भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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मध्यमाधिकार ७१ क्योंकि जिस समय लखनऊ में समाचार पहुंचेगा उस समय काशी में 'स₁ + य' समय होगा । 'य' का मान जानने के लिए लखनऊ से काशी को संकेत भेजकर दोनों के स्थानीय काल फिर जानना चाहिए । मान लीजिए लखनऊ से जिस समय संकेत भेजा गया उस समय लखनऊ की घड़ी में 'सा₂' समय था और जिस समय संकेत काशी पहुँचा उस समय काशी की घड़ी में 'सा₁' समय था, और यदि मान लिया जाय कि संकेत के पहुँचने में कुछ समय नहीं लगता तो इन दोनों का अन्तर द₂ लखनऊ का देशान्तर होगा जिसका रूप यह है :— द₂ = सा₁ - सा₂ परन्तु द₂ का मान यथार्थ से कुछ अधिक होगा क्योंकि संकेत के पहुँचने में कुछ न कुछ समय अवश्य लगता है जो 'य' के समान फिर होगा इसलिए यथार्थ देशान्तर द = सा₁ - (सा₂ + य) = (सा₁ - सा₂ - य) = द₂ - य (२) (१) और (२) समीकरणों के समान पक्षों को जोड़ने से २ द = द₁ + द₂ अथवा द = द₁ + द₂ २ (३) जिसका अर्थ यह हुआ कि काशी से लखनऊ संकेत भेजने से जो देशान्तर काल आवे उसको उस देशान्तर काल में जोड़ दो जो लखनऊ से काशी उलटा संकेत भेजने से ज्ञात हो । फिर दोनों को जोड़कर आधा कर दो तो यथार्थ देशान्तर काल ज्ञात हो जायगा । देशान्तर जानने की और भी कई रीतियां हैं जो जहाज़वालों के काम की होती हैं और जिनमें नाविक पंचांग से अथवा ग्रीनविच से मिली हुई घड़ी से सहायता लेनी पड़ती है; इसलिए इस स्थान पर उनका वर्णन नहीं किया जाता है । वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धेऽभ्यधिके भवेत् । स्वदेशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् ॥६६॥ अनुवाद—(६६) जो स्थान मध्य रेखा से पूर्व दिशा में हैं वहाँ वार की प्रवृत्ति अर्थात् दिन का आरम्भ उस स्थान की अर्द्ध रात्रि से उतने समय पीछे होती है जितना उस स्थान का देशान्तर काल है । मध्य रेखा के पच्छिम के स्थान में उस स्थान की अर्द्धरात्रि से उतने समय पहले ही वार की प्रवृत्ति हो जाती है जितना इस स्थान का देशान्तर काल है । विज्ञान भाष्य—इस नियम के अनुसार काशी में जो उज्जैन से अथवा भारतवर्ष की मध्य रेखा से ७३ पल पूर्व है, वार की प्रवृत्ति उस समय होती है जब