भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 537

५१२. सूर्य-सिद्धान्त (१५) यदि ग्रहण पूर्व कपाल में हो अर्थात् यदि ग्रहण काल में सूर्य का भोगांश त्रिभोन लग्न के भोगांश से अधिक हो तो स्पर्शकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से अधिक होगा और मोक्षकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से कम होगा । परन्तु यदि ग्रहण पच्छिम कपाल में हो अर्थात् ग्रहण काल में सूर्य का भोगांश त्रिभोन लग्न के भोगांश से कम हो तो लंबन का परिमाण उलटे क्रम से होगा अर्थात् स्पर्श- काल का लंबन मध्यकाल के लंबन से कम होगा और मोक्षकाल का लंबन मध्यकाल के लंबन से अधिक होगा। (१६) दोनों दशाओं में अर्थात् चाहे स्पर्श और मोक्ष पूर्व कपाल में हो चाहे पच्छिम कपाल में, १४वें श्लोक के अनुसार निकाले हुए लंबनों के अन्तर को मोक्ष- स्थित्यर्थ और स्पर्श-स्थित्यर्थ में जोड़कर स्पष्ट स्थित्यर्थ जानना चाहिये । परन्तु यदि १५वें श्लोक में कहे हुए नियम के विपरीत दशा हो अर्थात् यदि पूर्वकपाल में स्पर्श- कालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से कम हो और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक हो अथवा पश्चिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक हो और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से कम हो तो १४वें श्लोक के अनुसार प्राप्त अन्तर को स्पर्श या मोक्ष स्थित्यर्थ से घटाना चाहिये तब स्पष्ट स्थित्यर्थ आता है । (१७) जब स्पर्श, मध्य और मोक्ष तीनों एक ही कपाल में हों तभी उपर्युक्त लंबनों का अन्तर निकल कर उपर्युक्त क्रिया करनी चाहिए । यदि स्पर्श एक कपाल में हो और मध्य दूसरे कपाल में अथवा मध्य एक कपाल में हो और मोक्ष दूसरे कपाल में तब स्पर्श और मध्यकाल के लंबनों को अथवा मध्य और मोक्ष काल के लंबनों को जोड़कर अपने-अपने स्थित्यर्थ से जोड़ देना चाहिए । इसी प्रकार स्पष्ट स्थित्यर्थ विमर्दार्ध भी जानना चाहिये । विज्ञान भाष्य—यह स्पष्ट है कि ६वें श्लोक के अनुसार आए हुए अमावस्यान्तकाल में अथवा ग्रहण के मध्यकाल में सूर्य और चन्द्रमा के जो लंबन आते हैं वे स्पर्शकाल और मोक्षकाल के लंबन से भिन्न होते हैं क्योंकि स्पर्श और मोक्ष के समय सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा की सतत गति के कारण इनके गतांश भिन्न होते हैं और विप्रश्नाधिकार में दिखलाया गया है कि लंबन नतांश पर निर्भर होता है अर्थात् यदि नतांश अधिक हो तो लंबन भी अधिक होता है और नतांश कम हो तो लंबन भी कम होता है (पृष्ठ ३८३) । इसलिये १४वें श्लोक में स्पर्शकाल और मोक्ष- काल के लंबन जानने की आवश्यकता बतलायी गयी है और मध्यकाल के लंबन से अन्तर जानने को बतलाया गया है। यदि स्पर्श और मोक्ष दोनों पूर्वकपाल में हों अर्थात् त्रिलोभन लग्न पर आने के पहले ही ग्रहण का स्पर्श और मोक्ष हो जाय तो