कि मेष की संक्रान्ति से कितने दिन पर बसंत पंचमी पड़ी । इसके लिए पहले यह जानना चाहिये कि मेष संक्रान्ति के दिन कौन तिथि थी । १ चान्द्रमास २९.५३०५८७६४६०७ सावन दिनों का होता है । इसलिए यदि मेष संक्रान्ति के अहर्गण को इतने सावन दिनों से भाग दे दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह सृष्टि के आदि से मेष संक्रान्ति तक के बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होगी और जो शेष बचा है वह चालू चान्द्रमास के सावन दिन होंगे । इस शेष को यदि ३० से गुणा करके गुणनफल को चान्द्रमास के सावन दिनों से फिर भाग दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह तिथियों की संख्या होगी । ऐसा करने से मेष संक्रान्ति के समय तिथि की संख्या १६५२५७६ आती है, जो पूर्णिमान्त गणना से वैशाख बदी २ और अमान्त गणना से चैत बदी २ होती है । अब यह जानना चाहिये कि वैशाख बदी २ से माघ सुदी ५ तक कितने सावन दिन बीते । इसलिए पहले यह देखना चाहिये कि इस समय में कितनी तिथियाँ बीतीं । वैशाख बदी ३ से माघ बदी २ तक ९ चान्द्रमास होते हैं, क्योंकि इस वर्ष कोई मलमास नहीं पड़ा, तथा माघ बदी ३ से माघ सुदी ५ के आरम्भ तक अर्थात् चौथ के अन्त तक १७ तिथियाँ होती हैं । इसलिए मेष संक्रान्ति से माघ सुदी ४ के अन्त तक ९ x ३० + १७ तिथियाँ अर्थात् २८७ तिथियाँ बीतीं । परन्तु ३० तिथियाँ = २९.५३०५८७६४६०७ मध्यम सावन दिन; इसलिए २८७ तिथियाँ = २८७ x २९.५३०५८७६४६०७ x १/३० = २८२.५०६२६१३५०७३६ = २८२.५१ सावन दिन स्थूल रूप से परन्तु मेष संक्रान्ति की अर्द्धरात्रि के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,३२० इसलिए सृष्टि से माघ सुदी ५ तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०२.५१ अर्थात् माघ सुदी ५ की पहली अर्द्ध-रात्रि तक ७,१४,४०,४१,३१,६०३ सावन दिन बीते; जो पहली रीति से निकाले गये अहर्गण से मिलता है। इस गणना के लिए दशमलव के ग्यारहवें स्थान तक के अंकों को लेना पड़ता है क्योंकि गुणक (सृष्टि से

४० सूर्य सिद्धान्त अब तक के सौर वर्षों की संख्या) अरबों में है। यदि त्रेता या कलियुग के आदि से अहर्गण निकालना हो जिसके लिए आगे आदेश है, तो चान्द्रमास और सौर वर्ष के सावन दिनों की संख्या सात दशमलव स्थानों तक लेना पर्याप्त होगा । अब यह परीक्षा करना रह गया कि यह संख्या शुद्ध है या नहीं । इसके लिए केवल यह जाँचना पर्याप्त होगा कि सृष्टि से इतने दिनों के बाद कौन वार आरम्भ होगा । यदि वार ठीक निकल आवे या १ दिन का अन्तर पड़े तो समझना चाहिए कि अहर्गण ठीक है, नहीं तो अशुद्ध है । इसकी रीति आगे के श्लोक में दी हुई है ! सावनो द्युगणस्सूर्याद्दिनमासाब्दपास्ततः । सप्तभिः क्षयितश्शेषः सूर्याद्यो वास्रेश्वरः ॥५१॥ मासाब्ददिनसंख्याप्तौ द्वित्रिघ्नौ रूपसंयुतौ । सप्तोद्धृतावशेषौ तु विज्ञेयौ मासवर्षपौ ॥५२॥ अनुवाद-(५१) सावन दिनों की जो संख्या हो उससे दिनपति, मास- पति और वर्षपति सूर्य से गिनकर जानना चाहिये । इस संख्या को ७ से भाग दे दे जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ होकर दिनपति है । (५२) यदि इस (सावन दिनों की) संख्या को क्रम से मास और वर्ष के दिनों की संख्याओं से भाग दे दें और भागफलों को क्रम से दो और तीन से गुणा करके, प्रत्येक गुणनफल में एक जोड़ दे और योगफलों को ७ से भाग दे दें तो जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ हो कर क्रमानुसार मासपति और वर्षपति है ॥५१-५२॥ विज्ञान-भाष्य-वार ( दिन ) का नाम उस ग्रह के नाम पर रखा गया है जो वार के आरंभ में पहले घंटे ( होरा ) का स्वामी समझा गया है। जो ग्रह पहले घंटे का स्वामी होता है वही उस वार का भी स्वामी समझा जाता है। इसी तरह सावन* मास के आरंभ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन मास का स्वामी समझा जाता है और सावन वर्ष के आरम्भ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन वर्ष का स्वामी समझा जाता है। जैसे रविवार के पहले घंटे का स्वामी रवि, उस दिन का स्वामी रवि, जो सावन मास रविवार से आरंभ होता है उस मास का स्वामी रवि और जो सावन वर्ष रविवार से आरंभ होता है उस वर्ष का स्वामी भी रवि ही है । *सावन को श्रावण न समझना चाहिये । ३० सावन दिनों का जो मास होता है वह सावन मास और १२ सावन महीनों का जो वर्ष होता है वह सावन वर्ष कहलाता है ।

