भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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मध्यमाधिकार ३७ विज्ञान भाष्य-जब यह जानना होता है कि किसी इष्ट समय ग्रहों के स्थान क्या हैं तब सबसे पहिले यह जानना चाहिये कि सृष्टि के आदि से उस इष्ट समय तक कितने सावन दिन बीते । जब सावन दिनों की संख्या मालूम हो गयी तब त्रैराशिक के द्वारा ग्रहों का स्थान जान लेना सुगम होता है। क्योंकि सृष्टि के आदि में सब ग्रह एक साथ थे और एक महायुग में वह कितने भगण करते हैं तथा कितने सावन दिन होते हैं, यह भी बतला दिया गया है; इसलिए जब महायुगीय सावन दिनों में अमुक भगण होते हैं तब इष्टकाल तक के सावन दिनों में कितने भगण होंगे, यह जान लेने से ही ग्रह का स्थान निकल आता है। इष्टकाल तक के सावन दिनों की संख्या जिसे अहर्गण कहते हैं जानने की रीति ऊपर के तीन श्लोकों में बतलायी गई है। उदाहरण—१६७६ विक्रमीय की वसंत पंचमी (माघ सुदी ५) तक सृष्टि से कितने दिन बीते ? सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक = १,६५,३७,२०,००० सौर वर्ष त्रेता ,, ,, = १२,६६,००० सौर वर्ष द्वापर ,, ,, = ८,६४,००० ,, १६७६ वि० की चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = ५,०२३* ,, इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० के चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = १,६५,५८,८५,०२३ वर्ष = २३,४७,०६,२०,२७६ सौरमास* चै० शु० १ से माघ शु० १ के आरंभ तक = १० चांद्रमास इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ के मा० शु० १ तक = २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मास जब एक महायुग में ५,१८,४०,००० सौर मास होते हैं तब १५,६३,३३६ अधिमास होते हैं; इसलिए २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मासों में अधिमासों की संख्या हुई $\frac{२३,४७,०६,२०,२८६\times१५,६३,३३६}{५,१८,४०,०००} = ७२,१३,८४,७२६ अधिमास$ इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० की माघ शु० १ तक हुए २४,१९,२०,०५,०१२ चांद्रमास = ७,२५,७६,०१,५०,३६० तिथियाँ ∵ माघ सुदी ५ तक हुईं ७,२५,७६,०१,५०,३६५ तिथियाँ

  • १६७६ वि० में जिस समय मेष-संक्रान्ति लगेगी उस समय पूरे होंगे । इसलिए इन्हें मध्यम सौर वर्ष या मास कहना चाहिये ।