भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

५५० सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार मोक्षकालिक वलन को जो दिशा आती है वह पूर्व विन्दु के ही अनुसार आती है परन्तु चन्द्रग्रहण में मोक्ष पश्चिम विन्दु की ओर होता है इसलिए इस विन्दु से स्फुटवलन का कोण बनाने के बिए अथवा क्रान्तिवृत्त की दिशा जानने के लिए स्फुटवलन की दिशा उलट दी जाती हैं । ऊपर जो कुछ लिखा गया है उसके विपरीत सूर्यग्रहण में करना चाहिए । अर्थात् स्पर्श काल में स्फुटवलन की जो दिशा हो उसके विपरीत दिशा में पच्छिम विन्दु से वलनाग्र विन्दु बनाना चाहिए, परन्तु मोक्ष काल में पूर्व विन्दु से स्फुटवलन की दिशा में ही वलनाग्र विन्दु बनाना चाहिए । इसका कारण स्पष्ट है । सूर्यग्रहण में स्पर्श सूर्यबिम्ब के पच्छिम की ओर और मोक्ष पूर्व की ओर होता है । परन्तु पच्छिम की ओर स्फुटवलन की दिशा उलट जाती है जैसा ऊपर कहा गया है । इस- लिए सूर्यग्रहण में स्पर्शकालिक वलन की दिशा को उलटना पड़ता है परन्तु मोक्ष- कालिक वलन की दिशा में कोई फेरफार नहीं करना पड़ता । श्लोक ६-८—वलनाग्र विन्दु से जो रेखा वलनाश्रित वृत्त अथवा समास- वृत्त था ग्राह्यबिम्ब के केन्द्र तक खींची जाती है उससे केवल यह जाना जा सकता है कि क्रान्तिवृत्त की दिशा क्या है । सूर्यग्रहण में ग्राह्यबिम्ब सूर्य ही होता है और सूर्य सदैव क्रान्तिवृत्त पर रहता है इसलिए केन्द्र से वलनाग्र विन्दु तक जानेवाली रेखा क्रान्तिवृत्त ही समझी जा सकती है । परन्तु चन्द्रग्रहण में ग्राह्यबिम्ब चन्द्रमा होता है और चन्द्रमा क्रान्ति वृत्त से अपने शर के समान अन्तर पर उत्तर या दक्षिण होता है इसलिए चन्द्र बिम्ब के केन्द्र से वलनाग्र विन्दु तक जाने वाली रेखा क्रान्ति- वृत्त कदापि नहीं हो सकती । यह इसके समानान्तर होती है । चाहे सूर्यग्रहण हो चाहे चन्द्रग्रहण, दोनों दशाओं में छादक का केन्द्र वलनाग्र विन्दु से केन्द्र तक जाने वाली रेखा पर नहीं होता क्योंकि सूर्यग्रहण में छादक चन्द्रमा होता है जो क्रान्ति- वृत्त पर नहीं चलता और चन्द्रग्रहण में छादक भूछाया होती है जो चंद्रमा की कक्षा में नहीं चलती इसलिए स्पर्श या मोक्ष काल में छादक के केन्द्र का पता लगाने के लिए उस विन्दु से जहाँ वलनाग्र रेखा समास-वृत्त को काटती है चन्द्र-विक्षेप के अन्तर पर समास-वृत्त तक केन्द्र से एक रेखा खींचते हैं । यह रेखा समास-वृत्त को जहाँ काटती है उसे विक्षेपाग्र बिंदु कहते हैं । स्पर्श या मोक्ष के समय छादक का केन्द्र इसी विन्दु पर होता है । इसलिए यदि इस विन्दु को केन्द्र मानकर छादक के व्यासार्ध से एक वृत्त खींचा जाय तो यह ग्राह्यविम्ब को जहाँ स्पर्श करेगा वहीं ग्रहण का स्पर्श या मोक्ष होगा । विक्षेपाग्र विन्दु से केन्द्र तक जो रेखा खींची जाती है उससे भी स्पर्श या मोक्ष का स्थान जाना जा सकता है क्योंकि जिस विन्दु पर छादक और छाद्य बिम्ब स्पर्श करते हैं उसी विन्दु पर विक्षेपाग्र विन्दु से केन्द्र तक