सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 626, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहयुत्यधिकार ६०१ चित्र १०७ ग = युतकालिक ग्रह का स्थान क ख = समतल भूमि में गड़ा हुआ शंकु द = ख द छाया का अग्रबिन्दु जहाँ दर्पण रखा जायगा न = द्रष्टा का नेत्र इन श्लोकों से यह भी प्रकट होता है कि ज्योतिष-विज्ञान का अध्ययन ग्रन्थों के आधार पर ही नहीं होना चाहिए वरन् वेध भी करना चाहिए । इसलिए सिद्ध है कि ज्योतिष का पठन-पाठन उचित रीति से तभी सम्भव है जब ज्योतिष विद्यालय के साथ अच्छी वेधशाला भी हो । ऐसी वेधशाला में शंकु इत्यादि के स्थान में आजकल के सूक्ष्म यंत्र दूरदर्शक इत्यादि हों तभी वेधों में शुद्धता आ सकती है और सिद्धान्त ग्रन्थों में उचित संशोधन करके उनका जीर्णोद्धार भी हो सकता है । पाँच प्रकार की युतियों के लक्षण— उल्लेखं तारकास्पर्शो भेदे भेदः प्रकीर्तितः ।१८।। आरादंशुविमर्दाख्यमंशुयोगे परस्परम् । अंशादूनेऽपसध्याख्यं युद्धमेकोऽत्र चेदणुः ।।१९।। समागमस्स्यादधिके भवतश्चेद्बलाधिकौ । ११