भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 838 में से

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पृष्ठ 532

सूर्यग्रहणाधिकार ५०७ अनुवाद—(२) पहले श्लोक में बतलायी गई स्थिति से भिन्न दशा में देश कालानुसार जैसी नति होती है और जब सूर्य वितिभ लग्न से पूर्व वा पश्चिम होता है तब उसमें जैसा भोगांश-लंबन होता है उसकी चर्चा यहाँ की जाती है । लग्नं पर्वान्तनाडीभिः कुर्यात्स्वैदयासुभिः । तज्ज्याऽन्त्यापक्रमज्याघ्ना लम्बज्याप्तोदयाभिधा ॥३॥ तथा लङ्‌कोदयैर्लग्नं मध्यसंज्ञं यथोदितम् । तत्कान्त्यक्षांशसंयोगो दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ॥४॥ शेषं नतांशास्तन्मौर्वी मध्यज्या साऽभिधीयते । मध्योदयज्याऽभ्यस्ता त्रिज्याप्ता वर्गितं फलम् ॥५॥ मध्यज्यावर्गंतः प्रोज्झ्य दृक्क्षेपः शेषतः पदम् । तत्रिज्यावर्गविश्लेषान्मूलं शङ्‌कुस्स दृग्गतिः ॥६॥ अनुवाद—(३) पर्वान्तकाल अर्थात् अमावस्या के अंतकाल का खण्ड इष्ट स्थान के (राशि के) उदयासुओं से जान कर उसकी ज्या को परमक्रान्ति ज्या से गुणा करके गुणनफल को इष्ट स्थान की लम्ब ज्या या अक्षांश-कोटिज्या से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे उदय या उदयज्या कहते हैं । (४) पर्वान्त काल में लङ्का के उदयासुओं से पहले कहे हुए के अनुसार मध्यलग्न अथवा दशम लग्न जानकर उसकी क्रान्ति को इष्ट स्थान के अक्षांश में जोड़ दे यदि दोनों की दिशायें एक ही हों । यदि दिशाएँ भिन्न हों तो क्रान्ति और अक्षांश का अन्तर निकाले । (५) जोड़ने या घटाने से जो कुछ आवे वही मध्य लग्न का नतांश है । इसी की ज्या को मध्य ज्या कहते हैं । मध्यज्या को उदयज्या से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से भाग दे और लब्धि का वर्ग करे । (६) और वर्गफल को मध्य ज्या के वर्ष से घटा और शेष का वर्गमूल निकाले । वर्गमूल निकालने को जो आता है वही दृक्क्षेप कहलाता है । दृक्क्षेप के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटा कर वर्गमूल निकालने से जो आता है वही शंकु या दृग्गति है । विज्ञानभाष्य—इन चार श्लोकों में जो क्रिया बतलायी गई है उसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ ४११-४१३ में अच्छी तरह बतलायी गयी है। उसी स्थान के चित्र ७६ से प्रकट होता है कि मध्य लग्न की क्रान्ति और इष्ट स्थान के अक्षांश को कब जोड़ना चाहिये और कब घटाना चाहिये । इनकी दिशाओं के जानने की रीति वही है जो पृष्ठ २६५-२६६ में बतलायी गयी है । यहाँ लग्न का अर्थ सायन लग्न समझना चाहिये । नतांशबाहुकोटिज्ये स्फुटे दृक्क्षेपदृग्गती । एकज्यावर्गस्तच्छेदो लब्धं दृग्गति जीवया ॥७॥

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