भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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चन्द्रग्रहणाधिकार ४६७ काल समीकरण - ० ११ चरकाल +१ ११ मध्यम प्रातःकाल से } +४५ ० मध्यम मध्यरात्रि तक } काशी के सूर्योदय से } ४५ ५४ पर होगा । स्पर्शकाल का आरम्भ } पूर्णिमान्त काल ३ २३ मध्यरात्रि के उपरान्त विमर्दार्ध - २ १.७ सम्मीलन काल १ २१.३ मध्यरात्रि के उपरान्त काशी का देशान्तर +१ १३ काल समीकरण - ० ११ चरकाल +१ ११ प्रातःकाल से मध्य } ४५ ० रात्रि तक } काशी के सूर्योदय के } ४८ ३४.३ पर होगा । सर्वग्रास का आरम्भ } विमर्द काल ४ ३.४ ∵ काशी के सूर्योदय से उन्मीलन ५२ ३३.७ पर होगा इसी प्रकार स्पर्शकाल में ग्रहण स्थिति काल जोड़ने से काशी के सूर्योदय से ५५ घड़ी १८ पल पर ग्रहण का मोक्ष होगा । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त के राहु के भोगांश की जगह राहु का यथार्थ भोगांश प्रयोग करने से सर्वग्रास ग्रहण का आरम्भ और अन्त यथार्थता के बहुत निकट हो जाता है । इन सब बातों से जान पड़ता है कि सूर्य-सिद्धान्त में राहु का भगण काल बहुत अशुद्ध है । इसकी अपेक्षा ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य के अनुसार राहु की गणना बहुत शुद्ध है और यथार्थता के बहुत निकट है । यह पहले बतलाया गया है कि ग्रहण की गणना करने के लिए सूर्य और चन्द्रमा के लंबन, बिम्ब, दूरी, इत्यादि की जानकारी जितनी सूक्ष्म हो ग्रहण-काल उतना ही शुद्ध आते हैं । यह भी दिखलाया गया है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा की जो गति बिम्बमान इत्यादि निकलते हैं वह स्थूल हैं । यदि इन सबका विचार दृग्गणित के अनुसार किया जाय तो ग्रहण के प्रत्यक्षकाल और गणित सिद्ध काल में कुछ भी अन्तर न पड़ेगा । इसलिए कम से कम ग्रहण काल का शुद्ध समय