भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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चन्द्रग्रहणाधिकार ४८३ = ((२ + १) दिनार्ध मान + उन्नत काल) / दिनार्ध मान कला = (दिनमान + दिनार्ध मान + उन्नत काल) / दिनार्ध मान कला इस प्रकार २६वें श्लोक की उपपत्ति सिद्ध हुई। परन्तु यहां यह बतला देना आवश्यक है कि आकाशीय पिंड का आकार उदय से लेकर यामोत्तर वृत्त तक एक क्रम से नहीं घटता इसलिए अनुपात से ग्रह का आकार जानना शुद्ध नहीं है जैसा ३६५ पृष्ठ में दी हुई वर्तन की सारणी से स्वयं प्रकट होता है। उदाहरण—संवत् १६८१ वि० की श्रावणी पूर्णिमा के चन्द्रग्रहण की गणना— सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार— पहले इस दिन के सूर्य, चन्द्रमा, और राहु को स्पष्ट करना चाहिए। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि कलियुग से इस दिन तक का अहर्गण क्या है। कलियुग के आरंभ से विक्रमी संवत् के आरंभ तक ३०४४ वर्ष विक्रम के आरंभ से १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति तक १६८१ ,, कलियुगादि से ,, ,, ,, ५०२५ ,, १ सौर वर्ष = ३६५.२५८७५६ सावन दिन ∵ ५०२५ सौर वर्ष = ५०२५ × ३६५.२५८७५६ सावन दिन = १८३५४२५.२४८६ ,, यह कलियुग के आरम्भ से १६८१ वि० की मध्यम मेष संक्रान्ति तक का समय है। स्पष्ट मेष संक्रान्ति २.१७०७ दिन पहले ही हो जाती है। इसलिए इसको घटा देने पर १६८१ वि० के मेष संक्रान्ति काल तक का समय १८३५४२३.०७८२ सावन दिन हुआ। अब यह देखना है कि मेष संक्रान्ति के दिन कौन तिथि थी। १ चान्द्र मास = २९.५३०५८८ सावन दिन इससे उपर्युक्त सावन दिनों को भाग देने पर लब्धि बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होगी और शेष ८.४४२२३६ सावन दिन चैत्र की मध्यम अमावस्या से मेष संक्रान्ति तक का समय होगा। इसलिए चैत्र की मध्यम अमावस्या से ८.४४२२३६ दिन उपरान्त मेष की संक्रान्ति लगी। इससे यह सिद्ध होता है कि इस वर्ष मलमास नहीं लगेगा, क्योंकि जब वैशाख कृष्ण ४ के उपरांत मेष संक्रान्ति होती है तब वर्ष