मध्यमाधिकार ४१ किस घंटे ( होरा ) का स्वामी कौन ग्रह है यह जानने के लिए वह क्रम समझ लेना चाहिये जिस क्रम से घंटे के स्वामी बदलते हैं। शनि ग्रह पृथ्वी से सब ग्रहों से अधिक दूर है, उससे निकट बृहस्पति है, बृहस्पति से निकट मंगल, मंगल से निकट सूर्य, सूर्य से निकट शुक्र, शुक्र से निकट बुध १ और बुध से निकट चन्द्रमा है। इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं। यदि पहले घंटे का स्वामी शनि है तो दूसरे घंटे का स्वामी वृहस्पति, तीसरे का स्वामी मंगल, चौथे का सूर्य, पांचवें का शुक्र, छठें का बुध, सातवें का चन्द्रमा, आठवें का फिर शनि, इत्यादि क्रमानुसार हैं। परन्तु जिस दिन पहले घंटे का स्वामी शनि होता है उस दिन का नाम शनिवार होना चाहिये । इसलिए शनिवार के दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का स्वामी मंगल इत्यादि हैं। इस प्रकार सात-सात घंटे के बाद स्वामियों का वही क्रम फिर आरंभ होता है। इसलिए शनिवार के २२वें घण्टे का स्वामी शनि, २३वें का वृहस्पति, २४वें का मंगल, और २४वें के बाद वाले घंटे का स्वामी सूर्य होना चाहिये । परन्तु यह २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है जिसका स्वामी सूर्य है इसलिए शनिवार के बाद रविवार होता है। रविवार के दूसरे घंटे का स्वामी शुक्र, तीसरे का बुध, चौथे का चन्द्रमा, इत्यादि क्रमानुसार चलते हुए ११वें, १८वें २५वें घंटों का स्वामी भी चन्द्रमा होता है। परन्तु २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है इसलिए इसी घंटे के स्वामी के नाम से अगला दिन चन्द्रवार पड़ा। इसी प्रकार और वारों का नामकरण २ हुआ है। अब यह स्पष्ट हो गया कि शनिवार के बाद रविवार और रविवार के बाद सोमवार और सोमवार के बाद मंगलवार क्यों होता है। ग्रहों के क्रम में शनि से रवि चौथा ग्रह है, रवि से चंद्रमा चौथा ग्रह है, चन्द्रमा से मंगल चौथा ग्रह है। इसलिए यह नियम हो गया है कि ग्रहों के क्रम को शनि से गिनते हुए प्रत्येक चौथा ग्रह अगले वार का स्वामी होता है। १. पृथ्वी से बुध शुक्र की अपेक्षा अधिक दूर है परन्तु हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में शुक्र ही अधिक दूर माना गया है। कारण इसका यह है कि जो ग्रह जितनी ही दूर है उतनी ही देर में वह भगण पूरा करता है। ऐसा विश्वास हमारे ज्योतिषियों का भी है परन्तु इन्होंने पृथ्वी से यह दूरी ली है और आधुनिक ज्योतिषियों ने सूर्य से । २. वारों का यह क्रम प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। परन्तु इनके नामकरण की उपपत्ति जैसी यहाँ की गयी है वैसी कहीं और भी है या नहीं यह खोजने के योग्य है ।

४२ सूर्य सिद्धान्त मासपति—यदि किसी सावन मास का पहला दिन रविवार हो तो अगले सावन मास का पहला दिन रविवार से ३१वाँ दिन होगा क्योंकि सावन मास ३० दिन का होता है । परन्तु रविवार से ३१वां दिन पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन मंगलवार होता है । इसलिए दूसरे सावन मास का स्वामी मंगल ग्रह हुआ । तीसरे सावन मास का पहला दिन मंगलवार से ३१वां हुआ अर्थात् मंगलवार से आरम्भ करके पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन, वृहस्पतिवार हुआ । इसलिए तीसरे सावन मास का स्वामी वृहस्पति हुआ । इसी प्रकार चौथे सावन मास का स्वामी, वृहस्पति- वार से तीसरे दिन शनिवार का स्वामी शनि और पांचवें सावन मास का स्वामी शनिवार से तीसरे दिन सोमवार का स्वामी सोम तथा छठें सावन मास का स्वामी बुध और सातवें सावन मास का स्वामी शुक्र हुआ । आठवें सावन मास से फिर यह क्रम चलेगा । इसलिए वारों के क्रम से तीसरा वार आने वाले सावन मास का पहला दिन तथा उसका स्वामी उस सावन मास का स्वामी होता है । अब यदि ध्यान से देखा जाय तो जान पड़ेगा कि मासपतियों का क्रम ग्रहों के क्रम के अनुसार इस प्रकार है— रवि, मंगल, वृहस्पति, शनि, सोम, बुध और शुक्र; फिर रवि, मंगल, वृहस्पति शनि इत्यादि । यदि चन्द्रमा से यह चक्र आरंभ हो तो इनका क्रम वही रहेगा जिस क्रम से ये पृथ्वी से क्रमानुसार दूर समझे गये हैं । वर्षपति—सावन वर्ष का आरम्भ जिस दिन से होता है उसी दिन का स्वामी उस वर्ष का स्वामी समझा जाता है । यदि पहले सावन वर्ष का आरम्भ रविवार को हो तो दूसरे सावन वर्ष का आरम्भ रविवार से ३६१वें दिन होगा जो ५१ सप्ताह के बाद वाले सप्ताह का चौथा दिन अर्थात् बुधवार है इसलिए दूसरे सावन वर्ष का स्वामी बुध होगा । तीसरे सावन वर्ष का आरम्भ दूसरे सावन वर्ष से ३६१वें दिन होगा इसलिए यह बुधवार से चौथा दिन शनिवार होगा जिसका स्वामी शनि है इसलिए तीसरे सावन वर्ष का स्वामी शनि होगा । इसी प्रकार चौथे सावन वर्ष का स्वामी शनिवार से चौथे दिन मंगलवार का स्वामी मंगल है । पाँचवें सावन वर्ष का स्वामी, मंगलवार से चौथे दिन शुक्रवार का स्वामी शुक्र है । छठें सावन वर्ष का स्वामी शुक्रवार से चौथे दिन सोमवार का स्वामी सोम, सातवें सावन वर्ष का स्वामी सोमवार से चौथे दिन वृहस्पतिवार का स्वामी वृहस्पति तथा आठवें सावन वर्ष का स्वामी वृहस्पतिवार से चौथे दिन रविवार का स्वामी रवि फिर होगा । इस तरह आठवें सावन वर्ष से फिर वही क्रम आरम्भ होगा । इन स्वामियों का क्रम इस प्रकार हुआ रवि, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, सोम, वृहस्पति; फिर रवि, बुध, शनि इत्यादि । इसलिए यदि वारों के अनुसार क्रम मिलाया जाय तो आने वाले सावन वर्ष का

