सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 585, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० सूर्य-सिद्धान्त सर्वग्रास ग्रहण का रंग लाली हुए भूरा होता है। (सूर्यग्रहण में सूर्य के ग्रस्त भाग का रंग सदैव काला होता है ।) विज्ञान भाष्य—जब तक चन्द्रमा का प्रकाश तेज रहता है तब तक इसकी तुलना में ग्रस्त भाग का रंग धूम्र या काला देख पड़ता है। परन्तु जब चन्द्रमा का थोड़ा ही सा भाग बचा रहता है तब इसका प्रकाश तेजरहित हो जाता है। इसलिए ग्रस्त भाग का रंग कुछ-कुछ लाल भी देख पड़ता है। लाली का कारण यह है कि सूर्य का सूक्ष्म प्रकाश वायुमंडल से वर्तित होकर चन्द्र बिम्ब पर पड़ता है इसलिए काले ग्रस्त भाग पर कुछ लाली आ जाती है। जिस समय पूरा चन्द्र बिम्ब छाया में आ जाता है उस समय चन्द्र बिम्ब काला न होकर लाली लिए हुए भूरा देख पड़ता है। इसका कारण भी सूर्य का वर्तित प्रकाश है जो पृथ्वी के वायुमण्डल से घूमकर चन्द्रमा पर पड़ता है। यदि वायुमण्डल न होता तो चन्द्रमा के ग्रस्त भाग का रंग भी सदैव काला ही होता जैसा कि ग्रस्त सूर्य का रंग होता है। वायुमण्डल के वर्तन के कारण कभी-कभी एक आश्चर्यजनक घटना और भी देख पड़ती है। उदय या अस्त काल में जब ग्रहण लगता है तब कभी-कभी चमकते हुए सूर्य की उपस्थिति में ग्रस्त चन्द्रमा देख पड़ता है जिससे एक ओर चन्द्रमा में ग्रहण लगा रहता है और दूसरी ओर सूर्य अपने तेज से पृथ्वी को प्रकाशमान किये रहता है। ऐसी १ घटनाएँ सन् १६६६, १६६८ और १७५० ईस्वी में देख पड़ी थीं । परिलेख खींचने का रहस्य गुप्त रखना चाहिए— रहस्यमेतद्देवानां न देयं यस्य कस्यचित् । सुपरीक्षितशिष्याय दातव्यं ज्ञानमुत्तमम् ॥२४॥ अनुवाद—(२४) परिलेख खींचने की विद्या देवताओं की गोप्य वस्तु है। यह विद्या ऐसे-वैसे आदमी को न बतलानी चाहिए । अच्छी तरह परीक्षा किये हुए शिष्य को यह उत्तम विद्या बतलानी चाहिए । विज्ञान भाष्य—इसका सार यही जान पड़ता है कि परिलेख खींचने की रीति सुगमतापूर्वक समझ में नहीं आ सकती इसलिए जो इसके तत्व को अच्छी तरह नहीं समझ सकता उसको बतलाने से कोई लाभ नहीं है। इस विद्या का अधिकारी वही शिष्य हो सकता है जो इसके रहस्य को समझ सकता है । परिलेखाधिकार नामक ६ठे अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ । १. देखो Parker's Astronomy, page 171.