सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ सूर्य सिद्धान्त काशी में स्थानीय काल के अनुसार रात को १२ बजकर ७३ पल अर्थात् १२ बजकर २६ मिनट १२ सेकंड होता है, और बम्बई में जो उज्जैन से कोई २६ पल पच्छिम है वार की प्रवृत्ति १२ बजे रात से कोई २६ पल अथवा ११ मिनट ३६ सेकंड पहले ही हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस समय भारतवर्ष की मध्य रेखा पर अर्द्धरात्रि होती है उसी समय भारत के अन्य स्थानों में भी वार-प्रवृत्ति समझनी चाहिए । इसलिए ग्रहों का जो स्थान लंका या उज्जैन की अर्द्धरात्रि के समय गणित से सिद्ध होता है वह अन्य स्थानों में उस समय होता है जिस समय वहाँ वार-प्रवृत्ति होती है। इसीलिए यदि किसी स्थान की अर्द्धरात्रि के समय का ग्रह निकालना हो तो देशान्तर-फल घटाना या जोड़ना चाहिये । यह मत सूर्य सिद्धान्त का है कि वार-प्रवृत्ति उज्जैन की अर्द्धरात्रि के समय सब स्थानों में होती है। ब्रह्मगुप्त,१ भास्कराचार्य इत्यादि आचार्यों ने वार-प्रवृत्ति उस समय से माना है जिस समय लंका में सूर्योदय होता है क्योंकि इनके मत से सृष्टि का आरम्भ उस समय से हुआ जिस समय लंका में पहले पहल सूर्य देख पड़ा था और इसी समय पहले दिन का भी आरम्भ हुआ था । आजकल यही नियम साधारणतः प्रचलित भी है, हां वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी३ अर्द्धरात्रि से ही वार की प्रवृत्ति मानते हैं और कम से कम धार्मिक कृत्यों के लिए दिन में वही तिथि मानते हैं जो पिछली आधी रात के समय वर्तमान रहती है, इसलिए इनकी एकादशी प्रायः द्वादशी के दिन होती है। अधिकांश पंचांगों में भी ग्रह स्पष्ट अर्द्धरात्रि के समय का ही दिया रहता है। इन दोनों मतों में अर्द्ध रात्रि से वार-प्रवृत्ति का मानना अधिक सरल और व्यापक है। एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर स्थित जितने स्थान हैं सब जगह अर्द्ध रात्रि या मध्याह्न सदा युगपद् होती है परन्तु सूर्योदय वर्ष में दो दिनों को छोड़कर कभी एकसाथ नहीं होता । सूर्योदय सूर्य की क्रान्ति और स्थानों के अक्षांश के १. जगति तमोभूतेऽस्मिन् सृष्ट्यादौ भास्करादिभिः सृष्टैः । यस्याद्दिनप्रवृत्तिर्द्दिनवारोऽर्कोदयात् तस्मात् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त - मध्यमाधिकार । २. लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव । मधोःसितादेर्दिन मास वर्ष युगादिकानां युगपत् प्रवृत्तिः ॥१५॥ सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ७ ३. माधुरी, खंड २ संख्या ४ पृष्ठ ४३७ ।