सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४२ सूर्य-सिद्धान्त इस गणना से स्पष्ट है कि काशी में सूर्यग्रहण का स्पर्श और मोक्ष दोनों देख पड़ेगा। परन्तु यह बात काशी में एकत्र हुए किसी मनुष्य को नहीं देख पड़ी जैसा कि लोगों का अनुभव है । इसका कारण यह है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार जो मूलाङ्क आये हैं वे बहुत स्थूल हैं। इसी कारण यद्यपि लग्न के नतांश इत्यादि के जानने की रीति बिल्कुल बदल दी गयी है तो भी सूक्ष्मता नहीं आ सकी । इन मूलाङ्कों में सबसे बड़ी अशुद्धि राहु के मूलाङ्क में है जैसा कि चन्द्रग्रहणाधिकार में बतलाया गया है । राहु का मूलाङ्क लेने पर क्या दशा होती है ? १६२६ ई० के नाविक पंचांग के अनुसार ११ जनवरी सोमवार को ग्रीनविच के मध्यम मध्याह्नकाल में सायन राहु का स्थान ११५°·७५०५ था । इस समय काशी में मध्याह्नोपरान्त १३ घड़ी ५० पल ३१ विपल हुआ था (देखो पृष्ठ २५१), जो मध्यम प्रातःकाल से २८ घड़ी ५०·५ पल होता है। इस समय से माघी अमावस्या के अन्त तक अर्थात् गुरुवार के मध्यम प्रातःकाल के १६ घड़ी ५४ पल तक २ दिन ४८ घड़ी ३·५ पल होता है । इतने समय में राहु की गति इस प्रकार निकली:-- १ दिन की गति = ०°·०५२६५ २ ;; = ०°·१०५६२ ३० घड़ी की गति = ०°·०२६४८ १५ ,, = ०.०१३२४ ३ ,, = ०.००२६५ ३ पल की गति = ०.००००४ योग = ०.१४८३ यह घटाने पर सायन राहु का स्थान हुआ, ११५·६०२२ = ११५° ३६'·१ परन्तु अयनांश = २२°४१' ∴ राहु का निरयन भोगांश (अमावस्यान्त काल में) = ९२° ५५' चन्द्रमा का निरयन ,, = २७०° ३३' ∴ राहु से चन्द्रमा का अन्तर = १७७° ३८' यदि चन्द्रमा का परमशर ४°३०' की जगह ५°८'४२" माना जाय (देखो पृ० ७५) तो