भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 535

५१० सूर्य-सिद्धान्त $\frac{दृक्क्षे}{७०} = \frac{दृक्क्षेप\times४६}{त्रिज्या}$ यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि त्रिज्या ३४३८ कला के समान होती है । यदि दृक्क्षेप अर्थात् त्रिभोनलग्न के नतांश की ज्या भारतीय रीति से लिखी जायगी तभी त्रिज्या से भाग देने की आवश्यकता पड़ेगी परन्तु यदि दृक्क्षेप का मान आज- कल की प्रथानुसार दशमलव भिन्न में हो तो ३४३८ की जगह त्रिज्या का मान १ हो जायगा । विप्रश्नाधिकार के पृष्ठ ४०७ में नति का मान यह सिद्ध किया गया है— भु = लि ज्या त्रा कोज्या श—लि कोज्या त्रा ज्या श कोज्या व यहाँ शरलंबन के लिए भु, ग्रह के परम लम्बन के लिए लि, त्रिभोन लग्न के नतांश के लिए त्रा और ग्रह के शर के लिए श तथा विश्लेषांश के लिए व माने गये हैं । सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा का शर अथवा श बहुत कम होता है यदि इसको बहुत छोटा मान लिया जाय तो ज्या श को शून्य और कोज्या श को आजकल की प्रथा के अनुसार १ मानना पड़ेगा । ऐसी दशा में भु = लि ज्या त्रा होगा । अर्थात् परम लंबन को त्रिभोन लग्न के नतांश की ज्या या दृक्क्षेप से गुणा करने पर जो आता है वही नति है । श्लोक १० में यही बात बतलायी गयी है । सूर्यग्रहण के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों की नतियों का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि इन नतियों के अंतर के समान ही चन्द्रमा की सापेक्ष नति होती है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा की गतियों के अंतर से दृक्क्षेप को गुणा करने को कहा गया है । पृष्ठ ४०६ में यह बतलाया गया है कि ग्रह का परम लंबन उसकी दैनिक गति का पन्द्रहवाँ भाग होता है इसलिए चन्द्रमा का सापेक्ष परम लंबन सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का गतियों का पन्द्रहवाँ भाग माना गया है । इस प्रकार दसवें श्लोक की उपपत्ति सिद्ध होती है । अब स्पष्ट है कि इस प्रकार जो नति निकलती है वह स्थूल है । शुद्धता- पूर्वक नति का मान जानने के लिए वह सूत्र काम में लाना चाहिए जो पृष्ठ ४०७ में सिद्ध किया गया है । ११वें श्लोक में नति जानने की जो दूसरी रीतियां बतलायी गयी हैं वह पहली ही रीति के दो रूप हैं । चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक रीतियों का अन्तर = ७६०.६ - ५६'.१ = ७३१.५ । इसलिए इसका १५वां भाग = ४८.७७ = ४६ स्थूल रूप से । यदि इस मान को पहले सूत्र में उत्थापित किया जाय तो