मध्यमाधिकार ४३ पहला दिन गत सावन वर्ष के पहले दिन से चौथा होगा । और यदि ग्रहों का क्रम मिलाया जाय तो शनि से आरम्भ करके प्रति तीसरा ग्रह वर्ष का स्वामी होता है । इन बातों को सूत्र रूप में भूगोलाध्याय के ७८वें और ७९वें श्लोकों में यों लिखा गया है :— मन्दादधःक्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ।। ७८ ।। ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामिधिपाः स्मृताः । होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधः क्रमशस्तथा ।। ७९ ।। सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय वर्षपति, मासपति, दिनपति और होरापति जानने की दोनों रीतियाँ दो चित्रों (चित्र ५ तथा ६) के द्वारा दिखलायी जाती हैं । वारों के अनुसार क्रम चित्र ५

४४ सूर्य सिद्धान्त

वारों के नामों तथा वर्षपतियों और मासपतियों के सम्बन्ध का यह नियम जान लेने पर अब ५१वें और ५२वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझी जा सकती है । इष्टकाल तक जो अहर्गण ( सावन दिन ) आया हो उसको सात से भाग देने पर जो शेष बचे उतने ही दिन सप्ताह के बीत चुके हैं । सृष्टि का आरम्भ रविवार से हुआ इसलिए रविवार सप्ताह का पहला दिन है और शनिवार पिछला दिन अर्थात् सातवाँ दिन । इसलिए यदि शेष ५ बचे तो समझना चाहिए कि वृहस्पति का दिन है जिसकी मध्य रात्रि को वह अहर्गण पूरा होता है क्योंकि वृहस्पति सप्ताह का पाँचवाँ दिन है । जैसे पिछले उदाहरण में अहर्गण की जो संख्या ७,१४,४०,४१,३१,६०३ आयी है उसको सात से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए जिस दिन का अहर्गण निकाला गया है वह सप्ताह का पहला दिन रविवार है । परन्तु यह अहर्गण बसंत-पंचमी से पहले की अर्द्धरात्रि तक का है इसलिए बसंत-पंचमी को सोमवार होगा । मासपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३० से भाग देना चाहिए जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से सावन मासों की संख्या हुई । इन सावन मासों को दो से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो, क्योंकि मासपतियों का क्रम वार के अनुसार तीसरे दिन बदलता है और सात मास बीतने पर फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे, सप्ताह के उसी दिन का स्वामी उस मास का स्वामी होता है जो चल रहा है । जैसे ऊपर के अहर्गण को ३० से भाग देने पर २३, ८१,३४,७१,०५३ सावन मास और १३ सावन दिन होते हैं । इन सावन मासों की संख्या को २ से गुणा करके १ जोड़ने पर ४७,६२,६६,४२,१०७ होता है । इसको ७ से भाग देने पर शेष ३ बचता है । इसलिए चलते सावन मास का पहला दिन मंगलवार था । इसलिए इस मास का स्वामी मंगल है । वर्षपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३६० से अथवा ऊपर निकाले हुए सावन मासों को १२ से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उतने ही सावन वर्ष बीते हैं । इनको तीन से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो क्योंकि वर्षपतियों का क्रम वार के अनुसार चौथे दिन बदलता है और सात वर्ष के बाद फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे (सप्ताह के) उसी दिन का स्वामी चलते सावन वर्ष का स्वामी होता है क्योंकि सप्ताह का आरम्भ रविवार से होता है । जैसे ऊपर के उदाहरण में अहर्गण को ३६० से भाग देने पर अथवा सावन मासों को १२ से भाग देने पर गत सावन वर्षों की संख्या १,६८,४४,५५,६२१ हुई ।

