सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
५६ सूर्य सिद्धान्त लम्बज्याघ्नस्त्रिज्योवाप्तस्फुटो भूपरिधिः स्वकः । तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ॥६०॥ कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः प्रविशोधयेत् । रेखाप्रतीची संस्थानां प्रक्षिपेत्तु स्वदेशजम् ॥६१॥ अनुवाद—(६०) भूपरिधि को (अपने स्थान की) लम्बज्या से गुणा करके त्रिज्या से भाग देने पर अपने स्थान की स्फुट परिधि निकलती है । अपने स्थान के देशान्तर योजना को ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके गुणनफल को इसी स्फुट परिधि से भाग देना चाहिये । (६१) (यदि दैनिक गति कला में ली गयी है तो) फल कला में आवेगा । यदि अपना स्थान लंका से पूरब में हो तो लंका की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यमग्रह में से इस फल को घटाना चाहिये और यदि अपना स्थान लंका से पच्छिम में हो तो जोड़ना चाहिये । ऐसा करने से अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यम ग्रह (ग्रहों के मध्यम स्थान) निकल आते हैं ॥६०-६१॥ विज्ञान भाष्य—बीज-गणित के अनुसार इन श्लोकों को इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं :— भूपरिधि × लम्बज्या स्फुट परिधि = ——————————— (१) त्रिज्या देशान्तर } देशान्तर योजन × ग्रह की दैनिक गति (कला में) फल } = —————————————————————— (२) स्फुट परिधि अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यम ग्रह = लंका की अर्द्धरात्रि के मध्यम ग्रह ± देशान्तर फल . (३) यदि स्थान लंका से पूरब हो तो ऋणात्मक चिह्न और पच्छिम हो तो धनात्मक चिह्न लेना चाहिये । इसकी उपपत्ति समझने के लिए पहले यह जानना चाहिये कि लम्बज्या, स्फुट परिधि, देशान्तर इत्यादि क्या हैं ? ज्या—यदि किसी समकोण त्रिभुज के किसी भुज की लम्बाई को उसके कर्ण की लम्बाई से भाग दे दिया जाय तो लब्धि उस भुज के सामने के कोण की ज्या कहलाती है । चित्र ८ में स भा भ एक समकोण त्रिभुज है; इसलिए इसके स भ भा कोण की ज्या = सभा / सभ और भ स भा कोण की ज्या = भभा / सभ । समकोण त्रिभुज के
मध्यमाधिकार ५७ स भ भा चित्र ८ कर्ण की लम्बाई किसी भुज की लम्बाई से अधिक होती है; इसलिए किसी भुज के सामने के कोण की ज्या एक से कम होगी इसलिए ज्या दशमलव भिन्न में लिखी जाती है । यह आजकल की प्रथा है । प्राचीन काल में जब कि दशमलव भिन्न का प्रचार नहीं था कोण की ज्या पूर्णाङ्कों में लिखी जाती थी । किसी कोण की ज्या जानने के लिए हमारे सिद्धान्तों में ऐसा वृत्त लिया गया है, जिसकी त्रिज्या (अर्द्धव्यास) ३४३८ इकाइयां और परिधि २१६०० इकाइयां होती हैं, जिससे एक-एक इकाई एक-एक कला के समान होती है । क्योंकि परिधि एक चक्र के समान होती है जिसमें ३६० अंश अथवा ३६० × ६० = २१६०० कलाएँ होती हैं । फिर केन्द्र से परिधि तक दो त्रिज्याएं ऐसी खींचते हैं जिनके बीच का कोण उस कोण के समान होता है जिसकी ज्या जानना है तथा त्रिज्या और परिधि के मिलन- विन्दु से दूसरी त्रिज्या पर लम्ब डालते हैं । इस लम्ब की लम्बाई जितनी इकाइयाँ (कलाएं) होती हैं उसी को उस कोण की ज्या कहते हैं । चित्र ६ में अ केन्द्र है; अ आ, अ उ तथा अ ऊ तीन त्रिज्याएं हैं जो अ से परिधि तक खींची गई हैं । उ या ऊ से उ इ या ऊ ई लम्ब अ आ पर डाले गये हैं । त्रिज्या की नाप ३४३८ इकाइयों में मानकर उ इ या ऊ ई को जो नाप इन्हीं इकाइयों में होगी वह उ अ इ कोण या
३८ सूर्य सिद्धान्त चित्र ६ ऊ अ ई कोण की ज्या कहलायेगी । जो लोग केवल आजकल की प्रथा से परिचित हैं उन्हें भ्रम हो सकता है; इसलिए उन्हें यह भेद अच्छी तरह समझ लेना चाहिये । त्रिज्या का मान ३४३८ इसलिए लिया गया कि जब परिधि कलाओं में विभाजित की जाती है तब त्रिज्या का मान ३४३७ ३/८ कला आजकल की सूक्ष्म गणना से ठहरता है जिसका निकटतम पूर्णाङ्क ३४३८ है। आजकल के एक रेडियन* (radian) में जितनी कलाएं होती हैं उतनी ही पूर्ण कलाओं के समान त्रिज्या का परिमाण माना गया है । स्फुट परिधि—भूतल का वह वृत्त जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों से समान अन्तर पर दोनों के बीचों बीच होता हुआ भू पृष्ठ को दो समान भागों में बाँटता है विषुवत् रेखा कहलाता है; विषुवत् रेखा के उत्तर वाले आधे भूगोल को उत्तर गोल और दक्षिण वाले को दक्षिण गोल कहते हैं । इस रेखा से आकाशीय ध्रुव (आकाश का वह विन्दु जो पृथ्वी के उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के ठीक ऊपर होता है, उत्तरी ध्रुव तारा उत्तरी ध्रुव से प्रायः १° दूर है) क्षितिज पर दिखाई देते हैं । यहाँ पर अक्षांश शून्य और लम्बांश ९०° होता है। इसलिए विषुवत् रेखा को निरक्षवृत्त भी कहते हैं। चित्र १० में व वा वि विषुवत् रेखा है । यदि किसी स्थान 'स' से निरक्षवृत्त के समानान्तर स सा सि वृत्त (Parallel of latitude) भूतल पर खींचा जाय तो इसके परिमाण को 'स' स्थान की स्फुट परिधि कहते हैं । विषुवत् रेखा से
