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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६५ ज्योतिर्गणित के अनुसार राहु का भोगांश १२०°४′.५ होता है। इस ग्रंथ के अनुसार इस वर्ष का अयनांश २२°४७′ होता है परन्तु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति जिस समय हुई थी उस समय अयनांश २२°३७′ ३८″.१ था (देखो पृ० २५२) । दो वर्ष में अयनांश की वृद्धि = ५८″.६६३३४४ × २ + ˙०००१११ × ३² = ११७″ ३२६७ + ˙००१ = ११७″.३२७७ = १′ ५७″.३३ १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति से १२४ दिन बाद श्रावण को पूर्णिमा हुई इसलिए १२४ दिन में अयनांश की वृद्धि १६″.६३ होगी । इसलिए श्रावणी पूर्णिमा के दिन अयनांश = २२° ३७′ ३८″.१ + १′ ५७″.३ + १६″.६ = २२° ३६′ ५५″ = २२°४०′ स्वल्पान्तर से इससे प्रकट है कि ज्योतिर्गणित का मेष विन्दु सूर्य सिद्धान्त के मेष विन्दु से इस वर्ष ७′ आगे था। इसलिए जब ज्योतिर्गणित के अनुसार राहु का भोगांश १२०°४′.५ है तब सूर्य-सिद्धान्त के मेष-विन्दु से स्पष्ट राहु का भोगांश १२०° ११′.५ होगा । राहु के इसी भोगांश से चन्द्रमा का शर जानकर ग्रहण काल जानने से यह पता चलेगा कि केवल राहु की गति में संशोधन कर देने से सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाला हुआ ग्रहण काल यथार्थता से कितना भिन्न है । पूर्णिमान्त काल का स्पष्ट चंद्रमा सूर्य-सिद्धान्तानुसार २६८°३४′ ,, राहु दृग्गणितानुसार १२०°११′.५ ,, राहु से चंद्रमा का अन्तर १७८°२२′.५ दृग्गणित अथवा ज्योतिर्गणित के अनुसार चन्द्रमा का परमशर ५°६′ होता है न कि ४°३०′ जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त में लिखा है । इसलिए चन्द्रमा की पूर्णिमान्त- कालिक शरज्या ज्या ५°६′ × ज्या १७८°२२′.५ = --------------------------- ३४३८ ज्या ५°६′ × ज्या १°३७′.५ = ------------------------- ३४३८ ३०६ × ६७.५ = ------------ ३४३८ = ६′.७६

४९६ सूर्य-सिद्धान्त

इसलिए पूर्णिमान्तकालिक चन्द्र शर भी ८'.७६ ही हुआ । चन्द्र शर के इसी मान को मानैक्य खंड और मानान्तर-खंड के साथ रख कर गणना करने से पहले की तरह ग्रास का परिमाण = ६०'·६३ - ८'·७६ = ५१'·८७ स्थित्यर्ध = ६० घड़ी × √{ (६०.६३ + ८.७६)(६०.६३ - ८.७६) } / ७६५.५ = ६० × √{ ६६.३६ × ५१.८७ } / ७६५.५ घड़ी = ६० × ५६.६६ / ७६५.५ घड़ी = ४ घड़ी ४२ पल इसलिए ग्रहण स्थिति काल = ६ घड़ी २४ पल विमर्दार्ध = ६० घड़ी × √{ (२७.३१ + ८.७६)(२७.३१ - ८.७६) } / ७६५.५ = ६० × √{ ३६.०७ × १८.५५ } / ७६५.५ घड़ी = ६० × २५.८६७ / ७६५.५ घड़ी = २ घड़ी १.६५ पल इसलिए विमर्द अथवा सर्वग्रास स्थिति काल = ४ घड़ी ३ पल के लगभग घ. पल पूर्णिमान्त काल = ३ २३ मध्यरात्रि के उपरान्त स्थित्यर्ध घटाया - ४ ४२ स्पर्श काल - १ १६ ऋण चिह्न प्रकट करता है कि १ घड़ी १६ पल मध्यरात्रि से पहले का समय है । पहले लिखे हुए सब संस्कार संक्षेप में यों लिखे जाते हैं :- घड़ी पल स्पर्श काल - १ १६ काशी का देशान्तर + १ १३

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६७ काल समीकरण - ० ११ चरकाल +१ ११ मध्यम प्रातःकाल से } +४५ ० मध्यम मध्यरात्रि तक } काशी के सूर्योदय से } ४५ ५४ पर होगा । स्पर्शकाल का आरम्भ } पूर्णिमान्त काल ३ २३ मध्यरात्रि के उपरान्त विमर्दार्ध - २ १.७ सम्मीलन काल १ २१.३ मध्यरात्रि के उपरान्त काशी का देशान्तर +१ १३ काल समीकरण - ० ११ चरकाल +१ ११ प्रातःकाल से मध्य } ४५ ० रात्रि तक } काशी के सूर्योदय के } ४८ ३४.३ पर होगा । सर्वग्रास का आरम्भ } विमर्द काल ४ ३.४ ∵ काशी के सूर्योदय से उन्मीलन ५२ ३३.७ पर होगा इसी प्रकार स्पर्शकाल में ग्रहण स्थिति काल जोड़ने से काशी के सूर्योदय से ५५ घड़ी १८ पल पर ग्रहण का मोक्ष होगा । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त के राहु के भोगांश की जगह राहु का यथार्थ भोगांश प्रयोग करने से सर्वग्रास ग्रहण का आरम्भ और अन्त यथार्थता के बहुत निकट हो जाता है । इन सब बातों से जान पड़ता है कि सूर्य-सिद्धान्त में राहु का भगण काल बहुत अशुद्ध है । इसकी अपेक्षा ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य के अनुसार राहु की गणना बहुत शुद्ध है और यथार्थता के बहुत निकट है । यह पहले बतलाया गया है कि ग्रहण की गणना करने के लिए सूर्य और चन्द्रमा के लंबन, बिम्ब, दूरी, इत्यादि की जानकारी जितनी सूक्ष्म हो ग्रहण-काल उतना ही शुद्ध आते हैं । यह भी दिखलाया गया है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा की जो गति बिम्बमान इत्यादि निकलते हैं वह स्थूल हैं । यदि इन सबका विचार दृग्गणित के अनुसार किया जाय तो ग्रहण के प्रत्यक्षकाल और गणित सिद्ध काल में कुछ भी अन्तर न पड़ेगा । इसलिए कम से कम ग्रहण काल का शुद्ध समय

