सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४८५ सूर्य और चंद्रमा के पूरे भगणों के छोड़ देने पर जो शेष रह जाते हैं वही श्रावणी पूर्णिमा की मध्यरात्रि काल में इनके मध्यम स्थान हैं । परन्तु चन्द्रोच्च और राहु के पूरे भगणों को छोड़ देने से जो शेष बचते हैं उनमें कुछ संस्कार करना पड़ता है क्योंकि कलियुग के १ आदि में चन्द्रोच्च कर्क के आदि विन्दु पर और राहु तुला के आदि विन्दु पर थे और राहु की गति उलटी होती है इसलिए श्रावणी पूर्णिमा की मध्य रात्रि के समय चन्द्रोच्च का स्थान ३ रा + १० रा २८° ३४'·०२ = १रा २८° ३४'·०२ राहु का स्थान ६रा - १रा २६° ६'·८ = ४रा ३° ५३'·२ सूर्य के मन्दोच्च की गति इतनी मन्द है कि इसका स्थान २रा १७° १७'·५२ ही मान लेना चाहिए२ । सूर्य का मन्द केन्द्र = २ रा १७° १७'·५२ - ३ रा २६° ५६'·७५ = १०रा १७° १७'·७७ = ३ पाद + १रा १७° १७'·८ ∴ चौथे पाद का गम्य भाग = १रा १२° ४२'·२ = ४२° ४२'·२ सूर्य की स्फुट मन्द परिधि ८४० - २० × भुजज्या ४२° ४२' / ३४३८ = ८४० - २०' × २३३० / ३४३८ = ८४०' - १४' = ८२६' भुजबल् = (८२६ × २३३०) / २१६०० = ८६'·१ = १° २६'·१ यही सूर्य का मन्दफल है क्योंकि इसका धनु इसी के समान होगा । यह ऋणात्मक है क्योंकि मन्द केन्द्र तुलादि है । इसलिए मध्य रात्रि का स्पष्ट सूर्य = ३ रा २६° ५६'·७५ - १° २६'·१ १. मध्यमाधिकार श्लोक ५७, ५८ और पृष्ठ ५० २. स्पष्टाधिकार पृष्ठ १४६