- १ रेडियन = ५७°•२९५८ = ३४३७•७४८ कला
मध्यमाधिकार ५६ चित्र १० भ = पृथ्वी का केन्द्र । उ = पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव (सुमेरु) । द = पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव (कुमेरु) । व = विषुवत् रेखा का वह विन्दु जो स के ठीक दक्षिण है । स = अभीष्ट स्थान; उसवद स स्थान की उत्तर-दक्षिण रेखा । ∠ व भ स = स का अक्षांश । ∠ स भ उ = स का लम्बांश । उ द = पृथ्वी का अक्ष । स भ = स से पृथ्वी के अक्ष की दूरी = स स्थान की लम्बज्या, सिद्धान्तीय पद्धति से जैसे-जैसे उत्तर या दक्षिण जाइये तैसे-तैसे स्फुट परिधि कम होती जाती है यहां तक कि ध्रुवों पर स्फुट परिधि शून्य हो जाती है । इसी तरह अक्षांश बढ़ता जाता है और लम्बांश कम होता जाता है और ध्रुवों पर अक्षांश ९०° और लम्बांश शून्य हो जाता है । चित्र से यह भी प्रकट है कि 'स' स्थान की स्फुट परिधि स सा सि की
६० सूर्य सिद्धान्त त्रिज्या 'स भा' है जो 'स' की लम्बज्या भी कहलाती है, क्योंकि स का लम्बांश < स भ उ है जिसके सामने की भुज स भा है । रेखागणित से यह सिद्ध है कि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनकी त्रिज्याओं या व्यासों में होता है इसलिए, व भ : स भा :: व वा वि : स सा सि ∵ स सा सि = (व वा वि × स भा) / व भ = (भू परिधि × लम्बज्या) / त्रिज्या , जब त्रिज्या ३४३८ हो और लम्बज्या का मान सिद्धान्तीय पद्धति के अनुसार कलाओं में हो जिसकी सारिणी दूसरे अध्याय में दी हुई । यदि आजकल की प्रथा के अनुसार स्फुट परिधि निकालना हो तो स सा सि = भूपरिधि × लम्बज्या (Sine of Colatitude) जबकि लम्बांश की ज्या दशमलव में दी हुई हो (क्योंकि इस रीति से लम्बज्या = स भा / स भ = स भा / व भ) देशान्तर—चित्र ११ भूगोल के आधे गोले के पृष्ठ का चित्र है जिसमें उत्तर गोल के सी, अ, स, सा स्थानों के अक्षांश एक ही हैं इसलिए इन चारों स्थानों की
[चित्र ११: उपर: उ गोलक के अंदर बिन्दु / रेखाएँ: का, क, सी, अ, स, सा, व, वा, पी, ल, प, पा, स नीचे: द चित्र ११]
मध्यमाधिकार ६१ स्फुट परिधि भी एक ही है। इन स्थानों की उत्तर-दक्षिण-रेखा (Meridian) क्रम से उ सी पी द, उ अ ल द, उ स प द और उ सा पा द हैं। यदि उ अ ल द रेखा पर अ अवन्ती (उज्जैन) और ल लंका के स्थान हों तो इसको भारतवर्ष की मध्य रेखा (standard meridian) कहेंगे; जैसे आजकल ग्रीनविच से जाने वाली उत्तर- दक्षिण-रेखा यूरोप और अमेरिका वालों की भूमध्य रेखा कही जाती है। किसी स्थान की स्फुट परिधि का वह खंड जो उस स्थान की उत्तर-दक्षिण-रेखा और मध्य रेखा के बीच में पड़ जाता है उस स्थान का देशान्तर (योजनों में) (Difference of longitude in yojan) कहलाता है, जैसे स का देशान्तर स अ, सा का देशान्तर सा अ और सी का देशान्तर सीअ हुए। इसी तरह प का देशान्तर प ल, पा का देशान्तर पा ल और पी का देशान्तर पी ल हुए। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि प, स एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर है तथापि प, स के देशान्तर (योजनों में) समान नहीं है क्योंकि स की स्फुट परिधि प की स्फुट परिधि (भूपरिधि) से छोटी है। यदि इसी रेखा पर कोई स्थान क हो तो इसका देशान्तर क का (योजनों में) और भी छोटा होगा। ६०वें श्लोक में देशान्तर का शब्द इसी परिभाषा के अनुसार प्रयुक्त हुआ है। परन्तु यह परिभाषा सरल तथा व्यवहारोपयोगी नहीं है। आगे चलकर ६४वें श्लोक में देशान्तर नाड़ी की चर्चा है। यह भी देशान्तर की एक परिभाषा है जो सरल है; इसलिए इस जगह उसको भी समझा देना उचित होगा। एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर जितने स्थान हैं सब में जैसे क, स, प, ख स्थानों में मध्याह्न या अर्द्ध-रात्रि एक ही समय होती है। परन्तु जो स्थान इस रेखा से पूरब है वहां मध्याह्न या अर्द्धरात्रि पहले और जो स्थान पच्छिम हैं वहाँ पीछे होती है। स पर अ से (मध्य रेखा से) जितना पहले मध्याह्न होता है उतने ही समय को हम स का पूर्व देशान्तर काल (Time difference of longitude) कहते हैं। इसे हम समय की इकाइयों में प्रकट कर सकते हैं; यदि घड़ी पल में लिखें तो इसे देशान्तर घटिका या देशान्तर-नाड़ी कहेंगे और यदि घंटे मिनट में लिखें तो देशान्तर घंटा या मिनट कहेंगे। इस परिभाषा से हमको यह सुविधा होती है कि एक ही बात से हम क, स, प, ख सब का देशान्तर सहज ही प्रकट कर सकते हैं, जब कि योजनों में इनके देशान्तर भिन्न-भिन्न लिखने पड़ेंगे। इसी प्रकार सी पर मध्य रेखा से जितना पीछे मध्याह्न होता है उस समय को सी का पच्छिम देशान्तर काल कहेंगे। आगे पीछे मध्याह्न या मध्यरात्रि इसलिए होती है कि पृथ्वी २४ घंटे में या ६० घड़ी में एक बार अपने अक्ष पर पच्छिम से पूरब की ओर लट्टू की तरह घूम जाती है जिससे सूरज चाँद तारे इत्यादि आकाशीय पिंड पूरब से पच्छिम को चक्कर
६२ सूर्य सिद्धान्त