४६८ सूर्य-सिद्धान्त जानने के लिए अपने सिद्धान्त ग्रन्थों में ऐसे संशोधनों का समावेश करना चाहिए जो दृग्गणित से सिद्ध होते हैं। ऐसे संशोधनों की पूरी जानकारी कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे यहां एक वेधशाला ऐसी हो जिससे अर्वाचीन ज्योतिष का पठन-पाठन सुगमतापूर्वक हो सके । मेरी समझ में यह अधर्म है कि हम अपने पंचांगों में ग्रहण, शृङ्गोन्नति, ग्रहोदय, ग्रहास्त, इत्यादि की गणना करने के लिए पाश्चात्य देशों में बने हुए नाविक पंचांगों के आश्रित हों परन्तु इनके सिद्धान्तों के पठन-पाठन का स्वतन्त्र प्रबन्ध न करें । अब संक्षेप में यह दिखलाया जायगा कि ज्योतिर्गणित के अनुसार इस ग्रहण के मूलाङ्क क्या हैं । पूर्णमान्तकालिक मूलाङ्क स्पष्ट रवि ११८°५६′·२३ स्पष्ट चन्द्र २९८°५६′·२३ रविदिन गति ५७′·६ चन्द्र दिन गति १४°८′·१ राहु १२०°४′·५ रवि लम्बन ०′·१५ चन्द्र परम लम्बन ५६′·३ चन्द्र बिम्ब ३२′·४ भूभा बिम्ब ८७′·० मानैक्य खंड ५६′·६ मानान्तर खंड २७′·२ अयनांश २२°४७′ चन्द्र शर उत्तर ६′·६ प्रातःकाल की सूर्य क्रान्ति १४°३१′·३ यह पहले बतलाया गया है कि अयनांशों में भिन्नता क्यों है। इस भिन्नता के कारण रवि राहु और चन्द्रमा के भोगांशों में भी ७′ का अन्तर हो जायगा । इन मूलाङ्कों से यदि ग्रहण की गणना की जाय तो नाविक पञ्चांग में दिये हुए समय से २ या ३ पल का अन्तर रह जाता है। इसका कारण यह है कि ऊपर सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक गतियां ही ली गयी हैं जबकि सूक्ष्म गणना के लिये इनका प्रत्येक घड़ी की गति स्पर्श, सम्मीलन, उन्मीलन कालों को जान कर काम लेना चाहिए।

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६६ इसी प्रकार चन्द्रमा के शर की भी गणना करनी चाहिए जैसा कि चित्र ६८ के सम्बन्ध में बतलाया गया है। ऐसा करने से गणना का विस्तार बहुत हो जायगा इसलिए वह नहीं दिखलाया जाता । स्पर्श काल और मोक्ष काल के स्फुट वलनों की गणना— स्फुट वलन के लिए आक्षवलन और अयन वलन का जानना आवश्यक है । आक्षवलन के लिए चन्द्रमा की तात्कालिक क्रान्ति और नतकाल जानना चाहिए। क्रान्ति की गणना— ऊपर बतलाया गया है कि स्थित्यर्ध ४ घड़ी ४२ पल है जिसमें चन्द्रमा १°४′२८″ अथवा १°४′·५ चलता है क्योंकि चन्द्रमा की दैनिक गति ८२३′ है। पूर्णिमान्त कालिक चन्द्र भोगांश २६८°३४′ स्थित्यर्ध में चन्द्रमा की गति १°४′·५ ∴ स्पर्शकालिक चन्द्र भोगांश २६७°२६′·५ और मोक्षकालिक चन्द्र भोगांश २६९°३८′·५ राहु का भोगांश दोनों कालों में १२०°११′·५ ∴ स्पर्श काल में राहु से चन्द्रमा का अन्तर १७७°१८′ मोक्ष काल में राहु से चन्द्रमा का अन्तर १७६°२७′ स्पर्शकालिक चन्द्र शर ज्या = ज्या ५°६′ ज्या १७७°१८′ / ३४३८ = ज्या ५°६′ ज्या २°४२′ / ३४३८ = ३०६ × १६२ / ३४ = १४′·६ ∴ स्पर्शकालिक चन्द्र शर = १४′·६ मोक्षकालिक चन्द्र शर ज्या = ज्या ५°६′ ज्या १७६°२७′ / ३४३८ = ३०६ × ३३ / ३४३८ = ३′. ∴ मोक्षकालिक चन्द्र शर = ३′

५०० सूर्य-सिद्धान्त स्पर्शकालिक चन्द्र भोगांश = २९७°२६'·५ अयनांश = २२°४०' स्पर्शकालिक चन्द्र सायन भोगांश = ३२०°६'·५ इसी प्रकार मोक्षकालिक चन्द्र सायन भोगांश = ३२२°१८'·५ स्पर्शकालिक चन्द्र मध्यम क्रान्ति ज्या = ज्या २३°२७' ज्या ३२०°६'·५ = ३६७६ × ६४०५ = २४४६ ∴ मध्यम क्रान्ति = १४°४६' दक्षिण चन्द्र शर = ०°१४'·६ उत्तर ∴ स्पर्शकाल के चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति = १४°३१'·४ दक्षिण यह स्पष्टाधिकार श्लोक ५८ के अनुसार है। यदि शुद्ध गणना करनी हो तो पृ० २०२ में बतलायी गयी रीति से काम लेना चाहिए जो विस्तार भय से यहां छोड़ दी जाती है। इसी प्रकार मोक्षकालिक चन्द्र मध्यम क्रान्ति = १४°५' दक्षिण शर = ३' उत्तर ∴ ,, चन्द्र स्पष्ट क्रान्ति = १४°२' दक्षिण नतकाल की गणना-- चन्द्रमा का नतकाल जानने के लिए पहले सूर्य का नतकाल जानना पड़ता है। मध्याह्न काल में सूर्य यामोत्तर वृत्त पर रहता है और मध्य रात्रि काल में भी वह क्षितिज के नीचे यामोत्तर वृत्त पर रहता है इसलिए पृथ्वी की छाया का केन्द्र मध्य रात्रि काल में ठीक यामोत्तर वृत्त पर रहता है क्योंकि पृथ्वी की छाया का केन्द्र सूर्य से ठीक १८०° पर रहता है। इसलिए मध्यरात्रि काल में पृथ्वी की छाया के केन्द्र का नतकाल शून्य होता है। यदि यह जान लिया जाय कि स्पर्शकाल मध्य रात्रि से कितना पहले या पीछे है तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि स्पर्शकाल में पृथ्वी की छाया के केन्द्र का नतकाल कितना पूर्व या पच्छिम है। चन्द्रग्रहण के समय चन्द्रमा पृथ्वी की छाया के बहुत पास रहता है और यह मालूम ही रहता है कि चन्द्रमा पृथ्वी की छाया से कितने अंतर पर है इसलिए चन्द्रमा का नतकाल सहज ही जाना जा सकता है। घड़ी पल उदयकालिक सूर्य का चरकाल = १ ११ मध्यम प्रातः काल से मध्य रात्रि तक = ४५ ०

