भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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सूर्यग्रहणाधिकार ५११ ४९ × दृक्क्षेप नति = —————— त्रिज्या ४९ × दृक्क्षेप = —————— ३४३८ दृक्क्षेप = —————— ३४३८ —— ४९ दृक्क्षेप = —————— ७० ८/४९ दृक्क्षेप = —————— ७० तथा स्थितिविमर्दार्थग्रासाद्यं च यथोदितम् । प्रमाणं वलनाभीष्टग्रासादि हिमरश्मिवत् ॥१३॥ अनुवाद—(१३) नति संस्कृत चन्द्र शर से चन्द्रग्रहणाधिकार में बतलाई गई रीति के अनुसार स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध, ग्रास, प्रमाण वलन, अभीष्ट ग्रास इत्यादि अर्थात् सम्मीलन, उन्मीलन, मोक्षकाल इत्यादि जानना चाहिए । इससे जो स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध आवेंगे वे मध्यम स्थित्यर्ध, विमर्दार्ध कहलाते हैं । विज्ञान भाष्य—लंबन और नति की क्रिया के बाद सूर्य ग्रहण की गणना उसी प्रकार की जाती है जिस प्रकार चन्द्र ग्रहण की गणना बतलाई गयी है । क्योंकि जैसे चन्द्र ग्रहण में भूछाया छादक और चन्द्रमा छाद्य होता है, वैसे ही सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा छादक और सूर्य छाद्य होता है । छाद्य और छादक का जैसा सम्बन्ध चन्द्र ग्रहण में भी होता है । स्थित्यर्धोनाधिकात्प्राग्वत्स्थित्यन्ताल्लम्बनं पुनः । ग्रासमोक्षोद्भवं साध्यं तन्मध्यहरिजान्तरम् ॥१४॥ प्राक्कपालेऽधिकं मध्याद् भवेत् प्राग्ग्रहणं यदि । मौक्षिकं लम्बनं हीन पश्चार्धे तु विपर्ययात् ॥१५॥ तदा मोक्षस्थितिद्ले देयं प्राग्ग्रहणे तथा । हरिजान्तरजं शोध्यं यन्नैतत्स्याद्विपर्ययात् ॥१६॥ एतदुक्तं कपालैक्ये दिग्भेदे लम्बनेकताः स्वे स्वे स्थितिदले योज्या विमर्दार्धेपि चोक्तवत् ॥१७॥ अनुवाद—(१४) श्लोक ६ के अनुसार असकृत्कर्म से जो अमावस्यान्तकाल आवे उसमें १३वें श्लोक के अनुसार जो स्थित्यर्ध आवे उसको घटाकर स्पर्शकाल और जोड़कर मोक्षकाल जाने । फिर स्पर्शकाल और मोक्षकाल के भोगांश लम्बन जानकर ग्रहण के मध्यकाल के भोगांश लंबन से अन्तर निकाले ।