मध्यमाधिकार ४५ इसको तीन से गुणा कर १ जोड़ने से ५,६५,३३,६७,७३४ हुआ । इसको ७ से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए चलते सावन वर्ष का आरंभ रविवार को हुआ और इस वर्ष का स्वामी रवि हुआ । चित्र ६- पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के अनुसार क्रम यह तो हुई सूर्य सिद्धान्त के अनुसार वर्षपति निकालने की रीति । आज- कल के सभी पंचांगों में वर्षपति (वर्षेश) उस दिन का स्वामी माना जाता है जिस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा होती है और वर्ष का मंत्री उस दिन का स्वामी समझा जाता है जिस दिन मेष संक्रान्ति होती है। मेघेश उस दिन का स्वामी होता है जिस दिन आर्द्रा नक्षत्र लगता है, इत्यादि इसी विचार से वर्ष भर का फल निकाला जाता है । मकरंद सारिणी में सूर्य सिद्धान्त से भिन्न नियम यह है:-- चैत्र शुक्ल प्रतिपद्दिवसे यो वारः स राजा । मेष संक्रान्ति दिवसे यो वारः स मंत्री । कर्क संक्रान्ति दिवसे यो वारः स सत्याधिपः । तुला संक्रान्ति दिवसे (यो) वारः स रसाधिपः । मृग संक्रान्ति दिवसे यो वारो (स) नीरसाधिपः । आर्द्राप्रवेश

४६ सूर्य सिद्धान्त दिवसे यो वारः स मेघाधिपः । धनुः संक्रान्ति दिवसे यो वारः स पश्चिमधान्याधिपः* ॥ सावन वर्ष तथा सावन मास का व्यवहार आजकल कहीं नहीं है । इसलिए वर्षाधिप और मासाधिप निकालने का जो नियम सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है वह किस काम आता है यह मैं नहीं जानता । यदि कोई सज्जन जानते हों तो कृपया सूचित करें । तेरहवें श्लोक से, जैसा कि मैंने उसकी टिप्पणी में लिखा है, यह ध्वनि निकलती है कि यथार्थ वर्ष सौर वर्ष ही है । फिर सावन वर्ष और सावन मास के अनुसार वर्षपति और मासपति निकालने की क्या आवश्यकता है ? यथा स्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः । विभाजितो मध्यगतो भगणादिग्रहो भवेत् ॥५३॥ एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः । विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः ॥५४॥ अनुवाद—(५३) जितने अहर्गण आवें उनसे किसी ग्रह के महायुगीय भगण को गुणा कर दो और गुणनफल को महायुगीय सावन दिनों से भाग दे दो। जो लब्धि आवेगी उतने ही भगण उस ग्रह के (सृष्टि के आदि से) मध्यम गति के अनुसार पूरे हुए हैं । जो शेष बचे उसको १२ से गुणा करके फिर (महायुगीय सावन दिनों से) भाग देने से उस राशि की संख्या आवेगी जितनी राशियां वह ग्रह वर्तमान भगण में पूरा कर चुका है । अब जो शेष बचे उसको ३० से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर उन अंशों की संख्या निकल आवेगी जितने अंश वह ग्रह वर्त्तमान राशि में पूरा कर चुका है इत्यादि । (५४) इसी प्रकार पहले कहे हुए पूर्व की ओर चलने वाले शीघ्रों और मन्दोच्चों के स्थान भी जाने जा सकते हैं। पातों की गति उलटी (पच्छिम की ओर) होती है, इसलिए पातों की जो राशि अंश कला विकला आवें उनको पूरे चक्र में से अर्थात् १२ राशि में से घटा देने पर, जो शेष बचे वही पातों के स्थान हैं ॥ ५३-५४ ।। विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में वह रीति बतलायी गयी है जिससे किसी इष्ट समय में ग्रहों के मध्यम स्थान जाने जाते हैं । इसका संक्षेप में अर्थ यह है कि जब एक महायुग में (महायुगीय सावन दिनों में) ग्रह ऊपर कहे हुए भगण करता है तब इष्ट समय तक के सावन दिनों में कितने भगण करेगा । इसलिए त्रैराशिक की रीति से इस नियम को यों प्रकट कर सकते हैं :— महायुगीय सावन दिन : इष्ट अहर्गण :: महायुगीय भगणः इच्छित भगण

