सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिलेखाधिकार ५७१
के कारण समयाभाव से भी यह इच्छा अभी पूरी नहीं हो सकती । आशा है कि पुस्तक समाप्त होने पर परिशिष्ट में यह विषय अच्छी तरह समझाया जा सकेगा । इस समय ग्रहण के सम्बन्ध में थोड़ी सी बातें और लिखकर यह अध्याय पूरा कर दिया जायगा । पृष्ठ ४५७-५८ में बतलाया गया है कि जब सूर्य्य चन्द्रमा के किसी पात, राहु या केतु के पास होता है तभी अमावस या पूर्णमासी के दिन सूर्य्य या चन्द्रग्रहण सम्भव है । इसलिए यह सिद्ध है कि ग्रहण का फेरा सूर्य्य और चन्द्रमा के पात की गतियों पर अवलम्बित है । यदि चन्द्रमा का पात अचल होता तो सूर्य्य दोनों पातों के निकट वर्ष में दो बार एक ही महीने में पहुँचता जिससे ग्रहण लगने के महीने और तिथि स्थिर रहते । परन्तु चन्द्रमा का पात प्रतिदिन ३'१०"·६४ पच्छिम की ओर चलता है जब कि सूर्य्य की मध्यम दैनिक गति ५९'८"·३३ पूर्व की ओर है । इसलिए प्रति दिन सूर्य्य चन्द्रपात से ६२'१९"·६७ अथवा ६२'१६" दूर होता जाता है । प्रतिदिन इतना दूर होते-होते सूर्य फिर उसी पात के पास ३६०° ÷ ६२'१६" = १२९६००० ÷ ३७३६ = ३४६·६२ दिन में पहुँचता है। दूसरे पात के पास पहुँचने में इसका आधा समय १७३·३१ दिन लगता है । यदि अमावस या पूर्णमासी के फेरे भी इतने ही दिन में पूरे होते तो प्रत्येक ३४६·६२ या १७३·३१ दिन के उपरान्त ग्रहण देख पड़ते । परन्तु चान्द्रमास का मध्यममान २९·५३०५६ दिन है जो ११ महीने में ३२४·८३६४७ दिन और १२ महीने में ३५४·३६७०५ दिन के समान है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि ग्रहण का फेरा ३४६·६२ दिन में नहीं पड़ सकता । परन्तु २२३ चान्द्रमास में २२३ × २९·५३०५६ दिन अथवा ६५८५·३२ दिन होते हैं और ३४६·६२ दिन के १९ फेरे में १९ × ३४६·६२ = ६५८५·७८ दिन होते हैं इसलिए ग्रहणों का फेरा अर्थात् ग्रहण-चक्र ६५८५·३२ दिनों का होता है । इतने दिनों के बाद उसो प्रकार के ग्रहण फिर आरंभ होते हैं। इसलिए इस अवधि को ग्रहणचक्र कहा जा सकता है । हमारे प्राचीन ज्योतिष में इस चक्र की चर्चा नहीं है। पाश्चात्य ज्योतिष में इसका नाम सरोस (Saros) है और इसे खाल्दिया निवासियों ने विक्रमी संवत् के आरम्भ से साढ़े छः सौ वर्ष पूर्व निश्चय किया था। इस ग्रहण चक्र से खाल्दिया वालों को ग्रहणों का पता लगाने में बड़ी सुविधा होती थी क्योंकि बिना लम्बी-चौड़ी गणना किये ही केवल ६५८५.३२ दिनों की ग्रहणों की सारणी से यह सहज ही जान लेते थे कि भविष्य में ग्रहण कब लगेगा । परन्तु यह याद रखना चाहिये कि यह चक्र (युग) सूर्य्य, चन्द्रमा और राहु की मध्यम गतियों के अनुसार निकाला गया है इसलिए इसमें थोड़ी सी स्थूलता है । दूसरे,