सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहयुत्यधिकार ५८१ इसलिये यदि क के इष्टकाल के भोगांश में ग × (भा—भ)/(ग—गा) जोड़ दिया जाय तो इसका युतिकाल का भोगांश और ख के इष्टकाल के भोगांश में गा × (भा—भ)/(ग—गा) जोड़ा जाय तो ख का युतिकाल का भोगांश ज्ञात होगा जो दोनों एक ही होंगे क्योंकि युतिकाल में दोनों ग्रहों के भोगांश एक होते हैं। यहाँ ग—गा का मान ग्रहों की मार्गी और वक्री गतियों के अनुसार बदलेगा जैसा कि पहले कहा गया है क्योंकि जब दोनों ग्रह मार्गी होंगे तो ग और गा दोनों धनात्मक होंगे और जब दोनों ग्रह वक्री होंगे तब ग और गा दोनों ऋणात्मक होंगे। इन दोनों दशाओं में ग—गा का मान वही होगा जो दोनों का अन्तर है। परन्तु यदि एक वक्री हुआ और दूसरा मार्गी तो ग—गा का मान वह होगा जो दोनों का योगफल है परन्तु यह योगफल ऋणात्मक होगा यदि ग ऋणात्मक है और धनात्मक होगा यदि गा ऋणात्मक हो। इस प्रकार चौथे श्लोक की उपपत्ति सिद्ध हुई। यह पहले ही मान लिया गया है कि इष्ट काल में क, ख ग्रहों के भोगांश क्रमशः भ और भा हैं और इष्टकाल से युतिकाल तक इनकी चालें क्रमशः ग × (भा—भ)/(ग—गा) और गा × (भा—भ)/(ग—गा) हैं, इसलिए युतिकाल में इनके भोगांश क्रमशः भ + ग × (भा—भ)/(ग—गा) और भ + गा × (भा—भ)/(ग—गा) हैं। इन दोनों मानों का धन चिह्न प्रत्येक मान के दूसरे पद के चिह्न के अनुसार धन या ऋण होगा जैसा कि पहले कहा गया है। इस प्रकार ५वें और छठें श्लोक के पूर्वार्ध की उपपत्ति सिद्ध होती है। छठें श्लोक के उत्तरार्ध की उपपत्ति पहले ही सिद्ध की गयी है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि इस रीति से युक्तिस्थान का जो भोगांश ज्ञात होगा वह स्थूल होगा क्योंकि किसी इष्टकाल में किसी ग्रह की जो दैनिक गति होती है वह प्रत्येक दिन एकसी नहीं रहती, कुछ घटती-बढ़ती रहती है। इसलिए इष्टकाल की दैनिक गतियों के अनुसार गणना करने से कुछ स्थूलता रह जाती है। इस कारण यह आवश्यक है कि उपर्युक्त गणना से जो समय आवे उस समय के ग्रह के भोगांश और दैनिक गतियाँ स्वतन्त्र गणना से फिर निकाले और इनके ही आधार पर ऊपर के चार श्लोकों में दिये हुये नियमों से फिर युतिस्थान जाने। दृक्कर्म की रीति— कृत्वा दिनक्षपामानं ततो विक्षेपलिप्तिकाः । नतोन्नतं साधयित्वा स्वकाल्लग्नवशात्तयोः ॥७॥