चन्द्रग्रहणाधिकार ५०५ सूर्योदय से मध्यरात्रि तक = ४६ ११ सूर्योदय से स्पर्शकाल का समय = ४५ ५४ मध्य रात्रि से पहले स्पर्शकाल का समय = ० १७ इसलिए जो कुछ ऊपर कहा गया है उसके अनुसार स्पर्शकाल के समय पृथ्‍वी की छाया के केन्द्र का नतकाल १७ पल = १०२ असु है अर्थात् स्पर्श के आरंभ के उपरान्त १७ पल पर पृथ्‍वी की छाया का केन्द्र ठीक याम्योत्तर वृत्त पर आ जावेगा । घड़ी पल सूर्योदय से मोक्ष का समय = ५५ १८ " मध्य रात्रि का समय = ४६ ११ मध्य रात्रि के उपरान्त मोक्ष का समय ६ ७ इसलिए मोक्षकालिक पृथ्‍वी की छाया के केन्द्र का नत काल ६ घड़ी ७ पल या ५४७ पल या ३२८२ असु है । अब यह देखना है कि स्पर्श काल के समय भूमाकेन्द्र का भोगांश क्या है ? पूर्णिमान्त कालिक सूर्य का भोगांश = ११८° ३४' स्थित्यर्ध ४ घड़ी ४२ पल में सूर्य की गति = ४' ५ ∴ स्पर्शकालिक सूर्य का भोगांश = ११८° २६' ५ सूर्य से भूभाकेन्द्र का अन्तर = १८०° ० ∴ स्पर्शकालिक भूभाकेन्द्र का भोगांश = २६८° २६' ५ चंद्रमा का भोगांश = २६७° २६' ५ ∴ स्पर्श के समय भूमा केन्द्र से चंद्रमा का अंतर = १° इसको विषुवकाल में बदलने के लिए स्पष्टाधिकार के श्लोक ५६ से काम लेना चाहिए । चंद्रमा सायन कुम्भ राशि में है जिससे लंका के उदयासु १७६४ १ हैं (देखो पृष्ठ ३१४) इसलिये १° के उदयासु १७६४ ÷ ३० = ५६.८ = ६० स्पर्शकालिक भूभाकेन्द्र का पूर्व नतकाल = १०२ असु भूभाकेन्द्र से चन्द्रमा का अन्तर पच्छिम की ओर = ६० असु स्पर्श कालिक चंद्रमा का नतकाल ४२ असु = ४२' पूर्णिमान्तकालिक सूर्य का भोगांश = ११८° ३४' १. नतकाल जानने के लिये लंका के उदयासुओं से काम लेना चाहिये क्योंकि मध्य लग्न का विचार लंका के उदयासुओं से ही किया जाता है, देखो पृष्ठ ३२६-३३० ।

५०२ सूर्य-सिद्धान्त स्थित्यर्ध ४ घड़ी ४२ पल में सूर्य की गति = ४′·५ ∴ मोक्षकालिक सूर्य का भोगांश = ११८°३८′·५ सूर्य से भूभाकेन्द्र का अंतर = १८०° ∴ मोक्षकालिक भूभाकेन्द्र का भोगांश = २९८°३८′·५ ,, चंद्रमा का भोगांश = २९६°३८′·५ ,, भूभाकेन्द्र से चन्द्रमा का अंतर } १° पूर्व की ओर इसके उदयासु भी पूर्ववत् ६० असु होंगे । मोक्षकालिक भूभाकेन्द्र का पच्छिम नतकाल = ३२८२ असु भूभाकेन्द्र से चंद्रमा का अंतर पूर्व की ओर = ६० असु ————————— ∴ मोक्षकालिक चंद्रमा का नतकाल ३२२२ असु = ३२२२′ = ५३°४२′ चंद्रमा की स्पर्शकालीन चर ज्या = स्परे २५°२०′ x स्परे १४°३१′·४ = ·४७३४ x ·२५६० = ·१२२६ ∴ स्पर्शकालीन चरांश = ७°२′ पृष्ठ २६२ के समीकरण (ग) के अनुसार, नतांश कोटिज्या = (कोज्या ४२′ - ज्या ७°२′) कोज्या २५°२०′ कोज्या १४°३१′·४ = (·६६६६ - ·१२२६) x ·६०३८ x ·६८०६ = ·८७७३ x ·६०३८ x ·६६८ = ·७६७५ ∴ स्पर्शकालीन नतांश = ३६°५३′ पृष्ठ २७६ के अनुसार, ज्या अग्रा = ज्या १४°३१′४ / (ज्या ३६°५३′ x कोज्या २५°२०′)

  • को स्परे ३६°५३′ x स्परे २५°२०′ = ·२५०८ / (·६४१२ x ·६०३८) + १·१६६७ x ·४७३४ = ·४३२८ + ·५६६५

चन्द्रग्रहणाधिकार ५०३ = ·६६६२ ∴ अग्रा = ८७°५४′ ∴ पूर्व विन्दु से चन्द्रमा का दिगंश = ८७°५४′ दक्षिण और उत्तर विन्दु से ,, = ९०° + ८७°५४′ = १७७°५४′ दक्षिण ∴ स्परे (ख उ ग) = अग्रा कोटि ज्या × नतांश स्पर्शरेखा = कोज्या ८७°५४′ × स्परे ३६°५३′ = ·०३६६ × ·८३५६ = ·०३०६ समप्रोत वृत्त का नतांश = १°४५′ ज्या २५°२०′ ज्या १°४५′ ज्या (आक्षवलन) = ─────────────────────── कोज्या १४°३१′ ·०१३१ = ───── = ·०१३५ ·९६८ ∴ आक्षवलन = ०°४६′ उत्तर स्पर्शकालीन चन्द्रमा का भोगांश २६७°२६′·५ अयनांश २२°४०′ ───────── स्पर्शकालीन चन्द्रमा का सायन भोगांश ३२०°६′·५ इसमें ९०° जोड़ने से चंद्रमा का सायन भोगांश ५०°६′·५ होता है जिसकी क्रान्ति उत्तर होगी । इसलिए आयनवलन भी उत्तर होगा । ∵ पृष्ठ ४८० के सूत्र (२) के अनुसार ज्या २३°२७′ × कोज्या ३२०°६′·५ ज्या ( आयनवलन ) = ───────────────────────────────── कोज्या १४°३१′·५ ·३६७६ × ·७६७६ = ───────────── कोज्या १४°३१′·५ = ·३१५७ ∴ आयनवलन = १८°२४′ उत्तर ∴ स्पर्शकालीन स्फुटवलन = १८°२४′ + ०°४६′ = १९°१०′ उत्तर

