सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ सूर्य सिद्धान्त की घड़ी से देशान्तर काल के समान आगे रहती हैं क्योंकि यहाँ सूर्योदय पहले होता है। इसलिए यहाँ जिस समय ग्रहण देख पड़ेगा वह मध्य रेखा के समय से अधिक होगा और पच्छिम के स्थानों में कम । मध्य रेखा पर जिस समय ग्रहण देख पड़ता है वही गणित करने पर भी निकलता है। इसलिए गणित से यह जान कर कि मध्य रेखा पर कौन घटना कब देख पड़ेगी और अपने स्थान की घड़ी के अनुसार कब देख पड़ती है, यह सहज ही जाना जा सकता है कि इन दोनों स्थानों के स्थानीय कालों में क्या अन्तर है। यही अन्तर अपने स्थान का देशान्तर काल कहलाता है । देशान्तर काल जानने के लिए उन्मीलन काल की स्थिति जानने की चर्चा पहले की गयी है। इसका कारण यह है कि उस समय चंद्रमा अंधकार से बाहर निकलने को होता है, भूतल पर भी अंधकार छाया रहता है इसलिए ज्यों ही चंद्र बिम्ब प्रकाश में आने लगता है त्यों ही स्पष्टतापूर्वक देख पड़ता है और समय जानने में बहुत अशुद्धि नहीं होती । सम्मीलन काल के समय चन्द्रमा किस समय अंधकार में पूरा प्रवेश करता है यह जानने में कुछ कठिनाई होती है इसलिए इससे देशान्तर काल निकालने में कुछ अशुद्धि हो सकती है । स्पर्श काल और मोक्ष काल के समय तो कई पल तक यह पता नहीं लग सकता है कि यथार्थ घटना किस समय हुई, इसलिए देशान्तर काल निकालने के लिए इनसे काम नहीं लिया जाता । देशान्तर काल से देशान्तर योजन कैसे जाना जाता है यह ६०-६१ श्लोकों के विज्ञान भाष्य से समझना चाहिये । यह बात तो स्पष्ट है कि सूर्य ६० घड़ी में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है जिससे किसी स्थान की स्फुट परिधि के चारों ओर वह ६० घड़ी में घूम आता है, इसलिए किसी स्थान के देशान्तर काल में स्फुट परिधि का वह खंड पूरा होगा जो उस स्थान से मध्यरेखा का अन्तर है। त्रैराशिक द्वारा इसे यों प्रकट करते हैं :— ६० घड़ी : देशान्तर घड़ी :: स्फुट परिधि : देशान्तर योजन । यहाँ देशान्तर जानने की कुछ अन्य रीतियों की चर्चा संक्षेप में करना आवश्यक है । देशान्तर जानने की रीतियां :—एक रीति तो ऊपर लिखी जा चुकी है। यह बहुत पुरानी रीति है और जब आजकल की तरह सूक्ष्म यंत्रों का निर्माण नहीं हुआ था तब इससे बढ़कर कोई दूसरी रीति हो भी नहीं सकती थी । आजकल जितनी रीतियां प्रचलित हैं उनमें से अधिकांश इसी के रूपान्तर हैं, यदि कुछ अन्तर है तो यह कि आजकल ग्रहण इत्यादि आकाशीय घटनाओं के होने के समय का सूक्ष्म ज्ञान किया जा सकता है जिससे देशान्तर काल जहां तक संभव है बहुत सूक्ष्मतापूर्वक जाना जा सकता है। जो रीति ऊपर बतलायी गयी है उसमें कुछ अशुद्धि रह जाती