लगाते हुए जान पड़ते हैं। आकाशीय पिंडों की इस प्रत्यक्ष गति को ही हमारे सिद्धान्तों में प्रवह-वायु-जनित गति कहा गया है। आगे सुविधा के लिए सूरज को ही कभी-कभी चक्कर लगाता हुआ लिखा जायगा, क्योंकि ऐसा मान लेने से हिसाब में कोई बाधा नहीं पहुँचती ।
चित्र १२
चित्र १२ में भ पृथ्वी का केन्द्र और प, ल विषुवत् रेखा पर के दो स्थान हैं; प भ पृथ्वी का अर्द्धव्यास है जो चित्र को स्पष्ट करने के लिए बहुत बढ़ाकर खींचा गया है, यथार्थ में सूर्य की दूरी पृथ्वी के अर्द्धव्यास की कोई तेईस हजार गुनी है। सूर्य पृथ्वी के चारों ओर ६० घड़ी में र रा रि री...मार्ग से एक बार चक्कर लगा लेता है। विषुवत् रेखा को छूती हुए र प रु एक स्पर्श-रेखा है जो प की क्षितिज कहलाती है। जब सूर्य इसके ऊपर रहता है तब प स्थान से दिखाई पड़ता है। जब सूर्य क्षितिज से ऊपर 'र' विन्दु के पास आवेगा तब प निवासियों के लिए सूर्योदय होगा। प में जिस समय मध्याह्न होगा उस समय सूर्य रि पर रहेगा। जब वह रु पर आवेगा तब प-निवासियों को डूबता हुआ देख पड़ेगा और जब रे पर आवेगा तब प में मध्यरात्रि होगी । इसी प्रकार ल स्थान से सूर्य का उदय उस समय देख पड़ेगा जब वह रा' पर होगा, मध्याह्न उस समय होगा जब वह 'री' पर रहेगा, सूर्यास्त उस
मध्यमाधिकार ६३ समय होगा जब वह 'रु' पर रहेगा और अर्द्धरात्रि उस समय होगी जब वह 'रै' पर रहेगा । चित्र से यह स्पष्ट है कि जिस समय 'प' पर सूर्योदय होगा उस समय से उतनी देर पीछे 'ल' पर सूर्योदय होगा जितनी देर में सूर्य 'र' से 'रा' तक जाता है । परन्तु र से रा तक जाने में उसको र च रा कोण अथवा प भ ल कोण घूमना पड़ता है क्योंकि परिधि की दो स्पर्श-रेखाओं के बीच का कोण स्पर्श-बिन्दुओं से खींची गयी त्रिज्याओं के बीच के कोण के समान होता है । यह बात मध्याह्न काल या मध्यरात्रि की सूर्य की स्थितियों से और भी सरलतापूर्वक समझ में आयगी; क्योंकि यह बतलाया ही जा चुका है कि सूर्य के 'रि' पर आने से 'प' पर और 'री' पर आने से 'ल' पर मध्याह्न होता है इसलिए जितनी देर में सूर्य रि' से 'री' तक जाती है प की अपेक्षा उतनी ही देर पीछे ल पर मध्याह्न होगा । इसी समय को 'प' 'ल' के बीच का देशान्तर काल कहते हैं । प, ल के देशान्तर को प भ ल कोण से भी प्रकट कर सकते हैं और देशान्तर को अंश, कला विकला में भी लिख सकते हैं चाहे देशान्तर प्रकट करने की इकाई घड़ी पल में हो, चाहे अंश कला में, दोनों तरह से सुविधा होती है और जहाँ जिसकी आवश्यकता पड़ती है वहाँ वही लिखते हैं । यह स्पष्ट ही है कि ६० घड़ी में अथवा २४ घंटे में सूरज एक चक्कर अर्थात् ३६०° चलता है इसलिए एक घड़ी में ६° और १ घंटों में १५° चलेगा; इसलिए यदि दो स्थानों का देशान्तर एक अंश हो तो उन दोनों के मध्याह्न काल या मध्यरात्रि के समयों में १० पल अथवा ४ मिनट का अन्तर होगा । संक्षेप में यों लिखा जाता है कि दोनों का देशान्तर १°, १० पल अथवा ४ मिनट है । साधारणतः मध्य रेखा से देशान्तर नापने की परिपाटी है । जो स्थान मध्य रेखा से पूरब में है उनके देशान्तर के पहले 'पूर्व' और जो पच्छिम में हैं उनके देशान्तर के पहले 'पच्छिम' अवश्य लिख देना चाहिये, नहीं तो भ्रम होने का डर रहता है । चित्र से यह भी सहज ही जाना जा सकता है कि यदि लंका (ल) की अर्द्ध रात्रि के समय का किसी ग्रह का मध्यम स्थान निकाला जाय तो वह 'प' स्थान की अर्द्ध रात्रि के समय का भी मध्यम स्थान नहीं होगा क्योंकि प लंका से पूरब है इसलिए वहाँ अर्द्ध रात्रि पहले ही हो जायगी और ग्रह सदा गतिमान होने के कारण लंका के मध्यम स्थान से कुछ पहले रहेगा । कितना पहले रहेगा, इसकी जानकारी त्रैराशिक द्वारा करनी चाहिये कि जब ६० घड़ी में ग्रह इतना चलता है तो 'प' की देशान्तर घड़ी में कितना चलेगा । जो आवे वह लंका की अर्द्ध रात्रि के मध्यम स्थान से घटा देना चाहिये । यदि स्थान मध्य रेखा से पच्छिम हो तो वहाँ मध्य रात्रि लंका की मध्य रात्रि से उस स्थान की देशान्तर घड़ी के समान पीछे होगी और ग्रह इतनी
६४ सूर्य सिद्धान्त देर में कुछ आगे बढ़ जायगा । इसलिए पच्छिम के स्थानों के लिए त्रैराशिक द्वारा जो कुछ आवे वह जोड़ना चाहिये । देशान्तर को यदि योजन में न लिख कर घड़ी या अंश में लिखा जाय तो ६०वें श्लोक के नियम का सरल रूप यह होगा :- ६० घड़ी : देशान्तर घड़ी :: ग्रह की दैनिक गति : देशान्तर घड़ी में गति देशान्तर घड़ी × ग्रह की दैनिक गति अर्थात् देशान्तर फल = ————————————————— ( ४ ) ६० घड़ी इस एक समीकरण से ६०वें श्लोक के नीचे दिये हुये पहले दो समीकरणों का काम निकल जायगा और सरलता भी होगी; क्योंकि उन समीकरणों के लिए देशान्तर घड़ी से ही देशान्तर योजन आगे के ६४-६५ श्लोकों के अनुसार बनाना पड़ता है । इसलिए सीधी ही क्रिया क्यों न की जाय ? आगे के श्लोक में यह बतलाया गया है कि मध्यरेखा पर कौन-कौन नगर पड़ते हैं । राक्षसालयदेवौकशशैल्योर्मध्यसूत्रगा । रोहीतकमवन्ती च यथा सन्निहितं सरः ॥६२॥ अनुवाद—(६२) राक्षसालय अर्थात् लंका और देवलोक अर्थात् सुमेरु पर्वत (उत्तरी ध्रुव) के बीच से गयी हुई रेखा पर जो देश हैं जैसे रोहीतक, अवन्ती, कुरुक्षेत्र इत्यादि (वे मध्य रेखा पर हैं) ॥