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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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५७२ सूर्य-सिद्धान्त यह युग पूरे ६५८५ दिनों का नहीं है वरन् सात-आठ घंटे अधिक है। इसका यह फल होता है कि उसी स्थान में और उसी समय वही ग्रहण कभी देख पड़ेगा और कभी नहीं। जैसे प्रयाग में सूर्यास्त के समय चन्द्रग्रहण देख पड़ा तो दूसरी बार ६५८५ दिनों के बाद सूर्यास्त से सात आठ घंटे बाद कोई २ बजे रात को यही चन्द्र- ग्रहण फिर देख पड़ेगा। परन्तु तीसरी बार यह ग्रहण उस समय लगेगा जब प्रयाग में सूर्योदय हो चुका रहेगा। इसलिए यह प्रयाग में नहीं देख पड़ेगा परन्तु प्रयाग के पश्चिम उस स्थान में जहाँ ग्रहण के समय रात्रि रहेगी देख पड़ेगा। एक सौर वर्ष में ३६५.२५८७६ दिन होते हैं। इसलिए १८ वर्षों में ६५७४.६५७७ दिन हुए जो ग्रहण चक्र से केवल १०.६६ दिन कम है। इसलिए प्रकट है कि यदि ग्रहण चक्र का आरंभ मेष संक्रान्ति के दिन हुआ तो दूसरे चक्र का आरम्भ मेष संक्रान्ति से १०.६६ दिन उपरान्त होगा और तीसरे चक्र का आरंभ मेष संक्रान्ति से २१.३२ दिन पर होगा। एक पात पर कितने ग्रहण हो सकते हैं—एक चान्द्रमास में २९.५३ दिन होते हैं इसलिए एक पक्ष में १४.७६५ दिन हुए। ऊपर बतलाया गया है कि १ दिन में सूर्य राहु से ६२' १६" दूर होता है। इसलिए एक पक्ष में १४.७६५ x १° २' १६" = १५° २०' ६" दूर होता है। यदि पूर्णमासी के दिन चन्द्रमा पात पर हो तो इस दिन सर्वग्रास चन्द्रग्रहण अवश्य लगेगा। इसी समय सूर्य दूसरे पात पर होगा इसलिए इससे एक पक्ष पहले और पीछे दोनों अमावसों पर सूर्य दूसरे पात से १५° २०' आगे पीछे रहेगा जो सूर्य ग्रहण की महत्तम सीमा १८°.५ से कम है। इसलिए इन दोनों अमावसों में खंड सूर्य-ग्रहण हो सकता है (देखो पृष्ठ ४६३-६४)। इस प्रकार एक चान्द्रमास में अधिक से अधिक तीन ग्रहण हो सकते हैं जबकि सूर्य एक पात से १५°२०' आगे पीछे होता है। परन्तु ऐसे तीनों ग्रहण एक ही स्थान से बहुत कम देख पड़ते हैं ।१ १. महाभारत में एक पक्ष में दो ग्रहणों की चर्चा इस प्रकार है :— चतुर्दशीं पंचदशीं भूतपूर्वां च षोडशीं । इमां तु नाभिजानेहममावस्यां त्रयोदशीं ॥ चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीं ॥३२॥ भीष्म पर्व अध्याय ३ यहाँ एक पक्ष में दो ग्रहणों की ही चर्चा नहीं है वरन् यह भी है कि एक पक्ष १३ दिन का हो गया है। इस पर आश्चर्य प्रकट किया गया है कि १४.१५ और १६ दिन के पक्ष तो देखे गये हैं परन्तु १३ दिनों का पक्ष अभी तक नहीं सुना गया। इस पर स्व० शंकरबालकृष्ण दीक्षित ने अपने भारतीय ज्योतिषशास्त्र के पृष्ठ ११४-११५ पर अच्छा विवेचन किया है और बतलाया है कि पूर्णमासी के चन्द्र-