भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 534

सूर्यग्रहणाधिकार ५०६ विज्ञान भाष्य — असकृत्कर्म से गणना अधिक शुद्ध हो जाती है जैसा पहले बतलाया गया है (देखो पृष्ठ २६६) । जिस समय पूर्व की ओर जाते हुए चन्द्रमा भोगांश सूर्य के भोगांश के समान हो जाता है उसी समय अमावस्या का अंत होता है। इसको गणित सिद्ध अमावश्यान्त कहते हैं। जब सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व की ओर होता है तब चन्द्रमा लंबन के कारण पूर्व की ओर लटक कर अमावस्या के पहले ही सूर्य के सम्मुख हो जाता है इसलिए जितना दोनों का सापेक्ष लंबन होता है उतना ही पहले स्पष्ट अमावस्या का अंत होता है। इसी कारण श्लोक के पूर्वार्ध में गणितसिद्ध अमान्त काल से लंबन घटाने को कहा गया है। इसके प्रतिकूल जब सूर्य त्रिभोन लग्न से पच्छिम होता है तब चन्द्रमा गणितसिद्ध अमावस्यान्त काल में भी सूर्य के सन्मुख नहीं देख पड़ता क्योंकि लंबन के कारण कुछ नीचे पच्छिम की ओर लटक पड़ता है। इसलिए इस समय जितना लंबन होता है उतना ही पीछे स्पष्ट अमावस्यान्त काल होता है इसीलिए यह लंबन जोड़ने से स्पष्ट अमावस्या होती है। दृक्क्षेपश्शीततिग्मांशवोर्मध्यभुक्त्यन्तराहतः । तिथिघ्नत्रिज्यया भक्तो लब्धं साऽवनतिर्भवेत् ॥१०॥ दृक्क्षेपात्सप्ततिहृताद् भवेद्वाऽवनतिः फलम् । अथवा त्रिज्यया भक्ता सप्तसप्तकसङ्गुणा ॥११॥ मध्यज्यादिग्वशात्तस्या दिग्ज्ञेया दक्षिणोत्तरा । दिक्साम्ये सेन्दुविक्षेपयुक्ता विश्लेषितान्यथा ॥१२॥ अनुवाद—(१०) चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक गतियों के अतर को दृक्क्षेप से गुणा करके गुणनफल को पन्द्रह-गुणित-त्रिज्या से भाग दे दो। ऐसा करने से जो लब्धि आवेगी वही अवनति या नति या शरलम्बन है । (११) अथवा दृक्क्षेप को उत्तर से भाग देने पर जो लब्धि आती है वह नति होती है अथवा दृक्क्षेप को ४६ से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से भाग देने पर जो लब्धि आती है वह नति है । (१२) नति मध्यज्या की दिशा के अनुसार उत्तर या दक्षिण दिशा में होती है, अर्थात् यदि मध्यज्या की दिशा खस्वस्तिक से दक्षिण दिशा है तो नति की दिशा भी दक्षिण होगी और यदि मध्य ज्या की दिशा ख-स्वस्तिक से उत्तर है तो नतिकी दिशा उत्तर होगी। यदि चन्द्रमा के शर और नति की दिशायें एक ही हैं तो इनको जोड़ना चाहिये और भिन्न हों तो घटाना चाहिए। ऐसा करने से जो आवे वह नति संस्कृत- चन्द्र-शर या विक्षेप है । विज्ञानभाष्य—१० और ११ श्लोकों का सार यह है । नति = (चन्द्रमा की दैनिक गति-सूर्य की दैनिक गति) x दृक्क्षेप / १५ x त्रिज्या