५०४ सूर्य-सिद्धान्त चंद्रमा की मोक्षकालीन चरज्या = स्परे २५°२०' स्परे १४°२' = ·४७३४ x ·२४६६ = ·११८६३ ∴ मोक्षकालीन चरांश = ६°४८' ∴ मोक्षकालीन नतांश कोटिज्या = (कोज्या ५३°४२' - ज्या ६°४८') कोज्या २५°२०' कोज्या १४२° = (·५६२० - ·११८६३) x ·६०३८ x ·६७०२ = ·४७३७ x ·६०३८ x ·६७०२ = ·४१५४ ∴ मोक्षकालीन नतांश = ६५°२७' ज्या अग्रा = \frac{ज्या १४°२'}{ज्या ६५°२७' कोज्या २५°२०'} + कोस्परे ६५°२७' x स्परे २५°२२' = \frac{·२४२५}{·६०६६ x ·६०३८} + ·४५६८ x ·४७३४ = ·२६५० + ·२१६३ = ·५११३ ∴ अग्रा = ३०°४५' ∴ पश्चिम बिन्दु से चंद्रमा का मोक्षकालीन दिगंश = ३०°४५' दक्षिण ∴ स्परे (खउग) = अग्रा कोटिज्या x नतांश स्पर्शरेखा = कोज्या ३०°४५' स्परे ६५°२७' = ·८५६५ x २·१८६३ = १·८८१७ ∴ समप्रोतवृत्त का नतांश = ६२°१' ∴ ज्या (आक्षवलन) = \frac{ज्या २५°२०' ज्या ६२°१'}{कोज्या १४·२'} = \frac{·४२७६ x ·८८३०}{·६७०२} = \frac{·३७७८}{·६७०२} = ·३८६४ ∴ आक्षवलन = २२°५५' दक्षिण

चन्द्रग्रहणाधिकार ५०५. मोक्षकालीन चंद्रमा का भोगांश = २६६° ३८' · ५ अयनांश = २२° ४०' चंद्रमा का सायन भोगांश = ३२२° १८' · ५ इसमें ६०° जोड़ने से सायन भोगांश ५२° १८' · ५ होगा जिसकी क्रान्ति उत्तर होती है । इसलिए आयनवलन उत्तर होगा । ज्या २३° २७' कोज्या ३२२° १८' · ५ ज्या ( आयनवलन ) = ----------------------------------------- कोज्या १४° २' ·३६७६ X कोज्या ३७° ४१' · ५ = --------------------------- ·६७०२ ·३६७६ X ·७६१३ = -------------- ·६७०२ ·३१४६ = ------ ·६७०२ = ·३२४६ ∵ आयनवलन = १८° ५६' उत्तर ∵ स्फुटवलन = - २२° ५५' + १८° ५६' = ३° ५६' दक्षिण इसी प्रकार सम्मीलन, मध्य और उन्मीलन कालों के स्फुटवलन जाने जा सकते हैं । स्फुटवलनों और ग्रह बिम्बों के अंगुलात्मक मान जानने का जो नियम २६वें श्लोक में बतलाया गया है उसकी आवश्यकता परिलेखाधिकार में पड़ेगी इसलिए वहीं इसका उदाहरण भी दिया जायगा । इस प्रकार चन्द्रग्रहणाधिकार नामक चौथे अधिकार का विज्ञानभाष्य समाप्त हुआ । ५

पंचम अध्याय सूर्यग्रहणाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १--किस समय सूर्य के लंबन और नति शून्य होते हैं। श्लोक २-८-लंबन जानने के नियम । श्लोक ६—लंबन का संस्कार देकर असकृत्कर्म से अमावस्यान्त काल निश्चय करना । श्लोक १०-११—नति जानने के नियम । श्लोक १२-नति और चन्द्रमा के शर के योग या अन्तर से नति-संस्कृत-शर जाना जाता है। श्लोक १३-नति-संस्कृत-शर से स्थिति, विमर्द इत्यादि जाना चाहिए । श्लोक १४-१७-स्पर्श और मोक्षकाल के लंबन को जानकर असकृत्कर्म से फिर स्पर्श और मोक्षकाल की गणना करनी चाहिए । ] लंबन और नतिका अभाव कब होता है- मध्यलग्नसमे भानौ हरिजस्य न संभवः । अक्षोदङ् मध्यभक्रान्तिसाम्ये नावनतेरपि ॥१॥ अनुवाद-(१) जब सूर्य त्रिभोन लग्न पर होता है तब उसमें भोगांश- लंबन का अभाव होता है । जब किसी स्थान का उत्तर अक्षांश और त्रिभोन लग्न की उत्तर क्रान्ति समान होते हैं अर्थात् जब सूर्य ख-स्वस्तिक पर रहता है तब उसमें नति अर्थात् शर-लंबन का अभाव होता है । विज्ञानभाष्य-इस श्लोक के मध्यगत का अनुवाद त्रिभोन लग्न किया गया है यद्यपि पृष्ठ ३२६ में बतलाया गया है कि मध्यलग्न वित्रिम लग्न अथवा त्रिभोन लग्न से भिन्न होता है । परन्तु यहाँ आचार्य ने त्रिभोन लग्न को मध्य इसलिए लिख दिया कि यह उदय और अस्त लग्नों के मध्य में होता है, यद्यपि एक ही शब्द का प्रयोग दो अर्थों में संदिग्ध होता है । यदि मध्यलग्न का वह अर्थ लिया जाय जो त्रिप्रश्नाधिकार के श्लोक ४८ में माना गया है तो भाव अशुद्ध ठहरता है इसलिये यहाँ मध्य-लग्न का अर्थ त्रिभोन लग्न ही है। यदि सूर्य या कोई ग्रह त्रिभोन लग्न पर हो तो भोगांश-लंबन शून्य होता है । इसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार में विस्तारपूर्वक बतलायी गयी है (देखो पृ० ४१०) । शर-लंबन के सम्बन्ध में भी वहीं बतलाया जा चुका है । देशकालविशेषेण यथाऽवनतिसंभवः । लम्बनस्यापि पूर्वान्यदिग्वशाच्च तथोच्यते ॥२॥

