सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ सूर्य-सिद्धान्त मध्यलग्नार्कविश्लेषज्या छेदेन विभाजिता । रवोन्दोर्लम्बनं ज्ञेयं प्राक्पश्चाद्घटिकादिकम् ॥८॥ अनुवाद—(७) स्थूल रूप से दशम लग्न के नतांश की ज्या को दृक्क्षेप और कोटिज्या को दृग्गति कह सकते हैं । एक राशि की ज्या के वर्ग को दृग्गति रूपी जीवों से भाग देने पर जो आता है उसे छेद कहते हैं । (८) त्रिभोन लग्न से सूर्य जितना दूर रहता है उसे विश्लेष या विश्लेषांश कहते हैं । इसकी ज्या को छेद से भाग देने पर सूर्य या चन्द्रमा का पूर्व या पश्चिम लंबन घड़ियों में आ जाता है । यदि सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व है तो पूर्व लंबन और पश्चिम है तो पश्चिम लंबन होता है । विज्ञानभाष्य—दृक्क्षेप और दृग्गति के शुद्ध रूप तो वही हैं जो ६वें श्लोक में बतलाये गये हैं । परन्तु उनके जानने की रीति लम्बी है इसलिये ७वें श्लोक के पूर्वार्ध में छोटी रीति बतलायी गयी है जो स्थूल है। इस छोटी रीति में मध्यलग्न के नतांश को ही त्रिभोन लग्न का नतांश मान लिया गया है क्योंकि इन दोनों में बहुत कम अंतर रहता है । परन्तु इससे स्थूलता अवश्य आ जाती है । छेद और विश्लेषांश से सूर्य और चन्द्रमा का भोगांश लंबन आनन की जो रीति यहाँ बतलायी गयी है उसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ४१३ और पृष्ठ ४०५-४०६ में बतलायी गई है । मध्यलग्नाधिके भानौ तिथ्यन्तात्प्रविशोधयेत् । धनमूनेऽसकृत्कर्म यावत्सर्वं स्थिरीभवेत् ॥६॥ अनुवाद—(६) त्रिभोनलग्न के भोगांश से सूर्य का भोगांश अधिक हो तो सूर्य त्रिभोन लग्न से पूर्व रहता है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लंबनों के अंतर को अमावस्या के अंतकाल से घटाना चाहिए । परन्तु यदि त्रिभोनलग्न के भोगांश से सूर्य का भोगांश कम हो तो सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लंबों के अंतर को आमावस्या के अंतकाल में जोड़ना चाहिए । अमावस्या के अंतकाल में भोगांश लम्बन का इस प्रकार संस्कार करने पर जो समय आता है वह भोगांश लम्बन- संस्कृत-अमावस्या का अंतःकाल होता है । इस काल में सूर्य और चन्द्रमा के लम्बनों के अंतर को पूर्वोक्त रीति से फिर निकाले और उपर के लम्बन संस्कृत-अमावस्यान्त काल में जोड़े, घटावे । इससे जो समय आवे उसका फिर लंबन निकाले और इसका भी संस्कार करे । इस प्रकार का असकृत कर्म तब तक करे जब तक कि समय स्थिर न हो जाय अर्थात् जब लम्बन का पुनः पुनः संस्कार करने पर अमावस्यान्त काल वही आवे जो पहले आया था तब यह काम बन्द कर देना चाहिए । ऐसा करने से ग्रहण का मध्यकाल ज्ञात होता है ।