६२॥ विज्ञान भाष्य—पिछले श्लोक के विज्ञान भाष्य में देशान्तर के सम्बन्ध में मध्य रेखा की चर्चा अच्छी तरह हुई है। यहाँ इतना कहना और आवश्यक है कि उज्जैन से होती हुई उत्तर-दक्षिण-रेखा विषुवत् रेखा से जिस स्थान पर मिलती है उसे ही लंका कहते हैं। ज्योतिष की यह लंका वही लंका है, जिसमें रावण रहता था अथवा अन्य कल्पित स्थान है और गणित की सुविधा के लिए मान लिया गया है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । कुछ लोग १ वर्तमान सिंहल द्वीप (सीलोन) को ही रावण की लंका और पोलन नरुआ को रावण की राजधानी कहते हैं और अनुमान करते हैं कि यह पौलस्त्य-नगर का अपभ्रंश है । रोहीतक वर्तमान रोहतक है या इस नाम का कोई और स्थान था यह विचारणीय है; क्योंकि वर्तमान रोहतक का देशान्तर इंडियन क्रोनोलाजी पृ० १६० में १६२ सेकंड 'पूर्व' दिया हुआ है, जिससे जान पड़ता है कि रोहतक मध्य रेखा से १. देखो श्रावण १६८० वि की माधुरी पृष्ठ ६-७ ।
मध्यमाधिकार ६५ ८ पल पूरब १ है। कुरुक्षेत्र का देशान्तर आजकल क्या माना जाता है यह जानने के लिए यहाँ कोई साधन नहीं है, इसलिए यह नहीं सिद्ध किया जा सकता कि कुरुक्षेत्र ठीक-ठीक मध्य रेखा पर ही है या इससे कुछ पूरब-पश्चिम हटा हुआ है। आगे के तीन श्लोकों में यह बतलाया गया है कि चन्द्रग्रहण से देशान्तर घड़ी कैसे जानी जाती है और उससे देशान्तर से योजन कैसे निकाला जाता है : अतीत्योन्मीलनादिन्दोः पश्चात्तद गणितागतात् । यदा भवेत्तदा प्राच्यां स्वस्थानं मध्यतो भवेत् ॥६३॥ अप्राप्य वा भवेत्पश्चात् एवं वाऽपि निमीलनात् । तयोरन्तरनाडीभिः हन्याद्भूष्णरिधिं स्फुटम् ॥६४॥ षष्ट्या विभज्य लब्धैस्तैर्योजनैः प्राक्तथापरे । स्वदेशपरिधिज्ञेयः कुर्याद्देशान्तरं हि तैः ॥६५॥ अनुवाद -(६३) मध्य रेखा पर (उज्जैन या लंका की उत्तर-दक्षिण रेखा पर) किस समय (मध्य रात्रि से कितनी घड़ी पीछे) पूर्ण ग्रसित चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने लगेगा, यह गणित से जान लेना चाहिये। फिर वेध करके देखना चाहिये कि अपने स्थान में किस समय (अपने यहाँ की मध्य रात्रि से कितनी घड़ी पीछे) पूर्णग्रसित चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने लगता है। यदि गणित-सिद्ध समय से दृक्-सिद्ध समय (यंत्र द्वारा वेध करके जाना हुआ समय) अधिक हो तो समझना चाहिये कि अपना स्थान मध्य रेखा से पूर्व है और (६४) यदि गणित-सिद्ध समय से दृक्-सिद्ध समय कम हो तो समझना चाहिये कि अपना स्थान मध्य रेखा से पच्छिम है। इसी प्रकार उस समय को भी देख कर यह बात जानी जा सकती है जिस समय चंद्रमा का पूर्ण विम्ब अंधकार में चला जाता है। गणित-सिद्ध और दृक्-सिद्ध कालों में जो अन्तर हो वही अपने यहाँ का देशान्तर काल या देशान्तर घड़ी कहलाता है (क्योंकि काल प्रायः घड़ियों में लिखा जाता है)। इस देशान्तर घड़ी को स्फुट परिधि से गुणा करके (६५) गुणनफल को साठ से भाग देने पर जो लब्धि आवे वही अपने स्थान का पूर्व देशान्तर योजन है (यदि स्थान पूर्व में हो) और पच्छिम देशान्तर योजन है (यदि स्थान पच्छिम में हो)। इसी देशान्तर योजना से (६०-६१ श्लोकों में बतलायी हुई रीति के अनुसार ग्रहों का) देशान्तर संस्कार करना चाहिये ॥६३-६५॥ १. शायद इसीलिए भास्कराचार्य ने रोहतक को मध्य रेखा पर नहीं लिखा है- यल्लङ्कोज्जयिनीपु रोपरिकुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत् । सूत्रं मेरुगतंवुधैर्निगदिता सामध्य रेखाभुवं ॥ गणिताध्याय पृष्ठ ५७ ५
६६ सूर्यसिद्धान्त चित्र १२ विज्ञान भाष्य—निमीलन = (१) आंखों का बंद होना, (२) लुप्त होना, (३) चन्द्रमा के पूरे विम्ब का अंधकार में चला जाना। इसलिए निमीलन काल उस
मध्यमाधिकार ६७ समय को कहते हैं जिस समय खग्रास या सम्पूर्ण ग्रहण का आरंभ होता है। इसको सम्मीलन काल भी कहते हैं । उन्मीलन=(१) आँखों का खोलना, (२) प्रकट होना, (३) पूर्ण ग्रसित चन्द्रमा का अंधकार से बाहर निकलना । इसलिए उन्मीलन काल उस समय को कहते हैं जिस समय चन्द्रमा का पूर्णग्रसित बिम्ब अंधकार से बाहर निकलने लगता है। स्पर्श काल उस समय को कहते हैं जिस समय चन्द्रमा का बिम्ब अंधकार में घुसने लगता है अर्थात् जिस समय से यथार्थ ग्रहण का आरंभ होता है । मोक्ष काल उस समय को कहते जिस समय चन्द्रमा का पूरा बिम्ब अंधकार के बाहर आ जाता है । चित्र १३ में र रवि का केन्द्र, प पृथ्वी का केन्द्र और छ पृथ्वी की छाया की नोक है । चन्द्रकक्षा में चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है। जब चन्द्रमा का केन्द्र चन्द्रकक्षा के उस बिन्दु पर पहुँचता है जहाँ १ लिखा हुआ है तब चन्द्र बिम्ब पृथ्वी- की छाया को स्पर्श करता है, इसलिए चन्द्रमा की यह स्थिति ग्रहण के समय स्पर्श काल की स्थिति है। इसी समय चन्द्र बिम्ब अंधकार में प्रवेश करता हुआ देख पड़ता है। जब चन्द्रमा उस स्थिति पर पहुँचता है जो २ अंक से सूचित किया गया है तब उसका पूरा