सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ सूर्य-सिद्धान्त जानने के लिए अपने सिद्धान्त ग्रन्थों में ऐसे संशोधनों का समावेश करना चाहिए जो दृग्गणित से सिद्ध होते हैं। ऐसे संशोधनों की पूरी जानकारी कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे यहां एक वेधशाला ऐसी हो जिससे अर्वाचीन ज्योतिष का पठन-पाठन सुगमतापूर्वक हो सके । मेरी समझ में यह अधर्म है कि हम अपने पंचांगों में ग्रहण, शृङ्गोन्नति, ग्रहोदय, ग्रहास्त, इत्यादि की गणना करने के लिए पाश्चात्य देशों में बने हुए नाविक पंचांगों के आश्रित हों परन्तु इनके सिद्धान्तों के पठन-पाठन का स्वतन्त्र प्रबन्ध न करें । अब संक्षेप में यह दिखलाया जायगा कि ज्योतिर्गणित के अनुसार इस ग्रहण के मूलाङ्क क्या हैं । पूर्णमान्तकालिक मूलाङ्क स्पष्ट रवि ११८°५६′·२३ स्पष्ट चन्द्र २९८°५६′·२३ रविदिन गति ५७′·६ चन्द्र दिन गति १४°८′·१ राहु १२०°४′·५ रवि लम्बन ०′·१५ चन्द्र परम लम्बन ५६′·३ चन्द्र बिम्ब ३२′·४ भूभा बिम्ब ८७′·० मानैक्य खंड ५६′·६ मानान्तर खंड २७′·२ अयनांश २२°४७′ चन्द्र शर उत्तर ६′·६ प्रातःकाल की सूर्य क्रान्ति १४°३१′·३ यह पहले बतलाया गया है कि अयनांशों में भिन्नता क्यों है। इस भिन्नता के कारण रवि राहु और चन्द्रमा के भोगांशों में भी ७′ का अन्तर हो जायगा । इन मूलाङ्कों से यदि ग्रहण की गणना की जाय तो नाविक पञ्चांग में दिये हुए समय से २ या ३ पल का अन्तर रह जाता है। इसका कारण यह है कि ऊपर सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक गतियां ही ली गयी हैं जबकि सूक्ष्म गणना के लिये इनका प्रत्येक घड़ी की गति स्पर्श, सम्मीलन, उन्मीलन कालों को जान कर काम लेना चाहिए।