सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 519, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ सूर्य-सिद्धान्त अर्थात् काशी में सूर्योदय से ४६ घड़ी ४४ पल पर सर्वग्रास ग्रहण का आरम्भ होगा और पूरा चन्द्रबिम्ब अन्धकारमय हो जायगा । स्पर्श काल में स्थित्यर्ध काल का दूना जोड़ देने से मोक्षकाल और सम्मीलन- काल में विमर्दार्ध का दूना जोड़ देने से उन्मीलन काल ज्ञात हो जायेंगे । स्थित्यर्ध = ४ घड़ी २० पल ∵ ग्रहण की स्थिति = ८ घड़ी ४० पल स्पर्शकाल ४६ घड़ी १६ पल, सूर्योदय से ∴ मोक्षकाल ५४ घड़ी ५६ पल ’’ विमर्दार्ध = ५४ पल ∵ विमर्द अथवा सर्वग्रास ग्रहण की स्थिति = १ घड़ी ४४ पल सम्मीलन-काल सूर्योदय से ४६ ४४ पर ∴ उन्मीलनकाल सूर्योदय से ५१ २८ पर सब का सार उपर्युक्त गणना के अनुसार बापूदेव शास्त्री के पत्रा के अनुसार घ० पल घ० पल स्पर्श ४६ १६ ४६ ८ सम्मीलन ४६ ४४ ४८ ३६ मध्य ५० ३६ ५० ४० उन्मीलन ५१ २८ ५२ ४३ मोक्ष ५४ ५६ ५५ ११ म० म० बापूदेव शास्त्री के पत्रे में ग्रहण काल के सम्बन्ध में जो समय दिये हैं वे नाविक पञ्चाङ्ग (Nautical almanac) से बिलकुल मिलते-जुलते हैं । इसलिए ये समय बिल्कुल शुद्ध हैं । सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए समय इनसे बहुत भिन्न हैं । इसलिए अब यह देखना है कि इस भिन्नता का कारण क्या है ? सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ग्रहण के जो मूलाङ्क आये हैं उनकी तुलना ज्योति- र्गणित से निकाले हुए मूलाङ्कों से करने पर देख पड़ता है कि सूर्य और चंद्रमा के भोगांश दोनों रीतियों के अनुसार प्रायः एकसे हैं परन्तु राहु के भोगांशों में बड़ा अन्तर है जिसके कारण चंद्रमा के शर में महान् अन्तर पड़ जाता है । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि यदि राहु का यथार्थ भोगांश नवीन रीति से जानकर चंद्रमा का शर जाना जाय और इसी शर से चंद्र-ग्रहण की गणना की जाय तो क्या आता है ।