बिम्ब अंधकार में हो जाता है। यह सम्मीलन काल अथवा निमीलन काल की स्थिति है। जब चन्द्रमा उस स्थिति पर पहुँचता है जो ३ अंक से प्रकट किया गया है तब चन्द्रमा अंधकार से बाहर निकलने को होता है। यही उन्मीलन काल की स्थिति है। और जब चन्द्रमा का पूरा बिम्ब अंधकार के बाहर निकल आता है जैसा कि ४ अंक से प्रकट किया गया है तब मोक्ष काल की स्थिति होती है । इन चार घटनाओं में से कोई घटना आकाश में जिस समय होती है उसी समय१ भूतल पर भी देख पड़ती है। परन्तु भूतल के सब स्थानों में सूर्योदय या मध्याह्न जिससे घड़ियाँ२ सुगमतापूर्वक शुद्ध की जा सकती हैं, एक ही समय नहीं होता जैसा कि ६०-६१ श्लोकों के विज्ञान-भाष्य में देशान्तर की परिभाषा बतलाते हुए सिद्ध किया गया है, इसलिए भिन्न-भिन्न स्थानों की घड़ियों में किसी घटना के देखने का समय भिन्न होता है। मध्य रेखा से पूर्व के स्थानों की घड़ियाँ मध्य रेखा १. यदि प्रकाश की गति का भी विचार किया जाय तो यह कहना अधिक शुद्ध होगा कि चन्द्रमा की कोई घटना भूतल पर सवा सेकंड पीछे देख पड़ती है । २. समय जानने के यंत्र ।
६८ सूर्य सिद्धान्त की घड़ी से देशान्तर काल के समान आगे रहती हैं क्योंकि यहाँ सूर्योदय पहले होता है। इसलिए यहाँ जिस समय ग्रहण देख पड़ेगा वह मध्य रेखा के समय से अधिक होगा और पच्छिम के स्थानों में कम । मध्य रेखा पर जिस समय ग्रहण देख पड़ता है वही गणित करने पर भी निकलता है। इसलिए गणित से यह जान कर कि मध्य रेखा पर कौन घटना कब देख पड़ेगी और अपने स्थान की घड़ी के अनुसार कब देख पड़ती है, यह सहज ही जाना जा सकता है कि इन दोनों स्थानों के स्थानीय कालों में क्या अन्तर है। यही अन्तर अपने स्थान का देशान्तर काल कहलाता है । देशान्तर काल जानने के लिए उन्मीलन काल की स्थिति जानने की चर्चा पहले की गयी है। इसका कारण यह है कि उस समय चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने को होता है, भूतल पर भी अंधकार छाया रहता है इसलिए ज्यों ही चंद्र बिम्ब प्रकाश में आने लगता है त्यों ही स्पष्टतापूर्वक देख पड़ता है और समय जानने में बहुत अशुद्धि नहीं होती । सम्मीलन काल के समय चन्द्रमा किस समय अंधकार में पूरा प्रवेश करता है यह जानने में कुछ कठिनाई होती है इसलिए इससे देशान्तर काल निकालने में कुछ अशुद्धि हो सकती है । स्पर्श काल और मोक्ष काल के समय तो कई पल तक यह पता नहीं लग सकता है कि यथार्थ घटना किस समय हुई, इसलिए देशान्तर काल निकालने के लिए इनसे काम नहीं लिया जाता । देशान्तर काल से देशान्तर योजन कैसे जाना जाता है यह ६०-६१ श्लोकों के विज्ञान भाष्य से समझना चाहिये । यह बात तो स्पष्ट है कि सूर्य ६० घड़ी में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है जिससे किसी स्थान की स्फुट परिधि के चारों ओर वह ६० घड़ी में घूम आता है, इसलिए किसी स्थान के देशान्तर काल में स्फुट परिधि का वह खंड पूरा होगा जो उस स्थान से मध्यरेखा का अन्तर है। त्रैराशिक द्वारा इसे यों प्रकट करते हैं :— ६० घड़ी : देशान्तर घड़ी :: स्फुट परिधि : देशान्तर योजन । यहाँ देशान्तर जानने की कुछ अन्य रीतियों की चर्चा संक्षेप में करना आवश्यक है । देशान्तर जानने की रीतियां :—एक रीति तो ऊपर लिखी जा चुकी है। यह बहुत पुरानी रीति है और जब आजकल की तरह सूक्ष्म यंत्रों का निर्माण नहीं हुआ था तब इससे बढ़कर कोई दूसरी रीति हो भी नहीं सकती थी । आजकल जितनी रीतियां प्रचलित हैं उनमें से अधिकांश इसी के रूपान्तर हैं, यदि कुछ अन्तर है तो यह कि आजकल ग्रहण इत्यादि आकाशीय घटनाओं के होने के समय का सूक्ष्म ज्ञान किया जा सकता है जिससे देशान्तर काल जहां तक संभव है बहुत सूक्ष्मतापूर्वक जाना जा सकता है। जो रीति ऊपर बतलायी गयी है उसमें कुछ अशुद्धि रह जाती
मध्यमाधिकार ६६ है, इसका कारण यह है कि कोरी आंख से अथवा दूरवीक्षण यंत्र से यह ठीक-ठीक नहीं देखा जा सकता कि चन्द्र ग्रहण का उन्मीलन अथवा सम्मीलन किस क्षण से आरम्भ हो जाता है । यदि पास ही पास के दो दर्शक अपनी अपनी घड़ी लेकर यह देखने बैठें कि सम्मीलन किस समय आरम्भ होता है और चुपके से उस समय को लिख लें जिस समय प्रत्येक को सम्मीलन देख पड़े तो देखा जाता है कि उन दोनों के देखे हुए कालों में दो-¹तीन मिनट का अन्तर होता है । शायद यही कारण है जिससे उज्जैन, कुरुक्षेत्र और रोहतक के देशान्तरों में दो तीन मिनट का अन्तर है यद्यपि यह ६२वें श्लोक में एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर अर्थात् भूमध्य रेखा पर बतलाये गये हैं । नीचे ग्रीनविच से इन स्थानों के देशान्तरों की तुलना की जाती है :— नगर ग्रीनविच से देशान्तर उज्जैन से देशान्तर उज्जैन से देशान्तर (कोणात्मक) (कालात्मक) उज्जैन ² ७५°४६'६" पूर्व घड़ी पल विपल मिनट सेकंड कुरुक्षेत्र ³ ७६°२०' ,, ०°३३'५४" पूर्व ० ५ ३६ (२ १५.६) रोहतक ७६°३५' ,, ०°४८'५४" ,, ० ८ ६ (३ १५.