सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३४ सूर्यसिद्धान्त रखे ही गये हैं परन्तु साथ ही साथ उनके साहित्य में प्रचलित नाम भी अब तक व्यवहार में आते हैं । यदि यह मालूम हो कि संस्कृत साहित्य में किसी तारे का क्या नाम प्रचलित है और अङ्गरेजी साहित्य में क्या नाम है तो तारों के पहचानने में बड़ी सुविधा होती है। इसलिए पहले यह बतला कर कि यूनानी भाषा के अक्षर और उनके नाम क्या हैं, एक सारिणी से यह भी बतलाया जायगा कि तारापुंजों के नाम संस्कृत और अङ्गरेजी तथा लेटिन और यूनानी भाषाओं में क्या है। अक्षरों की जगह हमारे आकाश चित्र में हिन्दी के अङ्क क्रमानुसार प्रयुक्त किये जायगे जैसा कि अन्तिम स्तम्भ में बतलाया गया है । संस्कृत, लैटिन और अंग्रेजी सभी नामों के एक ही अर्थ हैं परन्तु यूनानी नामों १ के अक्षरों में भी समानता पायी जाती है जिससे जान पड़ता है कि इनकी उत्पत्ति एक ही देश में हुई है। वह देश चाहे भारतवर्ष हो या यूनान अथवा कोई अन्य देश जिससे इन दोनों देशों ने लिया हो । यह बात भाषा-तत्व-विशारदों से ही स्पष्ट हो सकती है कि इस एकता का क्या कारण है। ज्योतिष के और भी शब्द ऐसे हैं जिनके संस्कृत, अरबी और यूनानी नामों में समता है । परन्तु इस विषय पर यहां तुलनात्मक विचार नहीं किया जायगा क्योंकि इसकी सामग्री इस समय दुर्लभ है । यदि सुविधा हुई तो भूमिका में यह विषय फिर उठाया जायगा । इस अध्याय में जिन नक्षत्रों की चर्चा हुई है उनकी पहचान के लिए यह आवश्यक है कि उनके चित्र दिये जायें । इसलिए और फाल्गुन मासों के आकाशचित्र २ दिये जाते हैं । इन चित्रों में तारों के यूनानी नाम नहीं दिये गये हैं इसलिए योग- तारों के पहचानने में कुछ कठिनाई पड़ सकती है परन्तु नक्षत्रों अर्थात् तारा-समूहों और उनकी स्थिति के समझने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती । इन चित्रों में केवल १. खेद है कि यूनानी अक्षरों के टाइप के अभाव से यूनानी नाम नहीं दिये गये । २. संवत् १६७८ विक्रमीय के कातिक मास से संवत् १६७६ के भाद्रपद मास तक की मर्यादा के लिये जब वह काशी के ज्ञानमण्डल से प्रकाशित होती थी, उसके सम्पादक बाबू सम्पूर्णानन्दजी की इच्छा से दस मास के आकाशचित्र इसी लेखक द्वारा बनाये गये थे । उन्हीं से चार चित्र चुनकर दिये हैं। इनमें उस समय के मंगल, गुरु तथा अन्य प्रधान नक्षत्र समूहों के भी स्थान दिखलाये गये हैं। इनमें से जिनकी चर्चा प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में आयी है उनके नाम संस्कृत ग्रन्थों से ही लिये गये हैं परन्तु जिनकी चर्चा प्राचीन ग्रन्थों में नहीं है उनके नाम वही रखे गये हैं जो आजकल