सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६० सूर्य-सिद्धान्त अर्थात् सायन मकर राशि के आदि विन्दु उ से सायन कर्कराशि के आदि विन्दु द तक कहीं रहता है तब तक उसका कदम्बप्रोतवृत्त ध्रुवप्रोतवृत्त से बायें रहता है अर्थात् कदम्ब प्रोतवृत्त का तल ध्रुवप्रोतवृत्त के तल से ऊपर रहता है जैसा कि चित्र ३६ में दिखलाया गया है । परन्तु जब तक ग्रह दक्षिणायन रहता है अर्थात् सायन कर्क राशि के आदि विन्दु द से सायन मकर राशि के आदि विन्दु उ तक कहीं रहता है तब तक उसका कदम्ब प्रोतवृत्त ध्रुवप्रोतवृत्त से दाहने रहता है अर्थात् उसका कदम्बप्रोतवृत्त का तल ध्रुवप्रोतवृत्त के तल से नीचे रहता है जैसा कि चित्र १०६ में दिखलाया गया है । चित्र ३६ से प्रकट है कि जब ग ग्रह उत्तरायण और इसका शर उत्तर है तब इसका ध्रुवप्रोतवृत्त प विन्दु से पच्छिम है जहाँ इसका कदम्बप्रोतवृत्त, क्रान्तिवृत्त को काटता है । परन्तु यदि उत्तरायण ग्रह का शर दक्षिण, मानलो च पर हो तो स्पष्ट है कि इसका ध्रुवप्रोतवृत्त वही रहेगा जो ग का है परन्तु कदम्बप्रोत वृत्त च क ( जो चित्र में नहीं दिखलाया गया ) क्रान्तिवृत्त को उससे पच्छिम काटेगा अर्थात् च ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो स्थान होगा उससे आगे पूर्व में ध्रुवप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त को काटेगा । अर्थात् पहली दशा में ग्रह के भोगांश से घटाने पर और दूसरी दशा में जोड़ने पर ध्रुवप्रोतवृत्त और क्रान्तिवृत्त के सम्पात का स्थान ज्ञात होगा । इसी प्रकार चित्र १०६ से प्रकट है कि जब ग और घ ग्रह दक्षिणायन हैं इनके कदम्बप्रोतवृत्त से दाहिने हैं । ऐसी दशा में उत्तर शर वाले ग ग्रह का ध्रुवप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त को फ स्थान पर काटता है जो य से आगे पूर्व में है इसलिए ब के भोगांश में य फ जोड़ने से फ का स्थान ज्ञात होगा । परन्तु दक्षिण शर वाले घ का ध्रुवप्रोत- वृत्त क्रान्तिवृत्त के च स्थान पर काटता है जो य से पीछे पच्छिम में है इसलिए ब के भोगांश में च य ग घटाने पर च का स्थान ज्ञात होगा । यह प्रकट ही है कि जब ग्रह उत्तरायण रहता है तब इसके भोगांश में ६० अंश जोड़ने से जो भोगांश आता है उसकी क्रान्ति सदैव उत्तर रहती है क्योंकि जब ग्रह सायन मकर से आगे सायन कर्क तक कहीं रहता है तब इससे ६० अंश आगे का भोगांश सायन मेष से आगे और सायन तुला के पहले रहता है जिसकी क्रान्ति उत्तर होती है । इसी प्रकार जब ग्रह दणिणायन रहता है तब इसके भोगांश में ६० अंश जोड़ने से जो भोगांश आता है उसकी क्रान्ति सदैव दक्षिण होती है । इसलिए जो बात ऊपर उत्तरायण और दक्षिणायन के सम्बन्ध में कही गयी है वही उत्तर क्रान्ति और दक्षिण क्रान्ति के सम्बन्ध में भी लागू होती है जैसा कि १० वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है ।