  • वेंकटेश्वर प्रेस की १६६० वि० की छपी मकरंद सारिणी पृष्ठ ४७६

मध्यमाधिकार ४७ यदि 'स' को महायुगीय सावन दिन, 'अ' को इष्ट अहर्गण, 'भ' को महायुगीय भगण तथा 'भा' को अभीष्ट भगण माना जाय तो संक्षेप में इसको यों लिखेंगे :- भा = (अ × भ) / स यह एक भिन्न है, जिसको सरल किया जाय तो जो पूर्णाङ्क आवेगा वह ग्रह के उन भगणों की संख्या है जो उस समय तक पूरे हो चुके हैं और शेष भिन्न को १२ से गुणा करके सरल करने पर जो पूर्णाङ्क आवेगा वह गत राशि तथा फिर जो भिन्न होगी उसको ३० से गुणा करके सरल करने पर वर्तमान राशि के अंश निकलेंगे । यदि कला विकला भी जानना हो तो ६० से गुणा करके सरल करते जाना होगा । यह नियम सभी पूर्व चलने वाले ग्रहों, शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के लिए लागू है। यदि किसी ग्रह के पातों का स्थान जानना हो तो ऊपर लिखी रीति से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे उसे १२ राशियों में से घटा देना चाहिये क्योंकि पात की चाल उलटी होती है इसलिए वह उलटे क्रम से राशि चक्र पर चलेगा । यदि गणित से निकले कि अमुक पात 'भा' भगण पूरे करके २ राशि ३ अंश ५ कला पर है, तो इसे मेष के आदि बिन्दु से उलटा गिनना चाहिये अर्थात् मीन, कुंभ, और मकर के अंतिम बिंदु से ३ अंश ५ कला अर्थात् मकर के २६ अंश ५५ कला पर । इसलिए यदि १२ राशियों में २ राशि ३ अंश ५ कला घटाया जाय तो ९ राशि २६ अंश ५५ कला आवेगा जिसका अर्थ यह हुआ कि वह पात राशि चक्र की ९ राशियों के उपरान्त दसवीं राशि के २६ अंश ५५ कला पर है। द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणा वर्तमानकैः । राशिभिस्सहिताश्शुद्धाष्षष्ट्या स्युर्विजयादयः ॥५५॥ अनुवाद—बृहस्पति के गत भगणों को १२ से गुणा करके गुणनफल में वर्तमान भगण की जिस राशि में बृहस्पति हो उसकी क्रम संख्या को जोड़ दे, योगफल को ६० से भाग देने पर जो शेष बचे उसी क्रम संख्या का सम्वत्सर विजय से आरंभ होकर चल रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ विज्ञान भाष्य—बृहस्पति मध्यम गति से जितने समय में एक राशि चलता है उसको सम्वत्सर कहते हैं। इसलिए वृहस्पति के एक भगण काल में (४३३२·३२०६ सावन दिनों में) बारह सम्वत्सर होते हैं और एक सम्वत्सर में ३६१·०२६७२ सावन दिन होते हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि सौर वर्ष की अपेक्षा संवत्सर ४·२३२०३ सावन दिन छोटा और सावन वर्ष से १·०२६७२ सावन दिन बड़ा होता है।

४८ सूर्य्य सिद्धान्त एक चक्र में ६० सम्वत्सर होते हैं जिनके नाम क्रम से यह हैं :— १ विजय २१ प्रमादी ४१ श्रीमुख २ जय २२ आनन्द ४२ भाव ३ मन्मथ २३ राक्षस ४३ युवा ४ दुर्मुख २४ अनल (नल) ४४ धाता ५ हेमलम्ब २५ पिंगल ४५ ईश्वर ६ विलम्ब २६ कालयुक्त ४६ बहुधान्य ७ विकारी २७ सिद्धार्थी ४७ प्रमाथी ८ शार्वरी २८ रौद्र ४८ विक्रम ९ प्लव २९ दुर्मति ४९ वृष १० शुभकृत ३० दुंदुभी ५० चित्रभानु ११ शोभन ३१ रुधिरोद्गारी ५१ सुभानु १२ क्रोधी ३२ रक्ताक्ष ५२ तारण १३ विश्वावसु ३३ क्रोधन ५३ पार्थिव १४ पराभव ३४ क्षय ५४ व्यय १५ प्लवंग ३५ प्रभव ५५ सर्वजित १६ कीलक ३६ विभव ५६ सर्वधारी १७ सौम्य ३७ शुक्ल ५७ विरोधी १८ साधारण ३८ प्रमोद ५८ विकृति १९ विरोधकृत ३९ प्रजापति ५९ खर २० परिधावी ४० अंगिरा ६० नन्दन वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में¹ संवत्सर चक्र का आरंभ विजय से न मानकर ३५वें सम्वत्सर प्रभव से माना है। यही प्रथा आजकल भी प्रचलित है। यह प्रथा कब से आरंभ हुई इसकी खोज करना आवश्यक है। ६० संवत्सरों के चक्र में कई छोटे-छोटे विभाग हैं जिनका आरंभ भी प्रभव से ही होता है। इनकी चर्चा मानाध्याय नामक अंतिम अध्याय में की जायगी । १. नवलकिशोर प्रेस से १८८४ ई० में प्रकाशित और पं० दुर्गाप्रसाद जी द्वारा अनुवादित पृष्ठ ६०— आद्यं धनिष्ठांशमभिप्रपन्नो माघे यदायात्युदयं सुरेज्यः । षष्ठ्यब्द पूर्वंः प्रभवः सनाम्ना प्रवर्तते भूतहितास्तदाब्दः ॥

