भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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सूर्यग्रहणाधिकार ५१३ यह स्पष्ट है कि स्पर्श के समय सूर्य या चन्द्रमा का नतांश मध्यकाल के सूर्य या चन्द्रमा के नतांश से अधिक होगा और मोक्ष के शमय कम होगा क्योंकि त्रिलोभन- लग्न ही क्षितिज के ऊपर क्रान्तिवृत्त का सबसे ऊँचा विन्दु है और सूर्य चन्द्रमा उदय होने पर क्रमशः ऊपर उठते जाते हैं अर्थात् इनका नतांश कम होता जाता है इसलिये स्पर्शकाल का नतांश मध्यकाल के नतांश से अधिक और मोक्षकाल का नतांश मध्य- काल के नतांश से कम होता है। परन्तु यदि .स्पर्श और मोक्ष दोनों पच्छिम कपाल में हो तो स्पर्श के समय सूर्य का नतांश मध्यमकालीन नतांश से कम होगा और मोक्ष कालीन नतांश मध्यमकालीन नतांश से अधिक होगा क्योंकि पच्छिम कपाल में सूर्य या चन्द्रमा नीचे उतरते जाते हैं इसलिये इनका नतांश बढ़ता जाता है। स्पर्श काल और मध्यकाल लंबनों का जो अन्तर होता है उसको पूर्व कपाल के मध्यम स्थित्यर्ध में जोड़ने से स्पष्ट स्पर्श स्थित्यर्ध आता है क्योंकि पहिले जो स्थित्यर्ध निकाला जाता है वह मध्य काल के लंबन के अनुसार होता है परन्तु स्पर्श काल में लंबन कुछ अधिक होता है इसलिये इसके कारण चन्द्रमा के कुछ और नीचे अर्थात् पूर्व की ओर लटक पड़ने से स्पर्श कुछ और पहले देख पड़ता है अर्थात् स्थित्यर्ध का मान बढ़ जाता है। परन्तु मध्य काल की अपेक्षा मोक्षकाल में (पूर्व कपाल में होने के कारण) लंबन कम रहता है इसलिए इन दोनों में जो अन्तर होता है उसको भी मध्यम स्थित्यर्ध में जोड़ने से मोक्षकालीन स्पष्ट स्थित्यर्ध आता है क्योंकि जब मोक्षकालीन लंबन कम होता है तब चन्द्रमा पूर्व की ओर उतना नहीं लटकता जितना मध्य काल में लटकता है इसलिए सूर्य के सम्मुख देर तक रहता है और मोक्षकालिक स्थित्यर्ध भी बढ़ जाता है। पच्छिम कपाल में लंबन के कारण चन्द्रमा पच्छिम की ओर लटक पड़ता है जिससे उसको सूर्य के सम्मुख आने में कुछ विलम्ब हो जाता है क्योंकि चन्द्रमा की गति सदैव पूर्व पूर्व की ओर होती है और लंबन के कारण जान पड़ता है मानों वह पच्छिम की ओर भी जा रहा है। इसी कारण ग्रहण का मध्यकाल गणितसिद्ध अमावश्यान्त काल से कुछ पीछे होता है। परन्तु चन्द्रमा का स्पर्शकालिक नतांश मध्यकालिक नतांश से कम होता है क्योंकि जिस समय ग्रहण का स्पर्श होता है उससे कुछ देर पीछे ग्रहण का मध्य होता है और इतनी देर में पृथिवी की दैनिक गति के कारण अथवा प्राचीनो के मत से प्रवाह वायु की गति के कारण सूर्प चन्द्रमा सभी नीचे हो जाते हैं। इसलिए पच्छिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से नतांश के कम होने के कारण कम होता है जिसका प्रभाव यह होता है जिसका प्रभाव यह होता है कि ग्रहण के स्पर्श करने में उतना विलम्ब नहीं लगता जितना ग्रहण के मध्यकाल में विलम्ब लगता है अर्थात् स्पर्श के समय लंबन के कम होने से