सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ७३ अनुसार कुछ आगे पीछे होता है जिसकी व्याख्या तीसरे अध्याय में की जायगी। फिर पूरब पच्छिम के देशों में देशान्तर संस्कार के कारण भी सूर्योदय काल में बहुत अंतर पड़ जाता है। इन सब कारणों से वार-प्रवृत्ति कभी-कभी सूर्योदय के घंटे भर पीछे या पहले ही हो जाती है जो बहुत पेचदार है। परन्तु यदि आधी रात से वार-प्रवृत्ति मानी जाय तो सूर्य की क्रान्ति और स्थानों के अक्षांश के कारण कोई भेद नहीं पड़ सकता। हाँ देशान्तर संस्कार फिर भी करना पड़ेगा परन्तु इससे भी वार-प्रवृत्ति रात में ही हो जायगी जिससे कोई गड़बड़ नहीं हो सकता। लोक व्यवहार में भी किसी दिन की प्रातः, संध्या अथवा यात्रा सूर्योदय के पहले ही की जाती है जिससे जान पड़ता है कि साधारणतः सूर्योदय के दो तीन घड़ी पहले से ही दिन का आरम्भ मान लिया जाता है। इस विषय पर धर्म सिंधु¹, निर्णय सिंधु इत्यादि ग्रन्थों में बहुत चर्चा की गयी है। आजकल यूरोपीय देशों में आधी रात से ही तारीख बदलती है तथा दिन का आरम्भ माना जाता है, इसीलिए अंगरेजी तारीखें भी आधी रात से ही बदलती हैं। इससे बहुत से लोग यह समझते हैं कि आधी रात से वार की प्रवृत्ति मानना अंग्रेजी मत है, परन्तु यह भूल है। हमारे यहाँ भी आधी रात से वार-प्रवृत्ति मानने का नियम है। यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि किसी स्थान की अर्द्ध रात्रि के समय किसी ग्रह का मध्यम स्थान क्या होता है और कैसे जाना जाता है। अगले श्लोक में यह बतलाया जा रहा है कि मध्य रात्रि के सिवा दिन के किसी अन्य समय में मध्यम ग्रह निकालना हो तो क्या करना चाहिये । इष्टनाडीगुणा भुक्तिष्षष्ट्या भक्ता कलादिकः । गते शोध्यो युते गम्ये ग्रहस्तात्कालिको भवेत् ॥६७॥ अनुवाद—(यदि मध्य रात्रि के सिवा किसी अन्य समय का मध्यम ग्रह जानना हो तो) इष्ट घड़ी को अर्थात् मध्य रात्रि से जितनी घड़ी पहले या पीछे का समय हो उस घड़ी को ग्रह की दैनिक मध्यम गति से (जो कलाओं में लिखना सुविधा- जनक होता है) गुणा करके गुणनफल को ६० से भाग दे दो। जो लब्धि आवे उसे अर्द्धरात्रि के मध्यम ग्रह में से घटा दो यदि इष्ट काल मध्य रात्रि से पहले ही बीत १. सूर्योदयात् प्राक् घटिकात्रयं प्रातः संध्या, सूर्यास्तोत्तरं घटिकाद्वयं सायं संध्या । धर्म सिंधु, प्रथम परिच्छेद पृष्ठ २ निर्णयसागर प्रेस का छपा (शक १८२६)