मध्यमाधिकार ४६ जब यह जानना हो कि किसी इष्ट समय में कौन संवत्सर चल रहा है तब सबसे पहले ५३वें श्लोक के अनुसार यह जानना चाहिये कि उस समय वृहस्पति का मध्यम स्थान क्या है । सृष्टि के आदि से अहर्गण निकाल कर मध्यम ग्रह जानने की क्रिया बहुत कठिन है, इसलिए यदि कलियुग के आदि से अहर्गण साधा जाय तो अधिक सुभीता होगा; क्योंकि इस समय से भी विजय सम्वत्सर का आरंभ हुआ है । जो लोग दशमलव भिन्न की रीति जानते हों उनको अहर्गण की जगह सौर वर्षों से काम लेने में और भी सुभीता होगा । इस प्रकार मेष-संक्रान्ति के समय वृहस्पति का जो मध्यम स्थान होगा वह निकल आवेगा । जैसे मान लीजिये कि यह जानना है कि सम्वत् १६८१ विक्रमीय मेष संक्रान्ति के समय कौन सम्वत्सर वर्तमान होगा और वह कितने दिन तक रहेगा ? कलियुग के आरंभ से १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति तक ५०२५ सौर वर्ष बीत चुकेंगे । उस समय तक वृहस्पति कितने भगण पूरा करके किस राशि पर रहेगा, यह जान लेने से सम्वत्सर का पता चल जायगा । एक महायुग अर्थात् ४३,२०,००० सौर वर्षों में वृहस्पति के ३,६४,२२० भगण होते हैं; इसलिए ५०२५ सौर वर्षों में ३,६४,२२० × ५०२५ = --------------------- भगण ४३,२०,००० ३,६४,२२० × ५०२५ = --------------------- × १२ संवत्सर ४३,२०,००० = ५०८३.६०४१६६६६ संवत्सर होते हैं । जिसका अर्थ यह हुआ कि १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति के समय ५०८४वां सम्वत्सर चल रहा है, उसका .६०४१६६६६ भाग बीत गया है और, .३९५८३३३४ भाग रह गया है । ६० संवत्सरों का एक चक्र होता है इसलिए ५०८४ को ६० से भाग देने पर ८४ लब्धि आती है और ४४ शेष होता है जिसका अर्थ यह हुआ कि कलियुग से ६० सम्वत्सरों का चक्र ८४ बार हो चुका है ८५वें चक्र का ४४वां सम्वत्सर धाता चल रहा है और मेष संक्रान्ति के समय उसका .३९५८३३... भाग बीतने को शेष है । यदि यह जानना हो कि धाता सम्वत्सर १६८१ विक्रमीय में कितने दिन तक रहेगा तो इस शेष को एक सम्वत्सर के सावन दिनों से अर्थात् ३६१.०२६७२ से गुणा कर देना चाहिये । ऐसा करने से गुणनफल १४२.५६८४ सावन दिन आता है, इसलिए १६८१ को मध्यम मेष संक्रान्ति के समय से १४२.५६८४ सावन दिन बीतने ४

५० सूर्य सिद्धान्त पर धाता का अंत और ईश्वर नामक सम्वत्सर का आरम्भ होगा । यह पहले बतलाया गया है कि स्पष्ट मेष संक्रान्ति मध्यम मेष संक्रान्ति से २.९७०७ सावन दिन पहले ही होती है; इसलिए स्पष्ट मेष संक्रान्ति से ३६.०७६६१ सावन दिन पर अथवा ३६ दिन ४६ घड़ी ८ पल ४० विपल पर ईश्वर का प्रवेश होगा । विस्तरेणैतदुदितं संक्षेपाद्व्यावहारिकम् । मध्यमानयनं कार्यं ग्रहाणामिष्टतो युगात् ॥५६॥ अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः । विना तु पातमान्दोच्चान्मेषादौ तुल्यतामिताः ॥५७॥ मकरादौ शशाङ्कोच्चं तत्पातस्तु तुलादिगः । निरंशत्वं गताश्चान्येनोक्तास्ते मन्द चारिणः ॥५८॥ अनुवाद—(५६) ग्रहों के मध्यम स्थान जानने की रीति अब तक विस्तार के साथ कही गयी है; परन्तु व्यवहार के लिए इष्ट युग से ही यह काम संक्षेप में करना चाहिये । (५७) इस सत्ययुग के अंत में पातों और मन्दोच्चों को छोड़कर सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे अर्थात् सातों ग्रह मेष के आरम्भ स्थान पर पहुँचे हुए थे । (५) चन्द्रमा का उच्च मकर राशि के आदि में तथा उसका पात (राहु) तुला के आदि में थे । अन्य ग्रहों के पात और मन्दोच्च मन्दगति के कारण किसी पूरे अंश पर नहीं थे; इसलिए इनके बारे में कुछ नहीं कहा जाता है । (५६—५८)॥ विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के ४५-५० श्लोकों में ग्रहों के मध्यम स्थान निकालने की जो रीति बतलायी गयी है वह गणित विस्तार के कारण व्यवहारोपयोगी नहीं है जैसा कि दिये हुए उदाहरणों से स्पष्ट है । इसलिए सृष्टि के आदि से सत्य- युग के अंत तक के वर्षों का अहर्गण निकालने की कोई आवश्यकता नहीं है । वर्तमान युग का आरम्भ जबसे हुआ है तभी से इष्टकाल तक का अहर्गण ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६-५० श्लोकों के अनुसार जानकर ग्रहों के मध्यम स्थान जान लेने चाहिये । जिस समय सूर्यांश पुरुष ने मय को सूर्य सिद्धान्त का उपदेश दिया है वह इसी अध्याय के दूसरे श्लोक के अनुसार सत्ययुग के अंत का समय है, इसलिए ५७वें श्लोक में त्रेता के आदि से अहर्गण बनाने का संकेत है और यह भी दिखलाया गया है कि इस समय सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष राशि के आदि में समान थे । इस नियम के अनुसार कलियुग में कलियुग के आदि से ही अहर्गण निकालने की रीति सुविधाजनक है जो आजकल प्रचलित भी है । जैसे त्रेता के आदि में सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे वैसे ही कलियुग के आदि में भी मेष राशि के आदि में