६) काशी ४ ८३°३'४" ,, ७°१६'५८" ,, १ १२ ५० (२६ ८) इन अंकों से सिद्ध है कि चंद्रग्रहण से देशान्तर जानने की रीति में दो तीन मिनट का अन्तर हो सकता है । दूसरी रीति—जिस प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और उसमें ग्रहण लगता है इसी प्रकार वृहस्पति के चारों ओर भी ४, ५ पिंड परिक्रमा करते हुए दूरवीक्षण यंत्र से देखे जाते हैं। यह वृहस्पति के चन्द्रमा कहलाते हैं। जब यह वृहस्पति की छाया में घुसते हैं तो इनमें भी ग्रहण लगता है । वृहस्पति के चन्द्रमा बहुत छोटे हैं और इनके परिक्रमण काल भी छोटे हैं इसलिए इनमें ग्रहण जल्दी-जल्दी लगते हैं । ग्रहण के कारण इनके छिपने और प्रकट होने का समय ग्रीनविच काल के अनुसार नाविक पंचांगों में ( Nautical almanac ) दिया रहता है । इसलिए यदि किसी स्थान में उसके स्थानीय काल के अनुसार वृहस्पति के चन्द्रमा के छिपने या प्रकट होने १. Godfray's Treatise on Astronomy. Sixth edition, page 261. २. Indian Chronology, page 60. ३. Imperial Gazetteer of India. ४. भारत भ्रमण (मकरंद सारिणी में काशी का देशान्तर ६६ पल दिया है जो ऊपर के मान से ४ पल कम है) ।
७० सूर्य सिद्धान्त का समय देखा जाय तो नाविक पंचांग में दिये हुए समय से जो अन्तर होता है वही उस स्थान का ग्रीनविच से देशान्तर है। परन्तु यह रीति भी ऊपर कही हुई रीति की तरह स्थूल है क्योंकि वृहस्पति के चंद्रमा के छिपने या प्रकट होने का क्षण निश्चित रूप से दूरवीक्षण से भी नहीं जाना जा सकता परन्तु इसमें उतनी अशुद्धि नहीं होती जितनी पहली रीति में होती है। तीसरी रीति—टूटनेवाले तारों के प्रकट होने और लुप्त होने के क्षण को भिन्न-भिन्न स्थानों के स्थानीय कालों से तुलना करने पर देशान्तर सूक्ष्मतापूर्वक जाना जा सकता है यदि तारों के टूटने के समय का निश्चय पहले से हो सके और उनके पहचानने में कोई गड़बड़ न हो। चौथी रीति : विद्युत् द्वारा समाचार भेज कर देशान्तर जानना—यदि दो स्थानों का एक दूसरे से ऐसा सम्बन्ध हो कि एक स्थान से दूसरे स्थान को विद्युत् द्वारा समाचार भेजा जा सके तो इन दोनों स्थानों का देशान्तर सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि विद्युत् समाचार के पहुँचने में इतना कम समय लगता है कि उससे जो अशुद्धि हो सकती है वह नहीं के समान है। मान लीजिए काशी से लखनऊ का देशान्तर जानना है। दोनों नगरों के दर्शकों को एक ही प्रकार की घड़ी रखनी चाहिये, जैसे यदि एक की घड़ी सावन काल बतलाती हो तो दूसरे की घड़ी भी सावन काल बतलाती हो। दोनों घड़ियों को अपने अपने यहाँ के स्थानीय काल से मिला लेना चाहिये जिससे प्रत्येक घड़ी अपने यहाँ का स्थानीय काल शुद्धतापूर्वक बतला सके। काशी लखनऊ से पूर्व है इसलिए काशी का स्थानीय काल लखनऊ के स्थानीय काल से आगे रहेगा और इन दोनों में जितना अन्तर होगा वही काशी से लखनऊ का देशान्तर है। जिस समय काशी की घड़ी में 'स₁' समय हो उसी समय काशी से विद्युत् संकेत किया जाय। जिस समय यह संकेत लखनऊ पहुँचे उसी समय लखनऊ की घड़ी में समय देख लिया जाय। यदि इस घड़ी में 'स₂' समय हो और यह मान लिया जाय कि लखनऊ में संकेत उसी क्षण पहुँचा है जिस क्षण काशी से भेजा गया है तो काशी से लखनऊ का देशान्तर 'द₁' नीचे लिखे समीकरण से सिद्ध होगा :- द₁ = स₁ - स₂ परन्तु इस समीकरण से देशान्तर का जो मान निकलेगा वह यथार्थ देशान्तर से कुछ कम होगा क्योंकि काशी से लखनऊ तक विद्युत् संकेत के पहुँचने में कुछ न कुछ समय अवश्य लगता है। यदि इस समय का मान 'य' हो और काशी से लखनऊ का यथार्थ देशान्तर 'द' हो तो पूर्वोक्त समीकरण का रूप यह होगा :- द = (स₁ + य) - स₂ = द₁ + य (१)
मध्यमाधिकार ७१ क्योंकि जिस समय लखनऊ में समाचार पहुंचेगा उस समय काशी में 'स₁ + य' समय होगा । 'य' का मान जानने के लिए लखनऊ से काशी को संकेत भेजकर दोनों के स्थानीय काल फिर जानना चाहिए । मान लीजिए लखनऊ से जिस समय संकेत भेजा गया उस समय लखनऊ की घड़ी में 'सा₂' समय था और जिस समय संकेत काशी पहुँचा उस समय काशी की घड़ी में 'सा₁' समय था, और यदि मान लिया जाय कि संकेत के पहुँचने में कुछ समय नहीं लगता तो इन दोनों का अन्तर द₂ लखनऊ का देशान्तर होगा जिसका रूप यह है :— द₂ = सा₁ - सा₂ परन्तु द₂ का मान यथार्थ से कुछ अधिक होगा क्योंकि संकेत के पहुँचने में कुछ न कुछ समय अवश्य लगता है जो 'य' के समान फिर होगा इसलिए यथार्थ देशान्तर द = सा₁ - (सा₂ + य) = (सा₁ - सा₂ - य) = द₂ - य (२) (१) और (२) समीकरणों के समान पक्षों को जोड़ने से २ द = द₁ + द₂ अथवा द = द₁ + द₂ २ (३) जिसका अर्थ यह हुआ कि काशी से लखनऊ संकेत भेजने से जो देशान्तर काल आवे उसको उस देशान्तर काल में जोड़ दो जो लखनऊ से काशी उलटा संकेत भेजने से ज्ञात हो । फिर दोनों को जोड़कर आधा कर दो तो यथार्थ देशान्तर काल ज्ञात हो जायगा । देशान्तर जानने की और भी कई रीतियां हैं जो जहाज़वालों के काम की होती हैं और जिनमें नाविक पंचांग से अथवा ग्रीनविच से मिली हुई घड़ी से सहायता लेनी पड़ती है; इसलिए इस स्थान पर उनका वर्णन नहीं किया जाता है । वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धेऽभ्यधिके भवेत् । स्वदेशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् ॥६६॥ अनुवाद—(६६) जो स्थान मध्य रेखा से पूर्व दिशा में हैं वहाँ वार की प्रवृत्ति अर्थात् दिन का आरम्भ उस स्थान की अर्द्ध रात्रि से उतने समय पीछे होती है जितना उस स्थान का देशान्तर काल है । मध्य रेखा के पच्छिम के स्थान में उस स्थान की अर्द्धरात्रि से उतने समय पहले ही वार की प्रवृत्ति हो जाती है जितना इस स्थान का देशान्तर काल है । विज्ञान भाष्य—इस नियम के अनुसार काशी में जो उज्जैन से अथवा भारतवर्ष की मध्य रेखा से ७३ पल पूर्व है, वार की प्रवृत्ति उस समय होती है जब
