भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५१४ सूर्य-सिद्धान्त स्पष्ट स्पर्श स्थित्यर्ध बढ़ जाता है। इसी प्रकार मोक्ष के समय चन्द्रमा का नतांश मध्यकालिक नतांश से अधिक हो जाने के कारण मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से अधिक होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि चन्द्रमा देर तक सूर्य के सम्मुख रहता है क्योंकि मोक्ष के समय चन्द्रमा सूर्य से ऊपर देख पड़ता है परन्तु अधिक लंबन के कारण यह ऊपर न जाकर नीचे ही लटका रहता है जिससे मोक्षकाल में भी कुछ विलम्ब हो जाता है अर्थात् स्पष्ट मोक्ष स्थित्यर्ध भी बढ़ जाता है। इस प्रकार यह सिद्ध है कि चाहे स्पर्श और मोक्ष दोनों पूर्व कपाल में हों चाहे स्पर्श और मोक्ष दोनों पच्छिम कपाल में हों, प्रत्येक दशा में ग्रहण का समय कुछ बढ़ जाता है अर्थात् स्पर्श कुछ पहले और मोक्ष कुछ देर में होता है। इसलिए स्पर्श और मध्यकाल तथा मध्य और मोक्षकाल के लंबनों में जो अन्तर होता है उसको मध्यम में जोड़ने से स्पष्ट स्थित्यर्ध ज्ञात होता है। स्पर्शकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध को ग्रहण के मध्यकाल में घटाने से प्रत्यक्ष स्पर्श काल तथा मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध को ग्रहण के मध्यमकाल में जोड़ने से प्रत्यक्ष मोक्षकाल होता है। यहाँ तक तो १६ वें श्लोक के पूर्वार्ध को व्याख्या हुई। इसके उत्तरार्ध का अर्थ समझ में नहीं आता क्योंकि इसमें जिस दशा की गई है वह प्रकृति के विरुद्ध है। पूर्व कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव अधिक रहेगा क्योंकि स्पर्शकालिक नतांश मध्यकालिक नतांश से सदैव अधिक होता है और इसी तर्क से मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव कम रहता है। इसी प्रकार पच्छिम कपाल में स्पर्शकालिक लंबन मध्यकालिक लंबन से सदैव कम रहेगा और मोक्षकालिक लंबन मध्यकालिक'लंबन से सदैव अधिक रहता है। हाँ, यदि ग्रस्तोद्य या ग्रस्तास्त ग्रहण हो तो और बात है। परन्तु ऐसी दशा में विशेष रीति से गणना करनी पड़ेगी और किसी स्थान के लिए केवल यह जानना आवश्यक होगा कि ग्रस्तोद्य ग्रहण में मोक्ष कब होता है। पहली दशा में यही विचारना होगा कि सूर्योदय के समय सूर्य का कितना भाग ग्रस्त रहता है और यह ग्रस्त भाग कितनी देर में निकल के बाहर हो जायगा। इस क्रिया के लिए चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १८, १६, और २० की सहायता लेनी पड़ेगी। दूसरी दशा में अर्थात् ग्रस्तास्त ग्रहण में यह विचारना होगा कि सूर्यास्त के समय सूर्य का कितना भाग ग्रस्त रहता है और इसके कितने पहले ग्रहण का स्पर्श हुआ। इस क्रिया के लिए भी उन्हीं श्लोकों की सहायता लेनी पड़ेगी। अब तक जो कुछ कहा गया है वह उस दशा के लिये है जब स्पर्श और मोक्ष एक कला में हों। यदि स्पर्श एक कपाल में हो और मध्य दूसरे कपाल में अथवा मध्य एक कपाल में हो और मोक्ष दूसरे कपाल में तब स्पर्श और मध्य काल के लग्नों को