भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

पंचम अध्याय सूर्यग्रहणाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ श्लोक १--किस समय सूर्य के लंबन और नति शून्य होते हैं। श्लोक २-८-लंबन जानने के नियम । श्लोक ६—लंबन का संस्कार देकर असकृत्कर्म से अमावस्यान्त काल निश्चय करना । श्लोक १०-११—नति जानने के नियम । श्लोक १२-नति और चन्द्रमा के शर के योग या अन्तर से नति-संस्कृत-शर जाना जाता है। श्लोक १३-नति-संस्कृत-शर से स्थिति, विमर्द इत्यादि जाना चाहिए । श्लोक १४-१७-स्पर्श और मोक्षकाल के लंबन को जानकर असकृत्कर्म से फिर स्पर्श और मोक्षकाल की गणना करनी चाहिए । ] लंबन और नतिका अभाव कब होता है- मध्यलग्नसमे भानौ हरिजस्य न संभवः । अक्षोदङ् मध्यभक्रान्तिसाम्ये नावनतेरपि ॥१॥ अनुवाद-(१) जब सूर्य त्रिभोन लग्न पर होता है तब उसमें भोगांश- लंबन का अभाव होता है । जब किसी स्थान का उत्तर अक्षांश और त्रिभोन लग्न की उत्तर क्रान्ति समान होते हैं अर्थात् जब सूर्य ख-स्वस्तिक पर रहता है तब उसमें नति अर्थात् शर-लंबन का अभाव होता है । विज्ञानभाष्य-इस श्लोक के मध्यगत का अनुवाद त्रिभोन लग्न किया गया है यद्यपि पृष्ठ ३२६ में बतलाया गया है कि मध्यलग्न वित्रिम लग्न अथवा त्रिभोन लग्न से भिन्न होता है । परन्तु यहाँ आचार्य ने त्रिभोन लग्न को मध्य इसलिए लिख दिया कि यह उदय और अस्त लग्नों के मध्य में होता है, यद्यपि एक ही शब्द का प्रयोग दो अर्थों में संदिग्ध होता है । यदि मध्यलग्न का वह अर्थ लिया जाय जो त्रिप्रश्नाधिकार के श्लोक ४८ में माना गया है तो भाव अशुद्ध ठहरता है इसलिये यहाँ मध्य-लग्न का अर्थ त्रिभोन लग्न ही है। यदि सूर्य या कोई ग्रह त्रिभोन लग्न पर हो तो भोगांश-लंबन शून्य होता है । इसकी उपपत्ति त्रिप्रश्नाधिकार में विस्तारपूर्वक बतलायी गयी है (देखो पृ० ४१०) । शर-लंबन के सम्बन्ध में भी वहीं बतलाया जा चुका है । देशकालविशेषेण यथाऽवनतिसंभवः । लम्बनस्यापि पूर्वान्यदिग्वशाच्च तथोच्यते ॥२॥