भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

५५८ सूर्य-सिद्धान्त की ओर छादक के केन्द्र के मार्ग पर रखो और देखो कि जब शलांका का एक सिरा केन्द्र पर है तब इसका दूसरा सिरा छादक के केन्द्र के मार्ग को कहाँ छूता है, (१६) जहाँ छुवे वहीं इष्टकाल में छादक का केन्द्र होगा । इसी विन्दु को केन्द्र मानकर छादक के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वही इष्टकाल में छादक का बिम्ब होगा। यह छाद्य बिम्ब को जितना ढक लेगा उतना ही भाग इष्टकाल में ग्रस्त होगा और इस समय का जो परिलेख होगा वही इष्ट ग्रास का परिलेख होगा । विज्ञान भाष्य—यह काम आजकल परकार की सहायता से सहज ही हो सकता है । इन तीन श्लोकों का सार यह है कि जब हमें चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १८-२० के अनुसार इष्ट काल का ग्रास ज्ञात हो जाय तब इसका परिलेख कैसे खींचना चाहिए । पृष्ठ ४६१ के चित्र ६६ के संबंध में बतलाया गया है कि चन्द्रमा का ग्रस्त भाग ज झ = छझ + चज - च छ = मानैक्यार्ध - चन्द्रमा के केन्द्र से भूछाया के केन्द्र का अंतर । इसलिए यदि मानैक्यार्ध से ग्रस्त भाग घटाया जाय तो छादक और छाद्य के केन्द्रों की दूरी ज्ञात हो सकती है। जब यह दूरी जान ली गयी और छाद्य का केन्द्र तथा छादक का मार्ग ज्ञात ही है तब छादक का स्थान जान लेना कुछ कठिन नहीं है। यदि परकार के दोनों भुजों की नोकों की दूरी छादक और छाद्य के केन्द्रों की दूरी के समान कर ली जाय और छाद्य के केन्द्र को केन्द्र मानकर एक धनु खींचा जाय तो यह छादक के मार्ग को दो बिन्दुओं पर काटेगा । जो विन्दु मध्यविन्दु से स्पर्शविन्दु की ओर होता है वहाँ छादक मध्यकाल के पहले रहता है और जो विन्दु मध्यविन्दु से मोक्ष विन्दु की ओर होता है वहाँ छादक मध्यकाल के पीछे रहता है । इस विन्दु को जानकर छादक के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वह छाद्य को जहाँ तक ढक लेगा वही ग्रस्त भाग होगा । इस प्रकार किसी इष्टकाल का परिलेख सहज ही खींचा जा सकता है । सर्वग्रास ग्रहण के आरंभ या अंत का परिलेख खींचने की रीति— मानान्तरार्धकमितं शलाकां ग्रासदिक्मुखीम् । निमीलनाख्यां दद्यात्सा तन्मार्गे यत्र संस्पृशेत् ॥२०॥ तेतो ग्राहकखण्डेन प्राग्वन्मण्डलमालिखेत् । तद्ग्राह्यमण्डलयुतिर्यन्त्र तत्र निमीलनम् ॥२१॥ एवमुन्मीलने मोक्षदिक्मुखं संप्रसारयेत् । विलिखेन्मण्डलं प्राग्वदुन्मीलनमथोक्तवत् ॥२२॥ अनुवाद--(२०) परिलेख के केन्द्र से अर्थात् ग्राह्य बिम्ब के केन्द्र से मानान्तर खंड के समान एक शलाका छादक के मार्ग पर स्पर्शविन्दु की ओर इस प्रकार रखे