सूर्यग्रहणाधिकार ५०७ अनुवाद—(२) पहले श्लोक में बतलायी गई स्थिति से भिन्न दशा में देश कालानुसार जैसी नति होती है और जब सूर्य वितिभ लग्न से पूर्व वा पश्चिम होता है तब उसमें जैसा भोगांश-लंबन होता है उसकी चर्चा यहाँ की जाती है । लग्नं पर्वान्तनाडीभिः कुर्यात्स्वैदयासुभिः । तज्ज्याऽन्त्यापक्रमज्याघ्ना लम्बज्याप्तोदयाभिधा ॥३॥ तथा लङ्‌कोदयैर्लग्नं मध्यसंज्ञं यथोदितम् । तत्कान्त्यक्षांशसंयोगो दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ॥४॥ शेषं नतांशास्तन्मौर्वी मध्यज्या साऽभिधीयते । मध्योदयज्याऽभ्यस्ता त्रिज्याप्ता वर्गितं फलम् ॥५॥ मध्यज्यावर्गंतः प्रोज्झ्य दृक्क्षेपः शेषतः पदम् । तत्रिज्यावर्गविश्लेषान्मूलं शङ्‌कुस्स दृग्गतिः ॥६॥ अनुवाद—(३) पर्वान्तकाल अर्थात् अमावस्या के अंतकाल का खण्ड इष्ट स्थान के (राशि के) उदयासुओं से जान कर उसकी ज्या को परमक्रान्ति ज्या से गुणा करके गुणनफल को इष्ट स्थान की लम्ब ज्या या अक्षांश-कोटिज्या से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे उदय या उदयज्या कहते हैं । (४) पर्वान्त काल में लङ्का के उदयासुओं से पहले कहे हुए के अनुसार मध्यलग्न अथवा दशम लग्न जानकर उसकी क्रान्ति को इष्ट स्थान के अक्षांश में जोड़ दे यदि दोनों की दिशायें एक ही हों । यदि दिशाएँ भिन्न हों तो क्रान्ति और अक्षांश का अन्तर निकाले । (५) जोड़ने या घटाने से जो कुछ आवे वही मध्य लग्न का नतांश है । इसी की ज्या को मध्य ज्या कहते हैं । मध्यज्या को उदयज्या से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से भाग दे और लब्धि का वर्ग करे । (६) और वर्गफल को मध्य ज्या के वर्ष से घटा और शेष का वर्गमूल निकाले । वर्गमूल निकालने को जो आता है वही दृक्क्षेप कहलाता है । दृक्क्षेप के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटा कर वर्गमूल निकालने से जो आता है वही शंकु या दृग्गति है । विज्ञानभाष्य—इन चार श्लोकों में जो क्रिया बतलायी गई है उसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ४११-४१३ में अच्छी तरह बतलायी गयी है। उसी स्थान के चित्र ७६ से प्रकट होता है कि मध्य लग्न की क्रान्ति और इष्ट स्थान के अक्षांश को कब जोड़ना चाहिये और कब घटाना चाहिये । इनकी दिशाओं के जानने की रीति वही है जो पृष्ठ २६५-२६६ में बतलायी गयी है । यहाँ लग्न का अर्थ सायन लग्न समझना चाहिये । नतांशबाहुकोटिज्ये स्फुटे दृक्क्षेपदृग्गती । एकज्यावर्गस्तच्छेदो लब्धं दृग्गति जीवया ॥७॥

५०८ सूर्य-सिद्धान्त मध्यलग्नार्कविश्लेषज्या छेदेन विभाजिता । रवोन्दोर्लम्बनं ज्ञेयं प्राक्पश्चाद्घटिकादिकम् ॥८॥ अनुवाद—(७) स्थूल रूप से दशम लग्न के नतांश की ज्या को दृक्क्षेप और कोटिज्या को दृग्गति कह सकते हैं । एक राशि की ज्या के वर्ग को दृग्गति रूपी जीवों से भाग देने पर जो आता है उसे छेद कहते हैं । (८) त्रिभोन लग्न से सूर्य जितना दूर रहता है उसे विश्लेष या विश्लेषांश कहते हैं । इसकी ज्या को छेद से भाग देने पर सूर्य या चन्द्रमा का पूर्व या पश्चिम लंबन घड़ियों में आ जाता है । यदि सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व है तो पूर्व लंबन और पश्चिम है तो पश्चिम लंबन होता है । विज्ञानभाष्य—दृक्क्षेप और दृग्गति के शुद्ध रूप तो वही हैं जो ६वें श्लोक में बतलाये गये हैं । परन्तु उनके जानने की रीति लम्बी है इसलिये ७वें श्लोक के पूर्वार्ध में छोटी रीति बतलायी गयी है जो स्थूल है। इस छोटी रीति में मध्यलग्न के नतांश को ही त्रिभोन लग्न का नतांश मान लिया गया है क्योंकि इन दोनों में बहुत कम अंतर रहता है । परन्तु इससे स्थूलता अवश्य आ जाती है । छेद और विश्लेषांश से सूर्य और चन्द्रमा का भोगांश लंबन आनन की जो रीति यहाँ बतलायी गयी है उसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ४१३ और पृष्ठ ४०५-४०६ में बतलायी गई है । मध्यलग्नाधिके भानौ तिथ्यन्तात्प्रविशोधयेत् । धनमूनेऽसकृत्कर्म यावत्सर्वं स्थिरीभवेत् ॥६॥ अनुवाद—(६) त्रिभोनलग्न के भोगांश से सूर्य का भोगांश अधिक हो तो सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व रहता है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लंबनों के अंतर को अमावस्या के अंतकाल से घटाना चाहिए । परन्तु यदि त्रिभोनलग्न के भोगांश से सूर्य का भोगांश कम हो तो सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लंबों के अंतर को आमावस्या के अंतकाल में जोड़ना चाहिए । अमावस्या के अंतकाल में भोगांश लम्बन का इस प्रकार संस्कार करने पर जो समय आता है वह भोगांश लम्बन- संस्कृत-अमावस्या का अंतःकाल होता है । इस काल में सूर्य और चन्द्रमा के लम्बनों के अंतर को पूर्वोक्त रीति से फिर निकाले और उपर के लम्बन संस्कृत-अमावस्यान्त काल में जोड़े, घटावे । इससे जो समय आवे उसका फिर लंबन निकाले और इसका भी संस्कार करे । इस प्रकार का असकृत कर्म तब तक करे जब तक कि समय स्थिर न हो जाय अर्थात् जब लम्बन का पुनः पुनः संस्कार करने पर अमावस्यान्त काल वही आवे जो पहले आया था तब यह काम बन्द कर देना चाहिए । ऐसा करने से ग्रहण का मध्यकाल ज्ञात होता है ।

