सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिलेखाधिकार ५५६ कि शलाका का एक सिरा केन्द्र पर और दूसरा सिरा छादक के मार्ग को स्पर्श करे । इसी स्थान पर सम्मीलन के समय छादक का केन्द्र होता है । (२१) इसको केन्द्र मानकर ग्राहक के बिम्बार्ध के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जायगा वह ग्राह्य बिम्ब के जिस बिन्दु पर स्पर्श करेगा उसी स्थान पर सम्मीलन का आरम्भ होगा । (२२) इसी प्रकार मानान्तर खंड के समान शलाका को मोक्ष बिन्दु की ओर रक्खा जाय तो शलाका का सिरा छादक के मार्ग को जहाँ स्पर्श करेगा उस बिन्दु को केन्द्र मानकर ग्राहक के व्यासार्ध के समान त्रिज्या से जो वृत्त खींचा जायगा वह ग्राह्य बिम्ब को जहाँ स्पर्श करेगा वहीं उन्मीलन होगा अर्थात् इसी बिन्दु से सर्वग्रास ग्रहण का अंत होगा । विज्ञान भाष्य—इसकी व्याख्या करने की बहुत आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह चित्र १०० से स्वयम् स्पष्ट है । सम्मीलन या उन्मीलन काल के समय छाद्य और छादक के केन्द्रों का अंतर मानान्तर खंड के समान होता है। इसलिए जब हमें छाद्य का केन्द्र, छादक का मार्ग तथा छाद्य, और छादक के केन्द्रों का अंतर ज्ञात है तब छादक का केन्द्र स्थिर करना कठिन नहीं हो सकता । हाँ, इतना ध्यान रखना चाहिए कि जब हमें सम्मीलन काल का परिलेख खींचना हो तब स्पर्श की दिशा में और जब उन्मीलन काल का परिलेख खींचना हो तब मोक्ष की दिशा में शलाका रखनी चाहिए । यह काम भी आजकल परकार से सहज ही लिया जा सकता है । परकार की दोनों नोकों का अंतर मानान्तर खंड के समान करके इसकी एक नोक को केन्द्र पर रखकर दूसरी नोक से एक धनु खींचे जो छादक के मार्ग को दो बिन्दुओं पर काटेगी । जो बिन्दु स्पर्श की ओर होगा वहीं सम्मीलन काल में छादक का केन्द्र होगा और जो बिन्दु मोक्ष की ओर होगा वहीं उन्मीलन काल में छादक का केन्द्र होगा । जब छादक का केन्द्र स्थिर कर लिया गया तब छादक के बिम्बार्ध के समान त्रिज्या से वृत्त खींचकर सर्वग्रास ग्रहण के आरंभ और अंत का स्थान जान लेना कुछ भी कठिन नहीं होता । ग्राह्य बिम्ब का रंग कैसा होता है-- अर्धादूनं च धूम्रं स्यात्कृष्णमर्धाधिकं भवेत् । विमुञ्चतः कृष्णधूम्रं कपिल सकलग्रहे ।।२३।। अनुवाद—(२३) जब चन्द्र बिम्ब का आधे से कम भाग ग्रस्त होता है तब ग्रस्त भाग का रंग धुएँ की तरह होता है । आधे से अधिक ग्रस्त होने पर ग्रस्त भाग काला देख पड़ता है । जब चन्द्र विम्ब का बहुत सा भाग ग्रस्त हो जाता है और थोड़ा ही सा बचा रहता है तब ग्रस्त भाग का रंग लाली लिये हुए काला होता है। परन्तु