सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्यग्रहणाधिकार ५४३ चन्द्रशर ज्या $=$ ज्या १७७° ३८' $\times$ ज्या ५° ८' ४२" $=$ ज्या २° २२' $\times$ ज्या ५° ८' ४२" $=\cdot०४१३ \times \cdot०८६७$ $=\cdot००३७$ $\therefore$ चन्द्रशर $= १२' ४०''$ उत्तर $= १२'\cdot६७$ उत्तर $= ३४\cdot६२$ दक्षिण $\because$ नति संस्कृति चंद्रशर $= २१'\cdot६५$ दक्षिण $\therefore$ ग्रास का परिमाण $=$ मानैक्य खंड $-$ नति संस्कृति चन्द्रशर $= ३४'\cdot१ - २१'\cdot६५$ $= १२'\cdot१५$ इस प्रकार यहाँ भी सिद्ध होता है कि यदि राहु का भोगांश ठीक-ठीक लिया जाय तो भी ग्रास का परिमाण १२'·१५ होता है अर्थात् ग्रहण का स्पर्श और मोक्ष काशी में देखा जा सकता है परन्तु यह भी अनुभव में नहीं आया । इसलिए अब यह देखना है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा के लंबन, नति और स्फुट व्यास इत्यादि दृग्गणित के अनुसार और नवीन रीतियों से निकाले जाँय तो क्या अन्तर पड़ता है । नाविक पंचांग के अनुसार :- अमावस्यान्त काल में चन्द्रमा का क्षितिज लंबन $= ६१' १२'' = ६१'\cdot२$ चंद्रमा का उत्तर शर $= ७' ३६'' = ७'\cdot६$ ,, ,, व्यासार्ध $= १६' ४०''\cdot६ = १६'\cdot६८$ सूर्य का व्यासार्ध $= १६' १७''\cdot२ = १६'\cdot२६$ त्रिभोन लग्न और मध्यलग्न वही माने जाते हैं जो पहले निकाले गये हैं । (पृष्ठ ५३६) पृष्ठ ४०७ के सूत्र (च) के अनुसार भु $=$ लि ज्या त्रा कोज्या श $-$ लि कोज्या त्रा ज्या श कोज्या व जहाँ त्रा त्रिभोन लग्न का नतांश, लि चन्द्रमा का क्षितिज लंबन, श चन्द्रमा का शर, व विश्लेषांश और भु नति है। $\therefore$ नति $= ६१'\cdot२ ज्या ४०^\circ ५७' कोज्या ७'\cdot६ - ६१'\cdot२ कोज्या ४०^\circ ५७'$ $\times ज्या ७'\cdot६ \times कोज्या ३१^\circ २८'$ $= ६१'\cdot२ \times \cdot६५५४ \times \cdot६६६६ - ६१'\cdot२ \times \cdot७५५३ \times \cdot००२२ \times \cdot८५२६$ $= ६१'\cdot२ (\cdot६५५४ \times \cdot६६६६ - \cdot७५५३ \times \cdot८५२६ \times \cdot००२२)$ $= ६१\cdot२ (\cdot६५५३३४६ - \cdot००१४१७२)$