सूर्यग्रहणाधिकार ५०६ विज्ञान भाष्य — असकृत्कर्म से गणना अधिक शुद्ध हो जाती है जैसा पहले बतलाया गया है (देखो पृष्ठ २६६) । जिस समय पूर्व की ओर जाते हुए चन्द्रमा भोगांश सूर्य के भोगांश के समान हो जाता है उसी समय अमावस्या का अंत होता है। इसको गणित सिद्ध अमावश्यान्त कहते हैं। जब सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व की ओर होता है तब चन्द्रमा लंबन के कारण पूर्व की ओर लटक कर अमावस्या के पहले ही सूर्य के सम्मुख हो जाता है इसलिए जितना दोनों का सापेक्ष लंबन होता है उतना ही पहले स्पष्ट अमावस्या का अंत होता है। इसी कारण श्लोक के पूर्वार्ध में गणितसिद्ध अमान्त काल से लंबन घटाने को कहा गया है। इसके प्रतिकूल जब सूर्य त्रिभोन लग्न से पच्छिम होता है तब चन्द्रमा गणितसिद्ध अमावस्यान्त काल में भी सूर्य के सन्मुख नहीं देख पड़ता क्योंकि लंबन के कारण कुछ नीचे पच्छिम की ओर लटक पड़ता है। इसलिए इस समय जितना लंबन होता है उतना ही पीछे स्पष्ट अमावस्यान्त काल होता है इसीलिए यह लंबन जोड़ने से स्पष्ट अमावस्या होती है। दृक्क्षेपश्शीततिग्मांशवोर्मध्यभुक्त्यन्तराहतः । तिथिघ्नत्रिज्यया भक्तो लब्धं साऽवनतिर्भवेत् ॥१०॥ दृक्क्षेपात्सप्ततिहृताद् भवेद्वाऽवनतिः फलम् । अथवा त्रिज्यया भक्ता सप्तसप्तकसङ्गुणा ॥११॥ मध्यज्यादिग्वशात्तस्या दिग्ज्ञेया दक्षिणोत्तरा । दिक्साम्ये सेन्दुविक्षेपयुक्ता विश्लेषितान्यथा ॥१२॥ अनुवाद—(१०) चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक गतियों के अतर को दृक्क्षेप से गुणा करके गुणनफल को पन्द्रह-गुणित-त्रिज्या से भाग दे दो। ऐसा करने से जो लब्धि आवेगी वही अवनति या नति या शरलम्बन है । (११) अथवा दृक्क्षेप को उत्तर से भाग देने पर जो लब्धि आती है वह नति होती है अथवा दृक्क्षेप को ४६ से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से भाग देने पर जो लब्धि आती है वह नति है । (१२) नति मध्यज्या की दिशा के अनुसार उत्तर या दक्षिण दिशा में होती है, अर्थात् यदि मध्यज्या की दिशा खस्वस्तिक से दक्षिण दिशा है तो नति की दिशा भी दक्षिण होगी और यदि मध्य ज्या की दिशा ख-स्वस्तिक से उत्तर है तो नतिकी दिशा उत्तर होगी। यदि चन्द्रमा के शर और नति की दिशायें एक ही हैं तो इनको जोड़ना चाहिये और भिन्न हों तो घटाना चाहिए। ऐसा करने से जो आवे वह नति संस्कृत- चन्द्र-शर या विक्षेप है । विज्ञानभाष्य—१० और ११ श्लोकों का सार यह है । नति = (चन्द्रमा की दैनिक गति-सूर्य की दैनिक गति) x दृक्क्षेप / १५ x त्रिज्या

५१० सूर्य-सिद्धान्त $\frac{दृक्क्षे}{७०} = \frac{दृक्क्षेप\times४६}{त्रिज्या}$ यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि त्रिज्या ३४३८ कला के समान होती है । यदि दृक्क्षेप अर्थात् त्रिभोनलग्न के नतांश की ज्या भारतीय रीति से लिखी जायगी तभी त्रिज्या से भाग देने की आवश्यकता पड़ेगी परन्तु यदि दृक्क्षेप का मान आज- कल की प्रथानुसार दशमलव भिन्न में हो तो ३४३८ की जगह त्रिज्या का मान १ हो जायगा । विप्रश्नाधिकार के पृष्ठ ४०७ में नति का मान यह सिद्ध किया गया है— भु = लि ज्या त्रा कोज्या श—लि कोज्या त्रा ज्या श कोज्या व यहाँ शरलंबन के लिए भु, ग्रह के परम लम्बन के लिए लि, त्रिभोन लग्न के नतांश के लिए त्रा और ग्रह के शर के लिए श तथा विश्लेषांश के लिए व माने गये हैं । सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा का शर अथवा श बहुत कम होता है यदि इसको बहुत छोटा मान लिया जाय तो ज्या श को शून्य और कोज्या श को आजकल की प्रथा के अनुसार १ मानना पड़ेगा । ऐसी दशा में भु = लि ज्या त्रा होगा । अर्थात् परम लंबन को त्रिभोन लग्न के नतांश की ज्या या दृक्क्षेप से गुणा करने पर जो आता है वही नति है । श्लोक १० में यही बात बतलायी गयी है । सूर्यग्रहण के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों की नतियों का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि इन नतियों के अंतर के समान ही चन्द्रमा की सापेक्ष नति होती है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा की गतियों के अंतर से दृक्क्षेप को गुणा करने को कहा गया है । पृष्ठ ४०६ में यह बतलाया गया है कि ग्रह का परम लंबन उसकी दैनिक गति का पन्द्रहवाँ भाग होता है इसलिए चन्द्रमा का सापेक्ष परम लंबन सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का गतियों का पन्द्रहवाँ भाग माना गया है । इस प्रकार दसवें श्लोक की उपपत्ति सिद्ध होती है । अब स्पष्ट है कि इस प्रकार जो नति निकलती है वह स्थूल है । शुद्धता- पूर्वक नति का मान जानने के लिए वह सूत्र काम में लाना चाहिए जो पृष्ठ ४०७ में सिद्ध किया गया है । ११वें श्लोक में नति जानने की जो दूसरी रीतियां बतलायी गयी हैं वह पहली ही रीति के दो रूप हैं । चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक रीतियों का अन्तर = ७६०.६ - ५६'.१ = ७३१.५ । इसलिए इसका १५वां भाग = ४८.७७ = ४६ स्थूल रूप से । यदि इस मान को पहले सूत्र में उत्थापित किया जाय तो

