भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६०२ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—( १८ ) का उत्तरार्ध--यदि युतिकाल में दोनों ग्रहों के बिम्बों का केवल स्पर्श होता हो तो ऐसी युति को उल्लेख नामक युति कहते हैं। परन्तु यदि एक का बिम्ब दूसरे के विम्ब को भेद करे अर्थात् कुछ ढक ले तो ऐसी युति को भेद नामक युति कहते हैं। (१९) यदि दोनों ग्रहों के बिम्ब तो कुछ दूर हों परन्तु उनकी किरणें मिली हुई देख पड़ें तो ऐसी युति को अंशुविमर्द नामक युद्ध कहते हैं। यदि दोनों ग्रहों के बिम्बों का अन्तर एक-एक अंश से कम हो तो ऐसी युति को अपसव्य युद्ध कहते हैं। इस युद्ध में यदि एक का बिम्ब छोटा हो तो अपसव्य व्यक्त होता है अन्यथा अव्यक्त होता है। ( २० ) यदि दोनों बिम्बों का अन्तर एक अंश से अधिक हो तो ऐसी युति को समागम कहते हैं। यदि दोनों ग्रह बली हों अर्थात् स्थूल हों तो व्यक्त समागम होता है । अन्यथा अव्यक्त समागम होता है । विज्ञान-भाष्य—यहाँ केवल परिभाषा बतलायी गयी है जो स्पष्ट है । इसलिए इस पर कुछ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । पराजित और विजयी ग्रहों का लक्षण— अपसव्ये जितो युद्धे दूरेऽप्यणुरदीप्तिमान् ॥२०॥ रुक्षो विवर्णो विध्वस्तौ मलिनो दक्षिणाश्रितः । उदक्स्थो दीप्तिमान्स्थूलो जयो याम्येऽपि यो बली ॥२१॥ अनुवाद—(२०) अपसव्य नामक युद्ध में जिस ग्रह का बिम्ब ढक जाता है, छोटा और तेजहीन होता है, (२१) रूखा वर्णहीन या फीका होता है और दक्षिण की ओर होता है वह पराजित समझा जाता है। परन्तु जिस ग्रह का बिम्ब उत्तर की ओर होता है तेजवान और बड़ा होता है वह विजयी समझा जाता है। बली अर्थात् बड़ा और तेजवान ग्रह दक्षिण की ओर हो तब भी विजयी समझा जाता है। विज्ञान-भाष्य—यह भी स्पष्ट है । आसन्नावप्युभौ दीप्तौ भवतस्तौ समागमे । स्वल्पौ द्वावपि विध्वस्तौ भवेतां कूटविग्रहे ॥२२॥ अनुवाद—(२२) यदि दोनों ग्रह पास होते हुए भी प्रभायुक्त हैं तो समागम नामक युद्ध होता है और यदि दोनों ग्रह छोटे और फीके हैं तो कूटविग्रह नामक युद्ध होता है। उदक्स्थो दक्षिणस्थो वा भार्गवः प्रायशो जयो । शशाङ्केनैवमेतेषां कुर्यात्संयोगसाधनम् ॥२३॥