भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३६

६ घण्टा पीछे का नाक्षत्र काल हुआ १८ घण्टा ४२ मिनट + ६ घण्टा = २४ घण्टा ४२ मिनट अथवा १ घण्टा ४२ मिनट जो १ घण्टा ३० मिनट के लगभग है। इस लिये माघ की १ली तारीख को १ घण्टा ३० मिनट वाले नाक्षत्रकाल का आकाश चित्र अर्थात् मार्गशीर्ष का आकाश चित्र ६ बजे संध्या के समय देखा जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आप श्रवण से लेकर पुनर्वसु तक के १३ नक्षत्रों को अथवा धनिष्ठा से लेकर पुनर्वसु तक के १२ नक्षत्रों को सहज ही पहचान सकते हैं। यदि इससे ६ घंटा पीछे १२ बजे रात को आकाश देखें तो उस समय का नाक्षत्रकाल ७ घंटा ४२ मिनट के लगभग होगा जब कि फाल्गुन मास का आकाश-चित्र आपके काम में आ सकता है क्योंकि फाल्गुन मास का आकाश चित्र उस समय का है जब नाक्षत्र काल ७ घंटा ३० मिनट होता है। इस चित्र से आपको अश्विनी से लेकर हस्त नक्षत्र तक की पहचान सहज ही हो सकती है। इसी प्रकार यदि आप इसी रात को ६ बजे प्रातःकाल के लगभग अथवा १०, १२ मिनट और पहले ही आकाश देखें तो ज्येष्ठ का आकाश चित्र काम दे सकता है क्योंकि ६ बजे प्रातःकाल का नाक्षत्रकाल १३ घंटा ४० मिनट के लगभग होगा और इससे १२, १३ मिनट पहले का आकाश-चित्र १३ घंटा ३० मिनट के नाक्षत्रकाल के समय का होगा। इस आकाश-चित्र से आप पुनर्वसु से लेकर मूल या पूर्वाषाढ़ तक के तारे देख सकते हैं। इसी प्रकार यह भी हिसाब लगाया जा सकता है कि किसी और रात को किस समय किस मास के आकाश चित्र काम दे सकते हैं। चित्र का साधारण वर्णन—चित्र में जो गोल रेखा खींची हुई है वह २५ अक्षांश का क्षितिज है इसलिए प्रयाग या काशी के क्षितिज से प्रायः मिलता है। केन्द्र में धन का एक चिह्न इस प्रकार + है। इससे आकाश का वह बिन्दु प्रकट होता है जो २५ अक्षांश पर सिर के ठीक ऊपर होता है। इसे खस्वस्तिक या खमध्य कहते हैं। गोल रेखा के पास उत्तर, दक्षिण, पूरब, पच्छिम तथा इनके बीच की दिशाएं दिखलाई गयी हैं। उत्तर से दक्षिण तक जो सीधी रेखा देख पड़ती है वह यामोत्तर वृत्त है। मध्याह्नकाल में सूर्य इसी रेखा पर रहता है। पूरब से पच्छिम तक जो टेढ़ी रेखा देख पड़ती है वह विषुवद्वृत्त है। वसंत-सम्पात और शरद्-संपात के दिन सूर्य इसी पर देख पड़ता है और ठीक पूर्व में उदय तथा ठीक पच्छिम में अस्त होता है। विषुवद्वृत्त को काटती हुई एक दूसरी रेखा भी है जिसे क्रान्तिवृत्त कहते हैं। सूर्य इसी पर प्रतिदिन चलता हुआ देख पड़ता है। यथार्थ में यह हमारी पृथ्वी का मार्ग है जिस पर चलती हुई यह वर्ष भर में सूर्य की एक परिक्रमा कर लेती है। यह मार्ग बड़े महत्व का है। चंद्रमा और ग्रह इसी के आसपास आकाश में चक्कर लगाते हुए