सूर्यग्रहणाधिकार ५११ ४९ × दृक्क्षेप नति = —————— त्रिज्या ४९ × दृक्क्षेप = —————— ३४३८ दृक्क्षेप = —————— ३४३८ —— ४९ दृक्क्षेप = —————— ७० ८/४९ दृक्क्षेप = —————— ७० तथा स्थितिविमर्दार्थग्रासाद्यं च यथोदितम् । प्रमाणं वलनाभीष्टग्रासादि हिमरश्मिवत् ॥१३॥ अनुवाद—(१३) नति संस्कृत चन्द्र शर से चन्द्रग्रहणाधिकार में बतलाई गई रीति के अनुसार स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध, ग्रास, प्रमाण वलन, अभीष्ट ग्रास इत्यादि अर्थात् सम्मीलन, उन्मीलन, मोक्षकाल इत्यादि जानना चाहिए । इससे जो स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध आवेंगे वे मध्यम स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध कहलाते हैं । विज्ञान भाष्य—लंबन और नति की क्रिया के बाद सूर्य ग्रहण की गणना उसी प्रकार की जाती है जिस प्रकार चन्द्र ग्रहण की गणना बतलाई गयी है । क्योंकि जैसे चन्द्र ग्रहण में भूछाया छादक और चन्द्रमा छाद्य होता है, वैसे ही सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा छादक और सूर्य छाद्य होता है । छाद्य और छादक का जैसा सम्बन्ध चन्द्र ग्रहण में भी होता है । स्थित्यर्धोनाधिकात्प्राग्वत्स्थित्यन्ताल्लम्बनं पुनः । ग्रासमोक्षोद्भवं साध्यं तन्मध्यहरिजान्तरम् ॥१४॥ प्राक्कपालेऽधिकं मध्याद् भवेत् प्राग्ग्रहणं यदि । मौक्षिकं लम्बनं हीन पश्चार्धे तु विपर्ययात् ॥१५॥ तदा मोक्षस्थितिद्ले देयं प्राग्ग्रहणे तथा । हरिजान्तरजं शोध्यं यन्नैतत्स्याद्विपर्ययात् ॥१६॥ एतदुक्तं कपालैक्ये दिग्भेदे लम्बनेकताः स्वे स्वे स्थितिदले योज्या विमर्दार्धेपि चोक्तवत् ॥१७॥ अनुवाद—(१४) श्लोक ६ के अनुसार असकृत्कर्म से जो अमावस्यान्तकाल आवे उसमें १३वें श्लोक के अनुसार जो स्थित्यर्ध आवे उसको घटाकर स्पर्शकाल और जोड़कर मोक्षकाल जाने । फिर स्पर्शकाल और मोक्षकाल के भोगांश लम्बन जानकर ग्रहण के मध्यकाल के भोगांश लंबन से अन्तर निकाले ।

५१२. सूर्य-सिद्धान्त (१५) यदि ग्रहण पूर्व कपाल में हो अर्थात् यदि ग्रहण काल में सूर्य का भोगांश त्रिभोन लग्न के भोगांश से अधिक हो तो स्पर्शकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से अधिक होगा और मोक्षकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से कम होगा । परन्तु यदि ग्रहण पच्छिम कपाल में हो अर्थात् ग्रहण काल में सूर्य का भोगांश त्रिभोन लग्न के भोगांश से कम हो तो लंबन का परिमाण उलटे क्रम से होगा अर्थात् स्पर्श- काल का लंबन मध्यकाल के लंबन से कम होगा और मोक्षकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से अधिक होगा। (१६) दोनों दशाओं में अर्थात् चाहे स्पर्श और मोक्ष पूर्व कपाल में हो चाहे पच्छिम कपाल में, १४वें श्लोक के अनुसार निकाले हुए लंबनों के अन्तर को मोक्ष- स्थित्यर्थ और स्पर्श-स्थित्यर्थ में जोड़कर स्पष्ट स्थित्यर्थ जानना चाहिये । परन्तु यदि १५वें श्लोक में कहे हुए नियम के विपरीत दशा हो अर्थात् यदि पूर्वकपाल में स्पर्श- कालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से कम हो और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक हो अथवा पश्चिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक हो और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से कम हो तो १४वें श्लोक के अनुसार प्राप्त अन्तर को स्पर्श या मोक्ष स्थित्यर्थ से घटाना चाहिये तब स्पष्ट स्थित्यर्थ आता है । (१७) जब स्पर्श, मध्य और मोक्ष तीनों एक ही कपाल में हों तभी उपर्युक्त लंबनों का अन्तर निकल कर उपर्युक्त क्रिया करनी चाहिए । यदि स्पर्श एक कपाल में हो और मध्य दूसरे कपाल में अथवा मध्य एक कपाल में हो और मोक्ष दूसरे कपाल में तब स्पर्श और मध्यकाल के लंबनों को अथवा मध्य और मोक्ष काल के लंबनों को जोड़कर अपने-अपने स्थित्यर्थ से जोड़ देना चाहिए । इसी प्रकार स्पष्ट स्थित्यर्थ विमर्दार्ध भी जानना चाहिये । विज्ञान भाष्य—यह स्पष्ट है कि ६वें श्लोक के अनुसार आए हुए अमावस्यान्तकाल में अथवा ग्रहण के मध्यकाल में सूर्य और चन्द्रमा के जो लंबन आते हैं वे स्पर्शकाल और मोक्षकाल के लंबन से भिन्न होते हैं क्योंकि स्पर्श और मोक्ष के समय सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा की सतत गति के कारण इनके गतांश भिन्न होते हैं और विप्रश्नाधिकार में दिखलाया गया है कि लंबन नतांश पर निर्भर होता है अर्थात् यदि नतांश अधिक हो तो लंबन भी अधिक होता है और नतांश कम हो तो लंबन भी कम होता है (पृष्ठ ३८३) । इसलिये १४वें श्लोक में स्पर्शकाल और मोक्ष- काल के लंबन जानने की आवश्यकता बतलायी गयी है और मध्यकाल के लंबन से अन्तर जानने को बतलाया गया है। यदि स्पर्श और मोक्ष दोनों पूर्वकपाल में हों अर्थात् त्रिलोभन लग्न पर आने के पहले ही ग्रहण का स्पर्श और मोक्ष हो जाय तो