मध्यमाधिकार ५१ समान थे; क्योंकि त्रेता के आदि से कलियुग के आदि तक आधा महायुग होता है जितने समय में सब ग्रह पूरे-पूरे भगण करते हैं । हाँ चन्द्रमा का उच्च एक महायुग में विषम भगण करने के कारण मकर के आदि में न होकर कर्क के आदि में था, परन्तु पात तुला के ही आदि में था । यह मत सूर्यसिद्धान्त का है। भास्कराचार्य १ के अनुसार कलियुग के आदि में सूर्य चन्द्रमा के सिवा अन्य ग्रहों के मध्यम स्थान यह थे :- मंगल बुध गुरु शुक्र शनि चंद्रोच्च राहु* राशि ११ ११ ११ ११ ११ ४ ५ अंश २६ २७ २६ २८ २८ ५ ३ कला ३ २४ २७ ४२ ४६ २६ १२ विकला ५० २६ ३६ १४ ३४ ४६ ५८ यहाँ तक तो वह रीति बतलायी गयी है, जिससे ग्रहों का मध्यस्थान लंका या उज्जैन की आधी रात के समय का निकलता है। आगे के श्लोकों में लंका के पूरब पच्छिम के देशों में आधी रात के समय ग्रहों का मध्य स्थान जानने की रीति बतलायी जायगी । योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णो द्विगुणानि तु । तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ॥ ५६ ॥ अनुवाद-पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है; इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है वह पृथ्वी की परिधि है ॥ ५६ ॥ विज्ञान भाष्य—यदि पृथ्वी का व्यास 'व' मान लिया जाय तो इसकी परिधि = √व² × १० = व × √१० = व × ३·१६२३, जिससे सिद्ध होता है कि परिधि व्यास का ३·१६२३ गुना होती है । आजकल यह सम्बन्ध ३·१४१६ दशमलव के चार स्थान तक शुद्ध समझा जाता है जो ३·१६२३ से बहुत भिन्न है । परन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्यसिद्धान्तकार को व्यास और परिधि का ठीक- १. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ३२-३३; कलकत्ते की १८१५ ई० की छपी ।

  • राहु की यह स्थिति कलकत्ते की छपी सिद्धान्त शिरोमणि में तथा म. म. पं० बापूदेव शास्त्री की संपादित सिद्धान्त शिरोमणि में लिखी है; परन्तु मेरी गणना से इसको ६ राशि २६ अंश ४७ कला २·४ वि० पर कलियुग के आरम्भ में होना चाहिये जो १२ राशियों में से ऊपर दी हुई स्थिति को घटाने से आती है ।

५२ सूर्य सिद्धान्त ठीक सम्बन्ध मालूम नहीं था; क्योंकि दूसरे अध्याय में अर्द्धव्यास और परिधि का अनुपात ३४३८ : २१६०० माना गया है, जिससे परिधि व्यास का ३.१४१३६ गुना ठहरती है । इसलिए इस श्लोक में परिधि को व्यास का √१०, सुविधा के लिए, गणित की क्रिया संक्षेप करने के लिए, माना गया है; जैसे आजकल जब स्थूल रीति से काम लेना होता है तब कोई इसको २२/७ और कोई ३.१४ मानते हैं और जहाँ बहुत सूक्ष्म गणना करने की आवश्यकता पड़ती है वहाँ दशमलव के पांच-पांच सात- सात स्थानों तक इसको शुद्ध लेना पड़ता है । भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में इस सम्बन्ध का मान क्या लिया गया है यह नीचे के अवतरण से जान पड़ेगा । सूर्यसिद्धान्त \ व्यास : परिधि व्यास : परिधि ब्रह्मगुप्त१ } १ : √ १० अर्थात् १ : ३.१६२३ द्वितीय आर्यभट२ / प्रथम आर्यभट३ २०००० : ६२८३२ ,, १ : ३.१४१६ द्वितीय आर्यभट२ \ २२ : ७ अर्थात् १ : ३.१४२८ भास्कराचार्य४ / भास्कराचार्य४ १२५० : ३९२७ ,, १ : ३.१४१६ ३४३८ कला को
त्रिज्या मानने से, जो
ब्राह्मस्फुट के सिवा > ६८७६ : २१६०० ,, १ : ३.१४१३६ सभी सिद्धान्तों में / पाया जाता है । / आजकल के सूक्ष्म गणित से १ : ३.१४१५९२७ . भास्कराचार्य और द्वितीय आर्यभट ने दो प्रकार से व्यास और परिधि का संबंध बतलाया है, एक सूक्ष्म तथा दूसरा स्थूल और व्यवहारोपयोगी । आगे व्यास और परिधि के सम्बन्ध को π चिह्न से सूचित किया जायगा जैसी कि आज कल प्रथा है अर्थात् यदि व्यास १ है तो परिधि π है, जब कि π का मान व्यवहार के १. ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गोलाध्याय श्लोक १५ । २. महासिद्धान्त पाटीगणिताध्याय श्लोक ८८, ६२ । ३. आर्यभटीय पृष्ठ २६ श्लोक १०, (ब्रह्मप्रेस इटावा का छपा) । ४. लीलावती पृष्ठ ५४ क्षेत्रव्यवहाराध्याय श्लोक ४० ।

