सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार २३ आकाश में एक ही जगह स्थिर नहीं रहता वरन् मन्दमति से पूरब की ओर बढ़ता रहता है । चन्द्रमा का उच्च १ चक्कर प्रायः ३२३२ सावन दिनों में कर लेता है। अन्य ग्रहों के उच्च या मन्दोच्च और भी मंदगति से पूरब की ओर बढ़ते हैं। आज- कल इस कल्पना से काम नहीं लिया जाता। गणित से यह सिद्ध किया गया है कि चन्द्रमा पृथ्वी की और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं और परिक्रमा करने का मार्ग वृत्ताकार नहीं वरन् दीर्घ-वृत्ताकार है। इस सम्बन्ध में कुछ कहने के पहिले दीर्घ-वृत्त के कुछ गुणों का बतला देना आवश्यक है। उ चा नी एक दीर्घ- वृत्त का चित्र है (चित्र ३) । उ नी को दीर्घ अक्ष तथा चा ची को लघु अक्ष कहते हैं और इन दोनों अक्षों के मिलने के विन्दु क को दीर्घ वृत्त का केन्द्र कहते हैं। केन्द्र पर लघु अक्ष तथा दीर्घ अक्ष के दो समान भाग हो जाते हैं। दीर्घ अक्ष पर केन्द्र से समान दूरी पर न ना दो ऐसे बिन्दु होते हैं जिनको यदि दीर्घ-वृत्त के किसी बिन्दु प, पा या पी से मिला दिया जाय तो प न + पना = पान + पाना = पीन + पीना । न, ना बिन्दुओं को दीर्घवृत्त की नाभि कहते हैं। यदि उ चा नी चन्द्र-कक्षा मान लिया जाय तो पृथ्वी का स्थान न होगा । न से चन्द्र कक्षा की दूरी उ बिन्दु पर सबसे अधिक तथा नी बिन्दु पर सबसे कम है, इसलिए उ विन्दु चन्द्रमा का उच्च या मन्दोच्च कहलायेगा और नी बिन्दु चन्द्रमा का नीच । यदि मन्दोच्च का स्थान ज्ञात हो तो नीच का स्थान सहज ही जाना जा सकता है, क्योंकि यह सदैव उच्च से १८०° पर रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी, मङ्गल, बुध, शुक्र इत्यादि भी दीर्घवृत्त में सूर्य की परिक्रमा करते हैं और सूर्य इन कक्षा-वृत्तों की नाभि पर रहता है। उच्च स्थान पर गति बहुत मंद और नीच स्थान पर बहुत तीव्र क्यों होती है, इसका कारण आकर्षण शक्ति की घटती-बढ़ती है। जब ग्रह उच्च पर रहता है तब उसका अंतर अत्यन्त अधिक होने के कारण आकर्षण शक्ति अत्यन्त कम होती है, जिससे ग्रह की गति मंद पड़ जाती है और जब वह नीच पर होता है तब अंतर अत्यन्त कम होने से आकर्षण शक्ति अत्यन्त अधिक होती है, जिससे ग्रह की गति बहुत तीव्र हो जाती है। इसके सम्बन्ध में कई नियम जाने गये हैं, जो केपलर के सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनकी चर्चा स्पष्टाधिकार नामक दूसरे अध्याय में उचित स्थान पर की जायगी । पात—सूर्य जिस मार्ग पर चलता हुआ १ वर्ष में आकाश का चक्कर लगाता हुआ जान पड़ता है, उसको क्रान्ति-वृत्त कहते हैं। इसी तरह चन्द्रमा, जिस मार्ग पर चलता हुआ पृथ्वी की परिक्रमा लगाता है उसको चन्द्र-कक्षा कहते हैं। क्रान्ति-वृत्त और चन्द्र-कक्षा एक ही तल पर नहीं हैं और समानान्तर भी नहीं हैं; इसलिए यह दोनों कक्षाएँ एक दूसरे से दो विन्दुओं पर मिलती हुई जान पड़ती हैं; जैसे दो उड़ती हुई पतंगों की डोरियां एक दूसरी से बहुत दूर रहती हुई भी एक विन्दु पर मिलती