सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२१ पड़ता है। परन्तु वराह मिहिर१ तथा ग्रहलाघवकार२ ने लिखा है कि शनि अथवा मङ्गलक रोहिणी-शकट-भेद होने से बड़ा अनिष्ट होता है। युतिकाल का साधन— ग्रहवद् द्यु निशेमानां कुर्याद् दृक्कर्म पूर्ववत् । ग्रहमेलनविज्ञेयं ग्रहभुक्त्या दिनादिकम् ॥१४॥ एष्यो हीने ग्रहे योगो ध्रुवकादधिके गतः । विपर्ययाद्वक्रगतैः ग्रहैः ज्ञेयः समागमः ॥१५॥ अनुवाद—(१४) पहले जिस तरह युतिकालिक ग्रहों का दिनमान और रात्रिमान जानने को कहा गया है उसी तरह नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान साधन करके उनका आक्षदृक्कर्म संस्कार करना चाहिये । इसके पश्चात् जैसे ग्रहों का परस्पर युतिकाल और युतिस्थान जाना जाता है उसी तरह केवल ग्रह की गति से ग्रह और नक्षत्र का युतिकाल और युतिस्थान जान लेना चाहिये । (१५) यदि ग्रह का आयन-आक्ष-दृक्कर्म-संस्कृत भोग नक्षत्र के आक्षदृक्कर्म-संस्कृत ध्रुवक से कम हो तो समझना चाहिये कि नक्षत्र और ग्रह का योग होने वाला है और यदि अधिक हो तो समझना चाहिये कि योग हो चुका है । परन्तु यदि ग्रह वक्री हो तो इसका उलटा समझना चाहिये । विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों में जो नियम बतलाये गये हैं उनकी व्याख्या ग्रहयुत्यधिकार में आ चुकी है । यहां ग्रह का तो आयन और आक्ष दोनों दृकर्म करने को कहा गया है परन्तु नक्षत्र का केवल आक्षदृक्कर्म करने को कहा गया है । इसका कारण स्पष्ट है । क्योंकि ग्रह का जो भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार आता है वह कदम्बाभिमुख होता है इसलिए उसमें आयन-दृक्कर्म का संस्कार करने से वह ध्रुवाभिमुख होता है । अब यदि इसमें आक्षदृक्कर्मका संस्कार किया जाय तो इसका भोगांश समप्रोतवृत्त में आता है । परन्तु नक्षत्रों के जो ध्रुवक १. रोहिणी शकटमर्कनंदनी यदि भिनत्ति रुधिरोथवा शशी । किं वदामि यदि नष्टसागरे जगदशेषमुपयाति संक्षये ॥३५॥ —बृहत्संहिता ३४ अध्याय २. कभशकटमसौ भिनत्त्यसृक् शनिरुडुयो यदि चेज्जनक्षयः ॥७॥ भौमकर्योः शकटभिदा युगान्तरे स्यात् सेदानीं न हि भवतीदृशि स्वपाते ॥८॥ —ग्रहलाघव, नक्षत्रच्छायाधिकार