७२ सूर्य सिद्धान्त काशी में स्थानीय काल के अनुसार रात को १२ बजकर ७३ पल अर्थात् १२ बजकर २६ मिनट १२ सेकंड होता है, और बम्बई में जो उज्जैन से कोई २६ पल पच्छिम है वार की प्रवृत्ति १२ बजे रात से कोई २६ पल अथवा ११ मिनट ३६ सेकंड पहले ही हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस समय भारतवर्ष की मध्य रेखा पर अर्द्धरात्रि होती है उसी समय भारत के अन्य स्थानों में भी वार-प्रवृत्ति समझनी चाहिए । इसलिए ग्रहों का जो स्थान लंका या उज्जैन की अर्द्धरात्रि के समय गणित से सिद्ध होता है वह अन्य स्थानों में उस समय होता है जिस समय वहाँ वार-प्रवृत्ति होती है। इसीलिए यदि किसी स्थान की अर्द्धरात्रि के समय का ग्रह निकालना हो तो देशान्तर-फल घटाना या जोड़ना चाहिये । यह मत सूर्य सिद्धान्त का है कि वार-प्रवृत्ति उज्जैन की अर्द्धरात्रि के समय सब स्थानों में होती है। ब्रह्मगुप्त,१ भास्कराचार्य इत्यादि आचार्यों ने वार-प्रवृत्ति उस समय से माना है जिस समय लंका में सूर्योदय होता है क्योंकि इनके मत से सृष्टि का आरम्भ उस समय से हुआ जिस समय लंका में पहले पहल सूर्य देख पड़ा था और इसी समय पहले दिन का भी आरम्भ हुआ था । आजकल यही नियम साधारणतः प्रचलित भी है, हां वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी३ अर्द्धरात्रि से ही वार की प्रवृत्ति मानते हैं और कम से कम धार्मिक कृत्यों के लिए दिन में वही तिथि मानते हैं जो पिछली आधी रात के समय वर्तमान रहती है, इसलिए इनकी एकादशी प्रायः द्वादशी के दिन होती है। अधिकांश पंचांगों में भी ग्रह स्पष्ट अर्द्धरात्रि के समय का ही दिया रहता है। इन दोनों मतों में अर्द्ध रात्रि से वार-प्रवृत्ति का मानना अधिक सरल और व्यापक है। एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर स्थित जितने स्थान हैं सब जगह अर्द्ध रात्रि या मध्याह्न सदा युगपद् होती है परन्तु सूर्योदय वर्ष में दो दिनों को छोड़कर कभी एकसाथ नहीं होता । सूर्योदय सूर्य की क्रान्ति और स्थानों के अक्षांश के १. जगति तमोभूतेऽस्मिन् सृष्ट्यादौ भास्करादिभिः सृष्टैः । यस्याद्दिनप्रवृत्तिर्द्दिनवारोऽर्कोदयात् तस्मात् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त - मध्यमाधिकार । २. लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव । मधोःसितादेर्दिन मास वर्ष युगादिकानां युगपत् प्रवृत्तिः ॥१५॥ सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ७ ३. माधुरी, खंड २ संख्या ४ पृष्ठ ४३७ ।
मध्यमाधिकार ७३ अनुसार कुछ आगे पीछे होता है जिसकी व्याख्या तीसरे अध्याय में की जायगी। फिर पूरब पच्छिम के देशों में देशान्तर संस्कार के कारण भी सूर्योदय काल में बहुत अंतर पड़ जाता है। इन सब कारणों से वार-प्रवृत्ति कभी-कभी सूर्योदय के घंटे भर पीछे या पहले ही हो जाती है जो बहुत पेचदार है। परन्तु यदि आधी रात से वार-प्रवृत्ति मानी जाय तो सूर्य की क्रान्ति और स्थानों के अक्षांश के कारण कोई भेद नहीं पड़ सकता। हाँ देशान्तर संस्कार फिर भी करना पड़ेगा परन्तु इससे भी वार-प्रवृत्ति रात में ही हो जायगी जिससे कोई गड़बड़ नहीं हो सकता। लोक व्यवहार में भी किसी दिन की प्रातः, संध्या अथवा यात्रा सूर्योदय के पहले ही की जाती है जिससे जान पड़ता है कि साधारणतः सूर्योदय के दो तीन घड़ी पहले से ही दिन का आरम्भ मान लिया जाता है। इस विषय पर धर्म सिंधु¹, निर्णय सिंधु इत्यादि ग्रन्थों में बहुत चर्चा की गयी है। आजकल यूरोपीय देशों में आधी रात से ही तारीख बदलती है तथा दिन का आरम्भ माना जाता है, इसीलिए अंगरेजी तारीखें भी आधी रात से ही बदलती हैं। इससे बहुत से लोग यह समझते हैं कि आधी रात से वार की प्रवृत्ति मानना अंग्रेजी मत है, परन्तु यह भूल है। हमारे यहाँ भी आधी रात से वार-प्रवृत्ति मानने का नियम है। यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि किसी स्थान की अर्द्ध रात्रि के समय किसी ग्रह का मध्यम स्थान क्या होता है और कैसे जाना जाता है। अगले श्लोक में यह बतलाया जा रहा है कि मध्य रात्रि के सिवा दिन के किसी अन्य समय में मध्यम ग्रह निकालना हो तो क्या करना चाहिये । इष्टनाडीगुणा भुक्तिष्षष्ट्या भक्ता कलादिकः । गते शोध्यो युते गम्ये ग्रहस्तात्कालिको भवेत् ॥६७॥ अनुवाद—(यदि मध्य रात्रि के सिवा किसी अन्य समय का मध्यम ग्रह जानना हो तो) इष्ट घड़ी को अर्थात् मध्य रात्रि से जितनी घड़ी पहले या पीछे का समय हो उस घड़ी को ग्रह की दैनिक मध्यम गति से (जो कलाओं में लिखना सुविधा- जनक होता है) गुणा करके गुणनफल को ६० से भाग दे दो। जो लब्धि आवे उसे अर्द्धरात्रि के मध्यम ग्रह में से घटा दो यदि इष्ट काल मध्य रात्रि से पहले ही बीत १. सूर्योदयात् प्राक् घटिकात्रयं प्रातः संध्या, सूर्यास्तोत्तरं घटिकाद्वयं सायं संध्या । धर्म सिंधु, प्रथम परिच्छेद पृष्ठ २ निर्णयसागर प्रेस का छपा (शक १८२६)