सूर्यग्रहणाधिकार ५१३ यह स्पष्ट है कि स्पर्श के समय सूर्य या चन्द्रमा का नतांश मध्यकाल के सूर्य या चन्द्रमा के नतांश से अधिक होगा और मोक्ष के शमय कम होगा क्योंकि त्रिलोभन- लग्न ही क्षितिज के ऊपर क्रान्तिवृत्त का सबसे ऊँचा विन्दु है और सूर्य चन्द्रमा उदय होने पर क्रमशः ऊपर उठते जाते हैं अर्थात् इनका नतांश कम होता जाता है इसलिये स्पर्शकाल का नतांश मध्यकाल के नतांश से अधिक और मोक्षकाल का नतांश मध्य- काल के नतांश से कम होता है। परन्तु यदि .स्पर्श और मोक्ष दोनों पच्छिम कपाल में हो तो स्पर्श के समय सूर्य का नतांश मध्यमकालीन नतांश से कम होगा और मोक्ष कालीन नतांश मध्यमकालीन नतांश से अधिक होगा क्योंकि पच्छिम कपाल में सूर्य या चन्द्रमा नीचे उतरते जाते हैं इसलिये इनका नतांश बढ़ता जाता है। स्पर्श काल और मध्यकाल लंबनों का जो अन्तर होता है उसको पूर्व कपाल के मध्यम स्थित्यर्ध में जोड़ने से स्पष्ट स्पर्श स्थित्यर्ध आता है क्योंकि पहिले जो स्थित्यर्ध निकाला जाता है वह मध्य काल के लंबन के अनुसार होता है परन्तु स्पर्श काल में लंबन कुछ अधिक होता है इसलिये इसके कारण चन्द्रमा के कुछ और नीचे अर्थात् पूर्व की ओर लटक पड़ने से स्पर्श कुछ और पहले देख पड़ता है अर्थात् स्थित्यर्ध का मान बढ़ जाता है। परन्तु मध्य काल की अपेक्षा मोक्षकाल में (पूर्व कपाल में होने के कारण) लंबन कम रहता है इसलिए इन दोनों में जो अन्तर होता है उसको भी मध्यम स्थित्यर्ध में जोड़ने से मोक्षकालीन स्पष्ट स्थित्यर्ध आता है क्योंकि जब मोक्षकालीन लंबन कम होता है तब चन्द्रमा पूर्व की ओर उतना नहीं लटकता जितना मध्य काल में लटकता है इसलिए सूर्य के सम्मुख देर तक रहता है और मोक्षकालिक स्थित्यर्ध भी बढ़ जाता है। पच्छिम कपाल में लंबन के कारण चन्द्रमा पच्छिम की ओर लटक पड़ता है जिससे उसको सूर्य के सम्मुख आने में कुछ विलम्ब हो जाता है क्योंकि चन्द्रमा की गति सदैव पूर्व पूर्व की ओर होती है और लंबन के कारण जान पड़ता है मानों वह पच्छिम की ओर भी जा रहा है। इसी कारण ग्रहण का मध्यकाल गणितसिद्ध अमावश्यान्त काल से कुछ पीछे होता है। परन्तु चन्द्रमा का स्पर्शकालिक नतांश मध्यकालिक नतांश से कम होता है क्योंकि जिस समय ग्रहण का स्पर्श होता है उससे कुछ देर पीछे ग्रहण का मध्य होता है और इतनी देर में पृथिवी की दैनिक गति के कारण अथवा प्राचीनो के मत से प्रवाह वायु की गति के कारण सूर्प चन्द्रमा सभी नीचे हो जाते हैं। इसलिए पच्छिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से नतांश के कम होने के कारण कम होता है जिसका प्रभाव यह होता है जिसका प्रभाव यह होता है कि ग्रहण के स्पर्श करने में उतना विलम्ब नहीं लगता जितना ग्रहण के मध्यकाल में विलम्ब लगता है अर्थात् स्पर्श के समय लंबन के कम होने से

५१४ सूर्य-सिद्धान्त स्पष्ट स्पर्श स्थित्यर्ध बढ़ जाता है। इसी प्रकार मोक्ष के समय चन्द्रमा का नतांश मध्यकालिक नतांश से अधिक हो जाने के कारण मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि चन्द्रमा देर तक सूर्य के सम्मुख रहता है क्योंकि मोक्ष के समय चन्द्रमा सूर्य से ऊपर देख पड़ता है परन्तु अधिक लंबन के कारण यह ऊपर न जाकर नीचे ही लटका रहता है जिससे मोक्षकाल में भी कुछ विलम्ब हो जाता है अर्थात् स्पष्ट मोक्ष स्थित्यर्ध भी बढ़ जाता है। इस प्रकार यह सिद्ध है कि चाहे स्पर्श और मोक्ष दोनों पूर्व कपाल में हों चाहे स्पर्श और मोक्ष दोनों पच्छिम कपाल में हों, प्रत्येक दशा में ग्रहण का समय कुछ बढ़ जाता है अर्थात् स्पर्श कुछ पहले और मोक्ष कुछ देर में होता है। इसलिए स्पर्श और मध्यकाल तथा मध्य और मोक्षकाल के लंबनों में जो अन्तर होता है उसको मध्यम में जोड़ने से स्पष्ट स्थित्यर्ध ज्ञात होता है। स्पर्शकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध को ग्रहण के मध्यकाल में घटाने से प्रत्यक्ष स्पर्श काल तथा मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध को ग्रहण के मध्यमकाल में जोड़ने से प्रत्यक्ष मोक्षकाल होता है। यहाँ तक तो १६ वें श्लोक के पूर्वार्ध को व्याख्या हुई। इसके उत्तरार्ध का अर्थ समझ में नहीं आता क्योंकि इसमें जिस दशा की गई है वह प्रकृति के विरुद्ध है। पूर्व कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव अधिक रहेगा क्योंकि स्पर्शकालिक नतांश मध्यकालिक नतांश से सदैव अधिक होता है और इसी तर्क से मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव कम रहता है। इसी प्रकार पच्छिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव कम रहेगा और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक'लंबन से सदैव अधिक रहता है। हाँ, यदि ग्रस्तोद्य या ग्रस्तास्त ग्रहण हो तो और बात है। परन्तु ऐसी दशा में विशेष रीति से गणना करनी पड़ेगी और किसी स्थान के लिए केवल यह जानना आवश्यक होगा कि ग्रस्तोद्य ग्रहण में मोक्ष कब होता है। पहली दशा में यही विचारना होगा कि सूर्योदय के समय सूर्य का कितना भाग ग्रस्त रहता है और यह ग्रस्त भाग कितनी देर में निकल के बाहर हो जायगा। इस क्रिया के लिए चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १८, १६, और २० की सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरी दशा में अर्थात् ग्रस्तास्त ग्रहण में यह विचारना होगा कि सूर्यास्त के समय सूर्य का कितना भाग ग्रस्त रहता है और इसके कितने पहले ग्रहण का स्पर्श हुआ। इस क्रिया के लिए भी उन्हीं श्लोकों की सहायता लेनी पड़ेगी। अब तक जो कुछ कहा गया है वह उस दशा के लिये है जब स्पर्श और मोक्ष एक कला में हों। यदि स्पर्श एक कपाल में हो और मध्य दूसरे कपाल में अथवा मध्य एक कपाल में हो और मोक्ष दूसरे कपाल में तब स्पर्श और मध्य काल के लग्नों को