सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० सूर्य-सिद्धान्त २रे श्लोक की उपपत्ति—यदि गा से ग अधिक हो तो हर धनात्मक होगा जिससे स भी धनात्मक होगा, ऐसी दशा में दोनों का समागम इतने दिनों के बाद होगा। परन्तु यदि गा से ग कम हो तो हर ऋणात्मक होने के कारण स भी ऋणात्मक होगा जिसका अर्थ यह है कि इतने दिन पहले ही दोनों ग्रहों का समागम हो चुका है। इस जगह दोनों ग्रहों की गतियाँ स्वयम् धनात्मक मानी गयी हैं। यहां सरलता के लिए इसको स्मरण रखना चाहिए कि मार्गी गति धनात्मक और वक्री गति ऋणात्मक समझी गयी है। यदि ग और गा दोनों ऋणात्मक हों अर्थात् यदि दोनों ग्रह वक्री हों तो उपर्युक्त दिनफल का हर (-ग)-(-गा)=गा-ग हो जायगा जो पहले का बिलकुल उलटा है अर्थात् यदि गा से ग कम हो तो दिनफल धनात्मक होगा और समागम होगा परन्तु यदि गा से ग अधिक हो तो दिनफल ऋणात्मक होगा और समागम पहले ही हो चुका है। इस प्रकार २रे श्लोक की उपपत्ति सिद्ध हुई। ३रे श्लोक के पूर्वार्ध की उपपत्ति—यदि क मार्गी और ख वक्री हो तो ग धनात्मक और गा ऋणात्मक होगा इसलिए समीकरण का हर ग-(-गा) के समान होगा जो वास्तव में ग+गा अर्थात धनात्मक हो जायगा इसलिए स धनात्मक होने से समागम उतने ही समय पश्चात् होगा। परन्तु यदि ख मार्गी और क वक्री हो तो ग ऋणात्मक और गा, धनात्मक होगा ऐसी दशा में समीकरण का हर ग-गा = -ग-(+गा) = -ग-गा = -(ग+गा) जो ऋणात्मक है इसलिए समागम उतने समय पहले ही हो चुका है। यहाँ यह भी सिद्ध हो जाता है कि युतिकाल का समय जानने के लिए दोनों ग्रहों के भोगांशों के अंतर को दोनों ग्रह की गतियों के अन्तर से भाग देना चाहिये यदि दोनों ग्रहों मार्गी या दोनों ग्रह वक्री हों; परन्तु यदि उनमें से एक मार्गी हो और दूसरा वक्री हो तो दोनों की गतियों के योग से भाग देना पड़ता है। ३रे श्लोक के उत्तरार्ध से ६ठें श्लोक तक की उपपत्ति—इन श्लोकों का सार यह है :— भा—भ इष्टकाल से युतिकाल तक का समय = ――――― ग—गा भा—भ इष्टकाल से युतिकाल तक क ग्रह की चाल = ग × ――――― ग—गा भा—भ ,, ,, ख ,, = गा × ――――― ग—गा