सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४६५ ज्योतिर्गणित के अनुसार राहु का भोगांश १२०°४′.५ होता है। इस ग्रंथ के अनुसार इस वर्ष का अयनांश २२°४७′ होता है परन्तु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति जिस समय हुई थी उस समय अयनांश २२°३७′ ३८″.१ था (देखो पृ० २५२) । दो वर्ष में अयनांश की वृद्धि = ५८″.६६३३४४ × २ + ˙०००१११ × ३² = ११७″ ३२६७ + ˙००१ = ११७″.३२७७ = १′ ५७″.३३ १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति से १२४ दिन बाद श्रावण को पूर्णिमा हुई इसलिए १२४ दिन में अयनांश की वृद्धि १६″.६३ होगी । इसलिए श्रावणी पूर्णिमा के दिन अयनांश = २२° ३७′ ३८″.१ + १′ ५७″.३ + १६″.६ = २२° ३६′ ५५″ = २२°४०′ स्वल्पान्तर से इससे प्रकट है कि ज्योतिर्गणित का मेष विन्दु सूर्य सिद्धान्त के मेष विन्दु से इस वर्ष ७′ आगे था। इसलिए जब ज्योतिर्गणित के अनुसार राहु का भोगांश १२०°४′.५ है तब सूर्य-सिद्धान्त के मेष-विन्दु से स्पष्ट राहु का भोगांश १२०° ११′.५ होगा । राहु के इसी भोगांश से चन्द्रमा का शर जानकर ग्रहण काल जानने से यह पता चलेगा कि केवल राहु की गति में संशोधन कर देने से सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाला हुआ ग्रहण काल यथार्थता से कितना भिन्न है । पूर्णिमान्त काल का स्पष्ट चंद्रमा सूर्य-सिद्धान्तानुसार २६८°३४′ ,, राहु दृग्गणितानुसार १२०°११′.५ ,, राहु से चंद्रमा का अन्तर १७८°२२′.५ दृग्गणित अथवा ज्योतिर्गणित के अनुसार चन्द्रमा का परमशर ५°६′ होता है न कि ४°३०′ जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त में लिखा है । इसलिए चन्द्रमा की पूर्णिमान्त- कालिक शरज्या ज्या ५°६′ × ज्या १७८°२२′.५ = --------------------------- ३४३८ ज्या ५°६′ × ज्या १°३७′.५ = ------------------------- ३४३८ ३०६ × ६७.५ = ------------ ३४३८ = ६′.७६