सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहयुत्यधिकार ५६१ १२ वें श्लोक की उपपत्ति—आक्ष और आयन दृक्कर्म संस्कार करने पर ग्रहों के जो भोगांश आते हैं इनका अंतर जानकर यह देखना चाहिए कि दोनों ग्रहों का यह अंतर कब शून्य होता है । जिस समय यह अंतर शून्य होता है उसी समय दोनों ग्रहों की युति समप्रोतवृत्त पर होती है । इस समय यदि दोनों ग्रहों के शर एक ही दिशा में हों अर्थात् दोनों उत्तर या दोनों दक्षिण हों तो दोनों का अन्तर निकालने पर और यदि दोनों ग्रहों के शरों की दिशाएँ भिन्न हों अर्थात् एक का उत्तर और दूसरे का दक्षिण हो तो दोनों शरों का योग करने पर जो आता है उतने ही अन्दर पर दोनों ग्रह समप्रोतवृत्त पर देख पड़ते हैं । इस प्रकार सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आक्ष और आयन दृक्कर्म का संस्कार करने की रीति की उपपत्ति सिद्ध होती है जिससे यह पता तो चलता ही है कि यह रीति स्थूल है क्योंकि कई कल्पनाओं से यह सिद्ध की गयी है । भास्कराचार्य जी के अनुसार दृक्कर्म— भास्कराचार्यजी कहते हैं कि जिस समय ग्रह के क्रान्तिवृत्त का स्थान क्षितिज में लग्न होता है उस समय ग्रह अपने शर के कारण क्षितिज के ऊपर रहता है या नीचे रहता है। जिस समय ग्रह क्षितिज के ऊपर रहता है उस समय वह अपने क्रान्तिवृत्त के स्थान से पहले ही उदय हो जाता है और जिस समय नीचे रहता है उस समय वह पीछे उदय होता है । कितना पहले या पीछे उदय होता है यह दृक्कर्म से जाना जाता है। इस दृक्कर्म के २ खंड होते हैं। एक खंड ग्रह के आयन- वलन पर आश्रित और दूसरा आक्षवलन पर आश्रित रहता है । जो आयनवलन पर आश्रित होता है उसको आयन दृक्कर्म और जो आक्षवलन पर आश्रित रहता है उसको आक्षदृक्कर्म कहते हैं । चित्र १०८ में ग ग्रह का शर उत्तर है। ग का अहोरात्रवृत्त अ ग च छ रा क्षितिज को छ विन्दु पर काटता है इसलिए जिस समय ग के क्रान्तिवृत्त का स्थान गा क्षितिज पर है उस समय ग के अहोरात्रवृत्त का छ विन्दु क्षितिज पर है इसलिए ग का उदय गा से उतना पहले हुआ है जितनी देर में ग के अहोरात्र- वृत्त का ग छ खंड क्षितिज के ऊपर आया है। परन्तु ग छ=ग च+च छ जिनमें से प्रत्येक का मान इस प्रकार जाना जाता है : ग च की गणना— गोलीय समकोण त्रिभुज ग गा च में ग च गा कोण समकोण है क्योंकि गा का ध्रुवप्रोतवृत्त ग के अहोरात्रवृत्त को च स्थान पर काटता है इसलिए