मध्यमाधिकार ५३ अनुसार २२/७, ३.१४, ३.१४२, ३.१४१६ इत्यादि जैसा आवश्यक हो लिया जा सकता है । इस श्लोक में दूसरा शब्द 'योजन' बड़े महत्व का है । आजकल लोग योजन को साधारणतः चार कोस का समझते हैं परन्तु कोस का मान स्वयम् स्थिर नहीं है । किसी-किसी प्रान्त में कोस बहुत छोटा होता है और किसी प्रान्त में बहुत बड़ा । इसी प्रकार योजन का भी परिमाण स्थिर नहीं है । यही कारण है कि भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में भूपरिधि या भूव्यास के मान भिन्न-भिन्न अंकों में दिये हुए हैं । नीचे लिखे अवतरणों से प्रकट होगा कि सिद्धान्तों में भूव्यास के मान क्या दिये हुए हैं:— पंचसिद्धान्तिका के१ मत से भूव्यास १०१८ ८/६० योजन आर्यभट२ और लल्ल ,, ,, १०५० ,, वर्तमान सूर्यसिद्धान्त ,, ,, १६०० ,, सिद्धान्त शिरोमणि३ ,, ,, १५८१ १५/३७ ,, द्वितीय आर्यसिद्धान्त (महासिद्धान्त)४ २१०६ ,, आधुनिक यूरोपीय मत से५ विषुवद्वृत्तीय ७६२७ मील ध्रुवीय ७६०० ,, ऊपर के अंकों से प्रकट है कि वराहमिहिर, आर्यभट तथा लल्ल के योजन प्रायः समान हैं और सूर्य सिद्धान्त तथा सिद्धान्तशिरोमणि के भी योजन प्रायः समान हैं; परन्तु पहले के तीन आचार्यों का योजन इन दोनों के योजन का प्रायः डेढ़ गुना है । इसलिए इन्हीं दो प्रकार के योजनों की तुलना वर्तमान मील से की जायगी । हमारे सिद्धान्तों में पृथिवी को बिलकुल गोल माना गया है जिससे यह भेद नहीं रखा १. डाक्टर थीबो और पं० सुधाकर द्विवेदी संपादित पंचसिद्धान्तिका. पृष्ठ ३४ श्लोक १८ में भूपरिधि का मान ३२०० योजन दिया है जिसको ३.१४१६ से भाग देने पर १०१८.६ योजन पृथिवी का व्यास हुआ । २. आर्यभटीय पृष्ठ १०, प्रथम पाद का ५वाँ श्लोक । ३. गोलाध्याय पृष्ठ २०, भुवनकोश श्लोक ५२ । ४. महासिद्धान्त पृष्ठ १६१, भुवनकोश श्लोक ३५ । ५. Sir Robert Ball's Spherical Astronomy pp, 44.

५४ सूर्य सिद्धान्त गया कि विषुवद्वृत्तीय भूपरिधि ध्रुवीय भूपरिधि से भिन्न है । इसलिए तुलना के लिए ध्रुवीय भूपरिधि ही लेना उचित होगा क्योंकि आचार्यों ने इसी की नाप से भूपरिधि का परिमाण स्थिर किया था । इसलिए, आर्यभट के मत से १०५० योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १०५० मील = ७·५२ मील यदि १ योजन में चार कोस हों तो १ कोस = ७.५२ / ४ मील = १.८८ मील सिद्धान्तशिरोमणि के मत से १५८१ योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १५८१ मील = ५ मील ∴ १ कोस = ५/४ योजन = १ १/४ मील आजकल १ कोस २ मील के समान समझा जाता है इसलिए आजकल का योजन आर्यभट के योजन से बहुत मिलता है । सिद्धान्तशिरोमणि वाला कोस आज- कल के ‘गऊ-कोस’ (गो-कोस) के कदाचित् समान हो, जो किसी-किसी प्रान्त में अब तक प्रचलित है । अब प्रश्न यह रह गया कि भूपरिधि नापी कैसे गयी । सूर्य सिद्धान्त में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा गया है । भास्कराचार्य १ कहते हैं कि उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों की दूरी योजनों में नाप लो । उन दो स्थानों के अक्षांशों का भी अन्तर निकालो । फिर त्रैराशिक द्वारा यह जान लेना चाहिये कि जब इतने अक्षांशों में अन्तर होने से दो स्थानों की दूरी इतने योजन होती है तब ३६०° पर क्या होगी । इसकी उपपत्ति यह है : चित्र ७ में एक ही उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों (स, सा) का योजनात्मक अन्तर स सा नापना चाहिये । फिर दोनों के अक्षांशांतर स भ सा कोण को जानना चाहिये । १. गोलाध्याय भुवनकोश, पृष्ठ १३ श्लोक १४— पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात् तदक्ष विश्लेष लवैस्तदाकिम् । चक्रांशकैरित्यनुपातयुक्त्या युक्तं निरुक्तं परिधेः प्रमाणम् ॥ अथवा गणिताध्याय, पृष्ठ ५६ श्लोक १— याम्योदक पुरयोः पलान्तर हतं भूवेष्ठनं भांश हृत् । तद्भक्तस्य पुरान्तराध्वन इह ज्ञेयं समं योजनम् ॥

मध्यमाधिकार ५५ चित्र ७ भ = पृथ्वी का केन्द्र । वभ = विषुवद्वृत्तीय त्रिज्या । उ = उत्तरी ध्रुव या सुमेरु । स, सा एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा (meridian) के दो स्थान । स का अक्षांश = < व भ स । सा ,, = < व भ सा । दोनों के अक्षांशों का अन्तर = < स भ सा । फिर यह अनुपात करना चाहिए < स भ सा : ३६०° : : स सा : भूपरिधि ३६०° × स सा ∴ भूपरिधि = ----------------- < स भ सा अक्षांश निकालने की रीति त्रिप्रश्नाध्याय नामक तीसरे अध्याय में कई प्रकार से बतलाई जायगी । भूपरिधि इसी रीति से आजकल भी नापी जाती है; केवल सूक्ष्मयंत्रों के कारण अब अधिक शुद्धतापूर्वक यह काम किया जाता है ।