भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 838 में से

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पृष्ठ 660

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३५ वही तारे नहीं दिये गये हैं जिनकी चर्चा इस अध्याय में आयी है वरन् आकाश के अङ्गरेजी ग्रन्थों में पाये जाते हैं अथवा इनके हिन्दी के समानार्थ-सूचना शब्द बनाये गये हैं । जैसे Cassiopea के लिए काश्यप मंडल, Cepheus के लिए सिफियस, Draco के लिए अजगर, Leporis के लिए शशक इत्यादि । आचार्य वेंकटेश बाबू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित के पृष्ठ ३२४ में कई प्रधान तारों के नाम प्रसिद्ध ऋषियों और देवताओं के नाम पर रखे हैं जैसे कण्व, कुवेर, रुद्र, यम, पराशर इत्यादि । परन्तु ये नाम इस चित्र में नहीं दिये गये हैं क्योंकि अभी ये किसी सभा द्वारा स्थिर नहीं किये गये हैं इसलिए पाठकों को तभी सुविधा होगी जब वही नाम दिये जायें जो संसार के साहित्य में बहुत प्रसिद्धि पा चुके हैं । इन चित्रों में आकाश के वह दृश्य दिखलाये गये हैं जो २५ अक्षांश के सब स्थानों से चित्रों में बतलाये हुए महीनों में संध्या के ८ बजे से १० बजे तक देखे जा सकते हैं। महीने का आरम्भ संक्रान्ति के प्रायः दूसरे दिन से माना गया है क्योंकि चांद्रमास के अनुसार बनाया हुआ चित्र एक महीने से अधिक काम नहीं दे सकता जबकि संक्रान्ति के हिसाब से बनाया हुआ चित्र सैकड़ों वर्ष तक काम में आ सकता है। संक्रान्ति का विचार भी आजकल तीन तरह से किया जाता है। यहाँ सूर्य सिद्धान्त की रीति से संक्रान्ति का विचार किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए यह बतलाना आवश्यक जान पड़ता है कि कौन संक्रान्ति अङ्गरेजी महीने की किस तारीख को पड़ती है। इन चार चित्रों से वर्ष के बारहों महीनों में कैसे काम लिया जा सकता है उसके लिए भी कुछ बातें अगले दो पृष्ठों की सारणी में दे दी जाती हैं जिसकी विधि आगे बतलायी जायगी । आगे जो तीन-तीन महीने एकसाथ दिखलाये गये हैं उसका अर्थ यह है कि उन तीन महीनों की पहली तारीख को बीचवाले महीने का आकाश-चित्र ६ठे स्तम्भ में बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है। अथवा यों कहिये कि मोटे अक्षरों में बतलाये हुए महीने का आकाश-चित्र इस महीने के पीछे-आगे वाले महीनों की १ली तारीख को ६ठें स्तम्भ में बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है। इस सारणी में केवल यह बतलाया गया है कि महीने की १ ली तारीख को और शनि ग्रहों के चित्र भी यथास्थान दिये गये थे, जो ब्लाक से हट नहीं सकते इसलिये पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे ग्रह अब वहां नहीं देख पड़ेंगे क्योंकि ग्रहों के स्थान बदलते रहते हैं तारों की तरह एक से नहीं रहते। इन ब्लाकों के देने में ज्ञानमंडल के संचालक बाबू शिवप्रसाद गुप्तजी ने जो उदारता दिखलाई है उसके लिए विज्ञान-परिषद और लेखक दोनों गुप्तजी के ऋणी हैं ।