७४ | सूर्य सिद्धान्त जाय और जोड़ दो यदि इष्ट काल मध्य रात्रि से पीछे आवे । ऐसा करने से ग्रह का तात्कालिक स्थान निकल आवेगा ।।६७।। विज्ञान भाष्य—यह स्पष्ट है कि ग्रह का मध्यम स्थान अर्द्ध रात्रि के समय जो कुछ होता है वह अन्य समय नहीं रहता क्योंकि ग्रह निरंतर चलते रहते हैं। इसलिए अर्द्ध रात्रि के पहले या पीछे किसी इष्ट समय में किसी ग्रह का मध्यम स्थान जानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उस समय में ग्रह कितना हट जायगा। यह बात त्रैराशिक से सहज ही जानी जा सकती है— ६० घड़ी : इष्ट घड़ी :: दैनिक गति : इष्ट घड़ी में गति ∵ इष्ट घड़ी में गति = (इष्ट घड़ी × दैनिक गति) / ६० घड़ी इसलिए अभीष्ट काल की ग्रह की स्थिति = अर्द्ध रात्रि की स्थिति ± (इष्ट घड़ी + दैनिक गति) / ६० घड़ी यदि इष्ट काल अर्द्ध रात्रि के पहले हो तो ऋण का चिह्न रखना चाहिये और पीछे हो तो धन का चिह्न । यह इतना स्पष्ट है कि उदाहरण देकर पुस्तक का आकार बढ़ाने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । भचक्रलिप्ताशीत्यंशैः परमं दक्षिणोत्तरम् । विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यंशादनुष्णगुः ॥६८॥ तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः । बुधशुक्राकंर्जाः पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणं ॥६६॥ एवं त्रिघ्नरन्ध्राकॅरसार्काकी दशाहताः । चन्द्रादीनां क्रमादेषां मध्यविक्षेपलिप्तिकाः ॥७०॥ अनुवाद—(६८) अपने पात के कारण चन्द्रमा अपने पासवाले क्रान्ति वृत्त के विन्दु से अधिक से अधिक २७० कला उत्तर या दक्षिण हट जाता है। (६६) इसका २/९ भाग वृहस्पति, ३/९ भाग अथवा १/३ भाग मंगल और ४/९ भाग बुध, शुक्र और शनि अपने अपने पातों के द्वारा हट जाते हैं। (७०) इस प्रकार चंद्रादि छः ग्रहों (चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शनि) के मध्यम विक्षेप २७०, ६०, १२०, ६०, १२०, १२० कलाएं क्रम से हैं । ।।६८-७०।। विज्ञान भाष्य—पिछले ३३ वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में चंद्रमा के पात का वर्णन है । चित्र ४ में चंद्र कक्षा और क्रान्ति वृत्त एक दूसरे को काटते हुए
मध्यमाधिकार ७५ दिखलाये गये हैं। जिस समय चन्द्रमा अपने पात पर रहता है उस समय यह क्रान्ति वृत्त पर देख पड़ता है, अन्य समय यह क्रान्ति वृत्त से उत्तर या दक्षिण कुछ हटा हुआ देख पड़ता है। किस समय कितना हटा रहता है यह गणित से सहज ही जाना जा सकता है। जिस समय चंद्रमा पात से ६०° आगे या पीछे रहता है उस समय क्रान्ति वृत्त से परम अंतर पर होता है। चित्र ४ में यह परम अंतर चासा या चस से सूचित होता है। इसी को चंद्रमा का परम विक्षेप कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रह भी क्रान्ति वृत्त से उत्तर या दक्षिण हट जाते हैं जिनके मध्यम विक्षेप ६६-७० श्लोकों में दिये हुए हैं। ग्रहों के विक्षेप और पातों में बहुत घना सम्बन्ध है इसीलिए हमारे प्राचीन आचार्यों का विचार था कि पात ही ग्रहों को उत्तर या दक्षिण ढकेल देते हैं। ग्रहों के परम विक्षेप सब आचार्यों के मत से एक से नहीं हैं। आजकल सूक्ष्म यंत्रों के द्वारा जो जानकारी हुई है वह हमारे किसी ग्रन्थ के मानों से नहीं मिलती। तुलना के लिए परम विक्षेपों की तालिका नीचे दी जाती है:—
| सूर्य सिद्धान्त | १ब्राह्म-स्फुट सिद्धान्त, २सिद्धान्त शिरोमणि | ३महा सिद्धान्त | ४सिद्धान्त दर्पण | ५टालमी | ६आधुनिक |
|---|---|---|---|---|---|
| चंद्र ४°३०' | ४°३०' | ४°३०' | ५°६'०" | ५°०' | ५°८'४२" |
| मंगल १°३०' | १°५०' | १°४६' | १°५१'०" | १°०' | १°५१'१" |
| बुध २°०' | २°३२' | २°१८' | २°४४'०" | ७°०' | ७°०'१०" |
| गुरु १°०' | १°१६' | १°१४' | १°१८'०" | १°३०' | १°१८'४२" |
| शुक्र २°०' | २°१६' | २°१०' | २°१८'०" | ३°३०' | ३°२३'३७" |
| शनि २°०' | २°१०' | २°१०' | २°२६'०" | २°३०' | २°२६'३६" |
१. ब्राह्म-स्फुट सिद्धान्त पृष्ठ ७३, ११२ । २. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ १७५, २१२ । ३. महासिद्धान्त स्पष्टाधिकार श्लोक ३६, ४. सिद्धान्त दर्पण पृष्ठ ३१, श्लोक ३२-३३, योगेश चन्द्रराय द्वारा सम्पादित और कलकत्ते से १८६६ ई० में प्रकाशित । ५. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३२४ ६. Sir Robert Ball's Spherical Astronomy. pp 491.